गोपाल कृष्ण गोखले पर गोविंद रानाडे का प्रभाव था. उन्होंने एक बार कहा था - ‘मैं रानाडे साहब के साथ मिलकर गलत काम करके भी संतुष्ट हूं, पर उनसे अलग होकर मैं कोई काम नहीं करूंगा. गांधी अपनी किताब ‘स्वराज’ में लिखते हैं - ‘गोखले हर बात में रानाडे का ज़िक्र ले आते हैं. ‘रानाडे ये कहते थे’ गोखले का उवाच था. दरअसल रानाडे गोपाल कृष्ण गोखले के गुरु थे और गांधी जी उन्हें अपना गुरू मानते थे.

22 वर्ष की उम्र में बंबई विधान परिषद् का सदस्य बनने के साथ ही उनका राजनैतिक जीवन शुरू हो गया था. 1889 में वे कांग्रेस के सदस्य बन गए. सरकार की भू-राजस्व संबंधी नीति पर उन्होंने असरदार भाषण दिए. गोखले एक ऐसे राजनैतिक विचारक थे जिन्होंने तत्कालीन भारतीय राजनीति और प्रशासन में क्रमिक सुधारों का पक्ष लिया था और यकायक स्वशासन की मांग को अव्यावहारिक माना था. पूना कांग्रेस अधिवेशन में उनका कहना था - ‘अच्छे या बुरे हेतु हमारा भविष्य और हमारी अाकाक्षाएं ब्रिटेन के साथ जुड़ गयी हैं. और कांग्रेस उन्मुक्त रूप से स्वीकार करती है कि हम जिस प्रगति की इच्छा रखते हैं वह ब्रिटिश शासन की सीमाओं में ही है.’

ब्रिटिश सरकार के अनन्य भक्त

गोखले व्यवहारिक राजनैतिक बुद्धि के धनी थे, जो ब्रिटिश साम्राज्यवादी शासकों की न्याय और उदारता की भावना को उकसा कर हिंदुस्तान को उनके साम्राज्य के भीतर ही स्वायत्तता दिलाने के पक्षधर थे. लेकिन ये बात तिलक और गरम दल के सदस्यों के गले नहीं उतरती थी. गोखले का विचार था कि उग्रवादी साधनों से भारत का अहित होगा. एक बार लार्ड हार्डिंग ने उनसे पूछ लिया - ‘तुम्हें कैसा लगेगा अगर मैं तुम्हें ये कह दूं कि एक महीने में ही ब्रिटिश ये देश छोड़ देंगे?’ उनका जवाब था, ‘मुझे बेहद ख़ुशी होगी लेकिन इससे पहले कि आप लोग लंदन पंहुचें हम आपको वापस आने के लिए तार (टेलीग्राम) कर देंगे.’

तिलक ‘स्वराज्य‘ पर ज़ोर देते थे लेकिन वे अंग्रेजों का इस बात के लिए भी आभार मानते थे कि उन्होंने आकर देश में शांति व्यवस्था लागू की. वे कहते थे - ‘भारत में किसी भी समय अव्यवस्था पैदा करना कोई कठिन काम नहीं है. यह तो शताब्दियों तक रहा है. परन्तु इस एक शताब्दी के समय में अंग्रेजों ने यहां जो शांति और व्यवस्था स्थापित की है, उसका विकल्प खोज लेना आसान नहीं है.

प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य और निशुल्क कराने की बात

गोखले ने 1903 में अपने एक बजट-भाषण में कहा था कि भावी भारत दरिद्रता और असंतोष का भारत नहीं होगा बल्कि उद्योगों, जाग्रत शक्तियों और संपन्नता का भारत होगा. वे पाश्चात्य शिक्षा को भारत के लिए वरदान मानते थे और इसका अधिकाधिक विस्तार चाहते थे. उनका मानना था कि देश की तत्कालीन दशा में पाश्चात्य शिक्षा का सबसे बड़ा कार्य भारतीयों को पुराने, जीर्ण-शीर्ण विचारों की दासता से मुक्त कराना होगा.

ठीक उसी प्रकार उन्होंने सरकर को ये विचार दिया कि प्राथमिक शिक्षा को छह से दस वर्षो तक के बच्चों के लिए अनिवार्य कर दिया जाए और इसके खर्चे को सरकार और संस्थाएं उठाएं. सरकार इस बात के लिए राज़ी नहीं थी. उसका मानना था कि शिक्षा के प्रसार से अंग्रेज़ी साम्राज्य को दिक्कत होगी. गोखले ने अपनी तर्क बुद्धि से उन्हें समझाया कि सरकार को अनपढ़ लोगों से ही डरना चाहिए, पढ़े-लिखों से नहीं.

नौकरशाही के केंद्रीकरण पर प्रहार

गोखले ने नौकरशाही के हाथों में शक्ति के केंद्रीकरण की बुराइयों को उजागर किया और देश के प्रति शोषणवादी अर्थनीति की भी तार्किक आलोचना की. 1905 में लंदन के ‘न्यू रिफार्म क्लब’ में दिए भाषण में उन्होंने कहा कि नौकरशाही के तीन मुख्य दोष हैं - केंद्रीकरण, भारतीय शिक्षित वर्ग को सत्ता से बाहर रखना और हर मसले पर अपनी सत्ता के हितों का ख्याल रखना.

सरकारी मशीनरी को हल्का करने पर ज़ोर

गोखले ने सरकार पर इस बात के लिए दवाब डाला कि सरकार लोक-कल्याणकारी हो और इससे संबंधित कार्यक्रमों पर अधिक खर्च करे, अपने मुलाज़िमों की संख्या घटाए, सैनिक व्यय कम करे और प्रशासनिक सुधार में ज़ोर लगाये. उन्हें शिकायत थी कि सरकार सफाई जैसे ज़रूरी जनकल्याण कार्यों पर ध्यान नहीं लगाती.

गोपाल कृष्ण गोखले के ही प्रयासों से नमक पर लगने वाला टैक्स ढाई रुपये प्रति मन से आठ आने प्रति मन कर दिया गया था. सता के विकेन्द्रीकरण और विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता के लिए उन्होंने तत्कालीन गवर्नर-जनरल लार्ड कर्जन के भारतीय विश्वविद्यालय विधेयक का भी विरोध किया था. सरकार विश्वविद्यालयों पर अपना नियंत्रण बढ़ाना चाहती थी और वे इसके विरोध में थे. वे न्यायपालिका और कार्यपालिका के पृथक्कीरण के भी पक्षधर थे.

हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक

वे हिंदू–मुस्लिम एकता को भारत के लिए कल्याणकारी मानते थे. उनका कहना था कि बहुसंख्यक होने और शिक्षा की दृष्टि से उन्नत होने के कारण हिंदुओं का कर्तव्य है कि सामान्य राष्ट्रीयता की भावना विकसित करने में अपने मुस्लिम भाइयों के सहायक बने. जिन्ना को वे हिंदू- मुस्लिम भाईचारे का सबसे बड़ा पैरोकार मानते थे.

गांधी के साथ-साथ वे जिन्ना के भी राजनैतिक गुरु थे. गोखले एक ऐसे राजनैतिक विचारक थे जो राजनीति में अध्यात्मिक अवधारणा लेकर आये हुए थे. उनके द्वारा स्थापित ‘सर्वेन्टस ऑफ इंडिंया सोसायटी’ का एक मुख्य उद्देश्य राजनीति और धर्म में समन्वय करना था. गांधी ने इसीलिए उन्हें अपना गुरु कहा था.

जब कर्जन के शासन की तुलना गोखले ने औरंगजेब से की

ब्रिटश सरकार के घोर पक्षधर गोखले को जब अंग्रेजी सत्ता का असली चेहरा दिखा तो वे मायूस हो गए. 1905 में कांग्रेस के बनारस सम्मेलन में उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा - ‘सात वर्षों तक रहे लार्ड कर्जन के शासन का अंत हुआ है... मैं इसकी तुलना हमारे इतिहास के औरंगजेब के शासन से करता हूं. हमें इन दोनों शासकों में अनेक समानताएं मिलती हैं - अत्यधिक केंद्रीकृत शासन, स्वेछाचारी व्यक्तिगत फ़ैसले, अविश्वास और दमन’. वे आगे कहते हैं - ‘कोई भी ये नहीं कह पायेगा की कर्जन ने भारत को मज़बूत किया है. सौ वर्षों से भी अधिक समय तक भारत इंग्लैंड के लिए ऐसा देश बन गया है, जहां से पैसा इकठ्ठा कर अन्यत्र खर्च किया जा रहा है. इस देश की अपार दौलत देश से बाहर ले जाई गयी है.’

गांधी का स्वदेश आन्दोलन इनकी ही देन था

आज जब ‘मेक इन इंडिया’ और ‘मेक फ़ॉर इंडिया’ के बीच बहस ज़ारी है, हम बात जान लें कि गोखले पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ‘स्वदेशी’ विचार पर ज़ोर दिया. राजस्थान विश्वविद्यालय के कुलपति और इतिहासकार प्रोफेसर केएल कमल कहते हैं - ‘उन्होंने स्वदेशी को प्रोत्साहन देते हुए बताया कि यह देशभक्ति के साथ-साथ एक आर्थिक आंदोलन भी है.’ प्रोफेसर कमल उन्हें उदारवादियों का सिरमौर और भारत के संवैधानिक विकास का जनक मानते हैं. वे कहते हैं कि उन्होंने कोई नया सिद्धांत नहीं दिया बल्कि भारतीय परिवेश में पाश्चात्य राजनैतिक परंपरा के विलय की बात कही थी.

जब गांधी ने उन्हें घोड़ा-गाड़ी रखने पर टोका

गोखले गांधी से लगभग ढाई साल बड़े थे. गांधी ने अपनी क़िताब ‘स्वराज’ में लिखा है - ‘एक बार मैंने उन्हें घोड़ा-गाड़ी के बजाय ट्रेन (कलकत्ता में चलने वाली छोटी ट्रेन) से सफ़र करने की सलाह दी.’ वे आगे लिखते हैं - ‘गोखले दुखी हो गए और कहा, क्या तुम भी मुझे नहीं पहचान पाए? मैं जो भी कमाता हूं सब अपने आप पर नहीं खर्च करता. घोड़ा-गाड़ी से इसलिए चलता हूं कि कई लोग मुझे जानते हैं और अगर मैं ट्रेन में सफ़र करूं तो मेरे साथ अन्य यात्रियों को काफी दिक्कतें होंगी. जब तुम्हें काफी लोग जानने लग जायेंगे तब इसका अहसास होगा.’ और ऐसा हुआ भी.

जोसफ लेविवेल्ड ने गांधी पर लिखी क़िताब’ दी ग्रेट सोल’ में लिखा है कि एक बार गांधी की ट्रेन को कानपुर के स्टेशन पर लोगों के दर्शनार्थ रोक लिया गया था. लोग सिर्फ उनकी झलक देखने के लिए प्लेटफॉर्म पर टूटे पड़ रहे थे. कई दिनों से कम नींद लेने के कारण गांधी में चिड़चिड़ापन आ गया था. इस सबको देखकर गांधी गुस्से में अपना सर दोनों हाथों से पीटने लगे!

आज हम इस बात पर बहस करते हैं कि गोखले एक कमज़ोर और नरम दलीय राजनेता थे जिन्होंने सरकार की हां में हां मिलाई. लेकिन ये गलत मूल्यांकन है. गोखले भारतीय सामाजिक और राजनैतिक चिंतन की विचारधारा के पितामह थे. उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर ‘सुराज’ का मंत्र दिया. पट्टाभि सितारामैय्या कहते हैं, ‘गोखले विरोधियों को हराने में यकीन नहीं रखते थे, वे विरोधियों को जीतने में विश्वास करते थे.’

साभार: satyagrah.com

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