देश की एक बड़ी आबादी स्कूल जाने के बाद भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित है. कंप्यूटर के ज्ञान से लेकर अंग्रेजी तक उन्हें ज्यादा कुछ नहीं पता होता है. बेंगलुरु में एक एनजीओ है जिसका नाम है, 'कृतज्ञता'. यह एनजीओ गरीब और वंचित तबके से आने वाले बच्चों को मुफ्त में शिक्षा प्रदान करता है. इसकी शुरुआत अरुणा दिवाकर ने की थी. वह कहती हैं, 'हम किताब से लेकर, सारी स्टेशनरी मुहैया करवाते हैं और पुराने स्कूलों को फिर से सुधारने के काम भी करते हैं. स्कूलों में जाकर हम एक्सट्रा क्लास भी लेते हैं. इसके जरिए हम उन्हें विद्या स्फूर्ति प्रोग्राम के तहत हर विषय की बुनियादी जानकारी देते हैं.'

'कृतज्ञता' की शुरुआत 2015 में तीन बच्चों से हुई थी. आज यह संगठन 3,000 बच्चों को शिक्षा प्रदान कर रहा है. इन बच्चों को खाने से लेकर पढ़ाई की सारी सुविधाएं मुहैया कररवाई जाती हैं. इनके पास एक अनाथालय भी है जिसका नाम 'माई होम' है. यहां 12 बच्चे रहते हैं, जिन्हें स्वास्थ्य, कपड़े शिक्षा हर सुविधा दी जाती है. अरुणा बताती हैं कि जब वे 32 साल की थीं तो उन्होंने इस संगठन की शुरुआत की थी. इसके पहले वे एक मल्टीनेशनल कंपनी में सेल्स हेड की नौकरी करती थीं. हालांकि उन्हें कभी 9 से 5 वाली नौकरी पसंद ही नहीं आई. वे समाज के हित के लिए भी कुछ करना चाहती थीं.

कृतज्ञता द्वारा सहायता प्राप्त एक स्कूल

उन्होंने अच्छा खासा वक्त कई सारे एनजीओ के सोशल प्रॉजेक्ट में काम करते हुए बिताया था इसलिए उन्हें इस क्षेत्र का अनुभव हो गया था. इसके बाद उन्होंने खुद के एनजीओ 'कृतज्ञता' की स्थापना की. उनका मकसद था शिक्षा के माध्यम से गरीब और पिछड़े बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना जिससे वे प्रतियोगिता की दौड़ में शामिल हो सकें. वे बताती हैं, 'जब हमने इन बच्चों से मुलाकात की तो इन्हें कुछ भी नहीं पता था. हमने इन्हें शुरू से सब कुछ सिखाया. इसमें काफी वक्त भी लगा. टॉयलट को इस्तेमाल करने से लेकर खुद के कपड़े साफ करने का ढंग हमने इनको सिखाया.'

'माई होम' और 'विद्या स्फूर्ति' प्रोग्राम के अलावा कृतज्ञता कई और सारे प्रोग्राम संचालित करता है. जैसे- 'प्रेरणा' के तहत महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की ट्रेनिंग दी जाती है और उनके भीतर आत्मविश्वास विकसित किया जाता है. 'प्रकृति' के तहत पर्यावरण को संरक्षित करने के लिए जागरूकता अभियान चलाया जाता है और स्कूलों में जाकर बच्चों को पेड़-पौधे लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. 'संजीवनी' के तहत ग्रामीण इलाकों में कैंप लगाकर उन्हें स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया जाता है और जरूरत पड़ने पर उनका इलाज भी किया जाता है. इसके अलावा अरुणा ऑर्गन डोनेशन के लिए पुनर्जीवन प्रोग्राम संचालित करती हैं.

साभार: yourstory.com

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