आर्यभट ने उस वक्त ब्रह्माण्ड के रहस्यों को दुनिया के सामने रखा, जब शेष संसार ठीक से गिनती गिनना भी नहीं सीख पाया था. उनकी गिनती भारत के महानतम खगोल वैज्ञानिकों में की जाती है.

आर्यभट के गणितीय सिद्धाँत:

आर्यभट (Aryabhatta) ने अपने ग्रन्थ ‘आर्यभटीय’ (Aryabhatiya) में बहुत सी गणितीय अवधारणाएँ प्रस्तुत की हैं, जिनमें पाई (pai) का मान प्रमुख है. हम जानते हैं कि किसी वृत्त (Circle) की त्रिज्या (Radius) और परिधि (circumference) के बीच में एक खास सम्बंध होता है. यदि वृत्त के व्यास की लम्बाई को 22/7 अर्थात 3.1416 से गुणा किया जाए, तो उस वृत्त की परिधि की लम्बाई पता चल जाती है. इस बात को आर्यभट ने आज से डेढ़ हजार साल पहले बता दिया था:

चतुर्-अधिकम् शतम् अष्ट-गुणम् द्वाषष्टिस् तथा सहस्राणाम्.

अयुत-द्वय-विष्कम्भस्य आसन्नस् वृत्त-परिणाहस्..

100 में चार जोड़ें, आठ से गुणा करें और फिर 62000 जोड़ें. इस नियम से 20000 परिधि के एक वृत्त का व्यास ज्ञात किया जा सकता है. इसके अनुसार व्यास और परिधि का अनुपात (4+100)×8+62000)/20000 = 3.1416 होता है, जोकि पाँच अंकों तक शुद्ध मान है. जबकि π = 3.14159265 (8 अंकों तक शुद्ध मान) होता है.

आर्यभट से पूर्व के गणितज्ञों को पाई का ज्ञान नहीं था. इससे यह स्पष्ट है आर्यभट ने स्वयं इस अनुपात को खोजा. आर्यभट्ट ने आसन्न (निकट पहुंचना), पिछले शब्द के ठीक पहले आने वाला शब्द, की व्याख्या करते हुए लिखा है कि यह न केवल एक सन्निकटन है, वरन यह अतुलनीय (या इर्रेशनल) है. बाद में इस बात को लैम्बर्ट ने 1761 में सिद्ध किया.

आर्यभट त्रिकोणमिति के सिद्धाँतों के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं. आर्यभट ने त्रिकोणमिति (trigonometry) में एक नई पद्धति जिसे ‘ज्या’ (Sine) अथवा ‘भुजज्या’ कहा जाता है, का आविष्कार किया. यह सिद्धाँत अरबों के द्वारा यूरोप तक पहुँचा और ‘साइन’ (sine) के नाम से प्रचलित हुआ. आर्यभट ने अपने ग्रन्थ में sine को अर्ध्-ज्या कहा है, जो बाद में ज्या (jya) के नाम से प्रचलित हुआ.

आर्यभटीय का अरबी में अनुवाद करते समय अनुवादकर्ताओं ने ‘ज्या’ को ‘जिबा’ (jiba) लिखा. धीरे-धीरे यह जिबा से ‘जब’ में परिवर्तित हो गया. जब अरबी के ग्रन्थों का लैटिन में अनुवाद हुआ तो उन्होंने इसे गलती से ‘जेब’ पढ़ा. जेब का अर्थ होता है ‘खीसा’ या ‘छाती’. इसीलिए लैटिन में इस शब्द के लिए ‘सिनुस्’ (sinus) का प्रयोग हुआ, जिसका अर्थ भी छाती था. इस सुनेस् से ही अंग्रेजी का शब्द ‘साइन’ (sin) बना. इसके अतिरिक्त आर्यभट ने बीजगणित तथा अंक गणित के बहुत से महत्वपूर्ण सूत्र दिये, जो गणित की प्रारम्भिक एवं उच्च कक्षाओं में पढ़ाए जाते हैं.

आर्यभट एवं खगोल विज्ञान:

आर्यभट एक विलक्षण वैज्ञानिक थे. उन्होंने बिना दूरबीन आदि के आकाश का अध्ययन करके खगोल विज्ञान के ऐसे महत्वपूर्ण सूत्र बताए, जिसे बाकी संसार के वैज्ञानिक शताब्दियों बाद समझ पाए. उनके खगोल सिद्धान्त को औदायक सिद्धान्त कहा गया है. इस सिद्धाँत में उन्होंने दिनों को, लंका के नीचे, भूमध्य रेखा के पास, उनके उदय के अनुसार लिया है. हालाँकि उनके कुछ कार्यों मे प्रदर्शित एक दूसरा सिद्धान्त, अर्द्धरात्रिक भी प्रस्तुत किया है. उन्होंने अपने ग्रन्थ में खगोल विज्ञान सम्बंधी निम्न धारणाएँ प्रस्तुत की हैं:

1. पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है: उस समय यह मान्यता प्रचलित थी कि पृथ्वी स्थिर है और समस्त खगोल इसकी परिक्रमा करता है. आर्यभट ने अपने अध्ययन से पाया कि यह सिद्धान्त गलत है. उन्होंने कहा कि पृथ्वी गोल है, वह अपनी धुरी पर चक्कर लगाती है, इसी वजह से हमें खगोल घूमता हुआ दिखाई देता है. उन्होंने आर्यभटीय के 4.9वें श्लोक में लिखा है:

अनुलोम-गतिस् नौ-स्थस् पश्यति अचलम् विलोम-गम् यद्-वत्.

अचलानि भानि तद्-वत् सम-पश्चिम-गानि लङ्कायाम्..

(जैसे चलती हुई नाव में बैठे व्यक्ति को नदी का स्थिर किनारा और अन्य वस्तुएँ गतिमान दिखाई पड़ते हैं, ठीक उसी प्रकार लंका (भूमध्य रेखा) के मनुष्यों को स्थिर तारे गतिमान दिखाई पड़ते हैं.)

आर्यभट्ट ने पृथ्वी केन्द्रित सौर मण्डल का सिद्धान्त प्रस्तुत किया. यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि आर्यभट ने ग्रहों की कक्षीय अथवा दीर्घवृत्तीय गति का बिलकुल भी उल्लेख नहीं किया है. साथ ही उन्होंने यह भी नहीं कहा कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है.

2. सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण: प्राचीनकाल में सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण को दैत्यों से जोड़ कर देखा जाता था. लोगों का मानना था कि राहु और केतु नामक दैत्य जब सूर्य को खा लेते हैं, तो ग्रहण पड़ता है. आर्यभट ने अपने अध्ययन के द्वारा बताया कि पृथ्वी की छाया जब चंद्रमा पर पड़ती है, तो चंद्रग्रहण होता है. इसी प्रकार चाँद की छाया जब पृथ्वी पर पड़ती है, तो सूर्यग्रहण होता है. उन्होंने आर्यभटीय के चौथे अध्याय के प्रारम्भिक श्लोकों में अपने इस सिद्धाँत को प्रस्तुत किया है. उन्होंने अपने 37वें श्लोक में चंद्रग्रहण का वर्णन कुछ इस प्रकार किया है:

चन्द्रस् जलम् अर्कस् अग्निस् मृद्-भू-छाया अपि या तमस् तत् हि.

छादयति शशी सूर्यम् शशिनम् महती च भू-छाया..

3. आकाशीय पिण्डों का घूर्णन काल: आर्यभट्ट ने अपने अनुभव से स्थिर तारों के सापेक्ष पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूर्णन काल बता दिया था. उन्होंने बताया कि पृथ्वी 23 घण्टे 56 मिनट और 4.1 सेकेण्ड में अपना एक चक्कर लगाती है. जबकि पृथ्वी का वास्तविक घूर्णनकाल 23 घण्टे 56 मिनट और 4.091 सेकेण्ड है. यह समय आर्यभट द्वारा निकाले गये मान के लगभग बराबर ही है.

इसी प्रकार आर्यभट ने बताया कि 1 वर्ष 365 दिन, 6 घण्टे, 12 मिनट और 30 सेकेण्ड का होता है. यह गणना भी वास्तविक मान से केवल 3 मिनट 20 सेकेण्ड अधिक है. हमें ध्यान में रखना होगा कि आर्यभट ने ये गणनाएँ आज से डेढ़ हजार साल पहले की थीं. जबकि आज की गणनाएँ बड़ी-बड़ी दूरबीनों आदि की सहायता से की जाती हैं. इस प्रकार की गणनाएँ प्राचीन काल में अन्य खगोल शास्त्रियो ने भी की थीं, किन्तु उनमें आर्यभट्ट के आकलन ही शुद्धता के ज्यादा करीब थे.

आर्यभट की विरासत:

आर्यभट की उनके समकालीन तथा परावर्ती खगोलज्ञों ने तीव्र आलोचना की. आर्यभट द्वारा पृथ्वी की घूर्णन गति को निकालने के लिए युग को चार बराबर भागों में विभाजित करने के कारण खगोल वैज्ञानिक ब्रह्मगुप्त ने उनकी तीखी आलोचना की. किन्तु उन्होंने यह माना कि चंद्रमा एवं पृथ्वी की छायाओं के कारण ही ग्रहण होते हैं. अरबी वैज्ञानिक अल-बरूनी ने ब्रह्मगुप्त द्वारा की गयी आलोचना को अवांछित करार किया और उसने उनके विचारों को खूब सराहा.

आर्यभट के प्रमुख शिष्यों में पाण्डुरंगस्वामी, लाटदेव, प्रभाकर एवं निःशंकु के नाम शामिल हैं. लेकिन अगर किसी ने उनके सिद्धाँतों को व्याख्या के द्वारा जनता तक पहुंचाने का सर्वाधिक कार्य किया, तो वे थे भास्कराचार्य. वास्तव में उनके भाष्यों के बिना आर्यभट के सिद्धाँतों को जानना एवं समझना बहुत दूभर कार्य था.

आर्यभट और उनके सिद्धाँतों के आधार पर उनके अनुयायियों द्वारा बनाया गया तिथि गणना पंचाँग भारत में काफी लोकप्रिय रहा है. उनकी गणनाओं के आधार पर सन 1073 में मशहूर अरब वैज्ञानिक उमर खय्याम एवं अन्य खगोलशास्त्रियों ने ‘जलाली’ तिथि पत्र तैयार किया, जोकि आज ईरान और अफगानिस्तान में राष्ट्रीय कैलेण्डर के रूप में प्रयोग में लाया जाता है.

आर्यभट के गणितीय एवं खगोलीय योगदान को दृष्टिगत रखते हुए भारत के प्रथम उपग्रह को उनका नाम दिया गया. यही नहीं चंद्रमा पर एक खड्ड का नामकरण तथा इसरो के वैज्ञानिकों द्वारा 2009 में खोजे गये एक बैक्टीरिया (Bacillus aryabhattai) का नामकरण भी उनके नाम पर किया गया है. उनके सम्मान में नैनीताल (उत्तराखण्ड) के निकट आर्यभट प्रेक्षण विज्ञान अनुसंधान संस्थान (Aryabhatta Research Institute of Observational Sciences. ARIES) की स्थापना की गयी है, जिसमें खगोल विज्ञान, खगोल भौतिकी और वायुमण्डलीय विज्ञान पर अनुसंधान कार्य किये जाते हैं. इससे उनके कार्यों की महत्ता स्वयंसिद्ध हो जाती है.

(भारत के महान वैज्ञानिक' पुस्तक के अंश)


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