नई दिल्ली.भारतीय जनता पार्टी जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्ज़ा देने वाली संविधान की जिस धारा-370 का जनसंघ के जमाने से विरोध करती चली आ रही है, उसके बारे में आम नागरिकों के मन में कई जिज्ञासाएं है कि आख़िर ये धारा-370 है क्या. तो आईए, समझने की कोशिश कराते हैं कि संविधान की धारा 370 में है क्या और क्यों इसको लेकर इतना विवाद है?

आजादी के बाद रियासतों और रजवाड़ों के भारत में विलय होने के वक्त जम्मू-कश्मीर के राज्य के पास दो विकल्प थे या तो वह भारत में शामिल हो जाए या फिर पाकिस्तान में शामिल हो जाए. वहां की जनता अधिकत्तर मुस्लिम थी जो कि पाक में शामिल होना चाहती थी लेकिन वहां के राजा हरि सिंह हिंदू होने के नाते उनका झुकाव भारत की तरफ था. जिसके बाद राजा सिंह ने भारत में राज्य का विलय करने की सोची और विलय करते वक्त उन्होंने "इंस्टूमेंट ऑफ एक्ंसेशन" नाम के दस्तावेज पर साइन किए थे. जिसका खाका राज्य के मौजूदा मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के दादा और पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला के पिता शेख अब्दुल्ला ने तैयार किया था. जिसके बाद भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्ज दे दिया गया.

शेख अब्दुल्ला को हरि सिंह और तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जम्मू-कश्मीर का प्रधानमंत्री बना दिया था. 1965 तक जम्मू और कश्मीर में राज्यपाल की जगह सदर-ए-रियासत और मुख्यमंत्री की जगह प्रधानमंत्री हुआ करता था. अनुच्छेद 370 की वजह से ही जम्मू-कश्मीर का अपना अलग झंडा और प्रतीक चिन्ह भी है.

केंद्र के कानून लागू नहीं

धारा 370 के तहत भारत के सभी राज्यों में लागू होने वाले कानून इस राज्य में लागू नहीं होते हैं. भारत सरकार केवल रक्षा, विदेश नीति, फाइनैंस और संचार जैसे मामलों में ही दखल दे सकती है. इसके अलावा संघ सूची और समवर्ती सूची के तहत आने वालों विषयों पर केंद्र सरकार कानून नहीं बना सकती.

राज्य की अनुमति जरूरी

राज्य की नागरिकता, प्रॉपर्टी का ओनरशिप और अन्य सभी मौलिक अधिकार राज्य के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं. इन मामलों में किसी तरह का कानून बनाने से पहले भारतीय संसद को राज्य की अनुमति लेनी जरूरी है.

जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को दोहरी नगरिकता

अलग प्रॉपर्टी ओनरशिप होने की वजह से किसी दूसरे राज्य का भारतीय नागरिक जम्मू-कश्मीर में जमीन या अन्य प्रॉपर्टी नहीं खरीद सकता है. इसके साथ ही वहां के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती है. एक नागरिकता जम्मू-कश्मीर की तथा दूसरी भारत की होती है. यहां दूसरे राज्य के नागरिक सरकारी नौकरी हासिल नहीं कर सकते.

अलग-अलग है भारत और राज्य का संविधान

यहां का संविधान भारत के संविधान से अलग है. आजादी के वक्त जम्मू-कश्मीर की अलग संविधान सभा ने वहां का संविधान बनाया था. अनुच्छेद 370(ए) में प्रदत्त अधिकारों के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा के अनुमोदन के बाद 17 नवम्बर 1952 को भारत के राष्ट्रपति ने अनुच्छेद-370 के राज्य में लागू होने का आदेश दिया.

नहीं लग सकता आपातकाल

अनुच्छेद 370 के वजह से ही केंद्र राज्य पर धारा 360 के तहत आर्थिक आपातकाल जैसा कोई भी कानून राज्य पर नहीं थोप जा सकता. जिसमें राष्ट्रपति राज्य सरकार को बर्खास्त नहीं कर सकता. केंद्र राज्य पर युद्ध और बाहरी आक्रमण के मामले में ही आपातकाल लगा सकता है. केंद्र सरकार राज्य के अंदर की गड़बडियों के कारण इमरजेंसी नहीं लगा सकता है, उसे ऎसा करने से पहले राज्य सरकार से मंजूरी लेनी होती है.

कई बदलाव भी हुए

हालांकि अनुच्छेद 370 में समय के साथ-साथ कई बदलाव भी किए गए हैं. 1965 तक वहां राज्यपाल और मुख्यमंत्री नहीं होता था. उनकी जगह सदर-ए-रियासत और प्रधानमंत्री हुआ करता था. जिसे बाद में बदला गया. इसके अलावा पहले जम्मू-कश्मीर में भारतीय नागरिक जाता तो उसे अपना साथ पहचान-पत्र रखना जरूरी थी. जिसका बाद में काफी विरोध हुआ. विरोध होने के बाद इस प्रावधान को हटा दिया गया.


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