40 के दशक के दौरान लाला लाजपत राय की संस्था लोक सेवक मंडल स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों की आर्थिक मदद किया करती थी. उसी दौरान एक बार जब लाल बहादुर शास्त्री जेल में थे तो उन्होंने अपनी मां को एक ख़त लिखा. इस पत्र में उन्होंने पूछा था कि क्या उन्हें संस्था से पैसे समय पर मिल रहे हैं और वे परिवार की जरुरतों के लिए पर्याप्त हैं. मां ने जवाब दिया कि उन्हें पचास रुपए मिलते हैं जिसमें से लगभग चालीस खर्च हो जाते हैं और बाकी के पैसे वे बचा लेती हैं. इसके बाद शास्त्री जी ने लोक सेवक मंडल को भी एक पत्र लिखा और धन्यवाद देते हुए कहा कि अगली बार से उनके परिवार को चालीस रुपए ही भेजे जाएं और बचे हुए पैसों से किसी जरूरतमंद की मदद कर दी जाए.

शास्त्री जी से जुड़े ऐसे न जाने कितने किस्से पढ़ने-सुनने को मिल जाएंगे. एक ईमानदार, नेकनीयत और स्वाभिमानी इंसान जो अपनी सादगी और देशभक्ति के दम पर देश का प्रधानमंत्री बना. शास्त्री जी के बड़े बेटे अनिल शास्त्री ने कभी एक साक्षात्कार में बताया था, ‘मैं अपने स्कूल के आखिरी साल में था जब बाबूजी प्रधानमंत्री बने. इसके बाद ही हमने कार ली थी, वह भी कर्ज लेकर.’

उनके भाई सुनील शास्त्री पिता को कुछ इन शब्दों में याद करते हैं, ‘हमने बहुत कम मौकों पर साथ बैठकर खाना खाया है. इसकी वजह उनकी व्यस्त दिनचर्या थी. लेकिन जब भी कभी ऐसा दिन आता था तो त्यौहार जैसा महसूस होता था. एक बार उन्होंने घर के सारे सदस्यों को रात के खाने के समय बुलाया और कहा कि कल से एक हफ्ते तक शाम को चूल्हा नहीं जलेगा. बच्चों को दूध और फल मिलेगा और बड़े उपवास रखेंगे. हम सारे परिवारवालों ने उनकी बात का शब्दशः पालन किया. एक हफ्ते बाद उन्होंने हम सबको फिर बुलाया और कहा, ‘मैं सिर्फ देखना चाहता था कि यदि मेरा परिवार एक हफ्ते तक एक वक्त का खाना छोड़ सकता है तो मेरा बड़ा परिवार (देश) भी हफ्ते में कम से कम एक दिन तो भूखा रह ही सकता है.”

शास्त्री जी का यह कदम अमेरिका को जवाब था जो अपने पब्लिक लॉ-480 कानून के तहत भारत में गेहूं भेजने के लिए तरह-तरह की अघोषित शर्तें लगा रहा था. उन्होंने इन्हें मानने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि ‘हम भूखे रह लेंगे लेकिन अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करेंगे.’ इसके बाद उन्होंने आकाशवाणी के जरिये जनता से कम से कम हफ्ते में एक बार खाना न पकाने और उपवास रखने की अपील की. तब सारे ढाबे, रेस्टोरेंट और परिवारों ने इसका पालन किया. यह किस्सा राजनीति का एक सबक था कि जब भूखा रहने की नौबत आए तो पहले परिवार फिर देश की बारी आती है.

साभार:satyagrah.com

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