भोपाल. मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव नतीजों में एक हफ्ते का समय बचा है. लेकिन भाजपा और कांग्रेस अपने गणित के घोड़े दौड़ाने में व्यस्त हैं. भाजपा महाकौशल की सीटों पर जीत का गुणा भाग कर रही तो वहीं कांग्रेस को गोडवाना गणतंत्र पार्टी से डर सता रहा है. सबसे बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है क्या गोंडवाना पार्टी आदिवासी क्षेत्र में सेंध लगाने में कामयाब होगी? इसका जवाब ढूंढने के लिए राजनीतिक दल अपने अपने स्तर पर फीडबैक और सर्वे करवा रहे हैं. 

दरअसल, गोंडवाना पार्टी ने इस बार सपा के साथ गठबंधन कर 76 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है. यही नहीं गोंडवाना पार्टी के बैनर तले कई और भी दल के उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं. कुल मिलाकर तीन दलों के साथ मिलकर गोंडवाना पार्टी चुनावी रण में है. वह जीत से अधिक कांग्रेस के वोटबैंक को बड़ा झटका दे सकती है. पिछले चुनाव में गोंडवाना समेत अन्य दलोंं ने अलग अलग चुनाव लड़ा था. जिससे वोट बिखर गए थे. लेकिन इस बार साथ मिलकर गोंडवाना चुनाव में उतरी है. 

महाकौशल के आठ जिलोंं में पांच आदिवासी बहुल जिले हैं. राजनीति के जानकारों का मानना है कि अगर गोंडवाना पार्टी 2003 का इतिहास दोहराती है तो इस बार फिर भाजपा और कांग्रेस को बड़ा झटका लग सकता है. 2003 में गोंडवाना पार्टी ने भाजपा और कांग्रेस को जोरदार झटका दिया था. अपनी मौजूदगी का अहसास दिलाने के साथ ही महाकौशल की तीन सीटों पर पार्टी ने कब्जा किया था. छिंदवाड़ा, सिवनी और बालाघाट में एक एक सीट जीत कर तहलका मचा दिया था. उस समय पार्टी ने 80 उम्मीदवार उतारे थे. और महाकौशल में तीन सीटों पर जीत हासिल कर सभी को चौंका दिया था.

जबकि, अन्य तीन सीटों पर गोंडवाना के उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहे थे. उनका मतदान प्रतिशत 3.23% रहा था. लेकिन 2003 के बाद पार्टी दो फाड़ हो गई. फिर 2008 के चुनाव में गोंडवाना पार्टी से अलग होकर दो दल सामने आए. एक गोंडवाना गंणतंत्र पार्टी दूसरा गोंडवाना मुक्ति सेना पार्टी चुनावी मैदान में उतरे. गोंडवाना गणतंत्र ने 86 और गोंडवाना मुक्ति सेना ने 92 उम्मीदवारों को टिकट दिया था. हालांकि, अलग होने से पार्टी को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा. उसका वोट प्रतिशत भी घट गया. 2008 में सिर्फ  1.80% रहा. 2003 में महाकौश की जीती सीट भी पार्टी को गंवाना पड़ी. 

2013 में गोंडवाना पार्टी के लिए चुनावी जमीन और भी अधिक खिसक गई. गोंडवाना गंणतंत्र पार्टी और गोंडवाना मुक्ति सेना पार्टी से अलग होकर भारतीय गोंडवाना पार्टी मैदान में उतरी. गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने 64 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे. वहीं, गोंडवाना मक्ति सेना ने 6 सीटों पर और भारतीय गोंडवाना पार्टी ने 31 सीटों पर उम्मीदवार घोषित किए थे. आदिवासी दलों के अलग होने से गोंडवाना गणतंत्र पार्टी को लगातार आदिवासी वोट बैंक के ध्रुविकरण से नुकसान हुआ. उसका वोट प्रतिशत महज एक फीसदी रह गया. 

पिछले चुनाव के नतीजों से सबक लेते हुए इस बार यह तीनों दल एक बार फिर एक साथ आए और भाजाप कांग्रेस के सामने चुनौति बनकर उभरे हैं. हालांकि इस बार इनकी झोली में कितनी सीटें आती हैं यह तो 11 दिसंबर को ही पता चलेगा लेकिन कयास लगाए जा रहे हैं एकजुट होने से कांग्रेस के वोट बैंक में बड़ी सेंध लग सकती है जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिलेगा. 

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