आज के कठिन समय के बहुत ही महत्वपूर्ण कवि निलय उपाध्याय जी अपने गंगा यात्रा से साहित्य के क्षेत्र में एक नये बहस की शुरुआत करते दिख रहें है. एक ऐसे समय में जब लोग अपने घरों और अपने ही दुनिया में सिमटते चले जा रहें है तब ऐसे समय में एक कवि दुनिया जहान की समस्त समस्याओं और जिम्मेदारियों से पलायन करता है, और यह पलायन अपने जिम्मेदारियों का नहीं वरन साहित्यिक प्रतिबद्धता के लिए होता है और कवि एकाएक ऐसे यात्रा पर चल देता है जहाँ से वह गंगा को भारत की जीवन दायिनी गंगा के साहित्यिक और सांस्कृतिक रूप को रेखांकित करते हुए गंगोत्री से गंगासागर तक की यात्रा करता है...

यह यात्रा महज महानगरीय जीवन की उब की यात्रा नहीं है यह यात्रा तो अपने साहित्यिक रूप को पुनर्जीवित करने की एक महती प्रयास है मुझे ख़ुशी है कि मैं भी बनारस में इस यात्रा का सहयात्री रहा. निलय उपाध्याय की यह यात्रा उनके साहित्यिक जीवन की संघर्ष की भी यात्रा है....इस यात्रा में वह गंगा को मानवीकृत कर उससे बातचीत करते हुए उसके जीवन के कटु यथार्थ का बहुत ही सूक्ष्म चित्रण करते हैं और अंत में गंगा का दुःख लेखक का दुःख हो जाता है निलय जी एक बेहद ही संवेदनशील कवि और कथाकार है और इस यात्रा वृतांत में उनका रह रूप बहुत ही निखर कर मुखर रूप में पाठकों के सामने आता है...  बहुत समय तक फिल्मों के पटकथा लिखने से उनके इस यात्रा वृतान्त में रोचकता का भी सुन्दर समावेश हुआ है जिससे पाठकों को बेहद ही रोचकता से लेख पढ़ जाने की एक विवशता भी है साथ में कविताओं का भी प्रयोग उन्होंने बेहतरीन तरीके से किया हैं उनकी यह रचना आज के समय में गंगा को और उसकी बात करने वाले और गंगा की गंगा पर राजनीति करने वालों की यथार्थ को भी रेखांकित करती है और उन्हें सोचने पर मजबूर करती है..... भारत सरकार की दूरदर्शन निदेशालय की पत्रिका दृश्यांतर जून 2014 के अंक 09 में उनके यात्रा वृतांत का पहला भाग गंगा के गाँव में में प्रकाशित हुआ है.

कुमार मंगलम



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