नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने आलोक वर्मा को केंद्रीय जांच ब्यूरो के निदेशक के अधिकारों से वंचित कर अवकाश पर भेजने के सरकार के निर्णय के खिलाफ उनकी याचिका पर गुरुवार को सुनवाई पूरी कर ली. न्यायालय इस मामले में फैसला बाद में सुनायेगा.

प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति केएम जोसफ की पीठ ने इस मामले में आलोक वर्मा, केंद्र, केंद्रीय सतर्कता आयोग और अन्य पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद कहा कि इस पर फैसला बाद में सुनाया जायेगा. न्यायालय ने जांच ब्यूरो के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना सहित जांच एजेंसी के अनेक अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच शीर्ष अदालत की निगरानी में विशेष जांच दल से कराने के लिए गैर सरकारी संगठन कॉमन काॅज की याचिका पर भी सुनवाई की. इसके अलावा, पीठ ने लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और राकेश अस्थाना का पक्ष भी सुना. आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना ने एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाये थे. इन दोनों के बीच लड़ाई तेज होने पर सरकार ने केंद्रीय सतर्कता आयोग की सिफारिश पर वर्मा को निदेशक के अधिकारों से वंचित करते हुए अवकाश पर भेज दिया था.

सुनवाई के दौरान केंद्रीय सतर्कता आयोग ने दलील दी कि असाधारण स्थिति के लिए असाधारण उपाय जरूरी है. सीवीसी की ओर से अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने यह दलील दी. उन्होंने शीर्ष अदालत के फैसलों और सीबीआई को संचालित करनेवाले कानूनों का जिक्र किया और कहा कि (सीबीआई पर) आयोग की निगरानी के दायरे में इससे जुड़ी आश्चर्यजनक और असाधारण परिस्थितियां भी आती हैं. इस पर पीठ ने कहा कि अटाॅर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने उसे बताया था कि जिन परिस्थितियों में ये हालात पैदा हुए उनकी शुरुआत जुलाई में ही हो गयी थी. पीठ ने कहा, सरकार की कार्रवाई के पीछे की भावना संस्थान के हित में होनी चाहिए. शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसा नहीं है कि सीबीआई निदेशक और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के बीच झगड़ा रातों-रात सामने आया जिसकी वजह से सरकार को चयन समिति से परामर्श के बगैर ही निदेशक के अधिकार वापस लेने को विवश होना पड़ा हो.

उसने कहा कि सरकार को निष्पक्षता रखनी होगी और उसे सीबीआई निदेशक से अधिकार वापस लेने से पहले चयन समिति की सलाह लेने में क्या मुश्किल थी. प्रधान न्यायाधीश ने सीवीसी से यह भी पूछा कि किस वजह से उन्हें यह कार्रवाई करनी पड़ी क्योंकि यह सब रातों-रात नहीं हुआ. मेहता ने कहा कि सीबीआई के शीर्ष अधिकारी मामलों की जांच करने के बजाय एक-दूसरे के खिलाफ मामलों की तफ्तीश कर रहे थे. उन्होंने कहा कि सीवीसी के अधिकार क्षेत्र में जांच करना शामिल है, अन्यथा वह कर्तव्य में लापरवाही की दोषी होगी. अगर उसने कार्रवाई नहीं की होती तो राष्ट्रपति और उच्चतम न्यायालय के प्रति वह जवाबदेह होता. उन्होंने कहा कि सरकार ने सीबीआई निदेशक के खिलाफ जांच के लिए मामला उसके पास भेजा था. मेहता ने कहा, सीवीसी ने जांच शुरू की लेकिन वर्मा ने महीनों तक दस्तावेज ही नहीं दिये.

राकेश अस्थाना की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने शीर्ष अदालत से कहा कि इस मामले में वह तो व्हिसिल ब्लोअर थे, परंतु सरकार ने उनके साथ भी एक समान व्यवहार किया. उन्होंने कहा कि सरकार को वर्मा के खिलाफ केंद्रीय सतर्कता आयोग को जांच को अंतिम नतीजे तक ले जाना चाहिए. आलोक वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता फली नरिमन ने कहा कि केंद्र के आदेश ने उनके सारे अधिकार ले लिये. उन्होंने कहा कि सामान्य उपबंध कानून की धारा 16 भी इस बिंदु के बारे में है कि सीबीआई निदेशक जैसे अधिकारी को कौन हटा सकता है, परंतु यह अधिकारी को उसके अधिकारों से वंचित करने के बारे में नहीं है.

आलोक वर्मा के अभी भी जांच एजेंसी का निदेशक होने संबंधी अटॉर्नी जनरल की दलील के संदर्भ में नरिमन ने कहा, अधिकारी के पास निदेशक के अधिकार होने चाहिए. दो साल के कार्यकाल का यह मतलब नहीं कि निदेशक बगैर किसी अधिकार के सिर्फ पद के साथ विजिटिंग कार्ड रख सकता है. इस पर न्यायालय ने नरिमन से पूछा कि क्या वह किसी और की नियुक्ति कर सकती है तो नरिमन ने कहा, हां. न्यायालय केंद्र के आदेश को चुनौती देनेवाली, आलोक वर्मा की याचिका के साथ ही राकेश अस्थाना सहित जांच ब्यूरो के विभिन्न अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की शीर्ष अदालत की निगरानी में विशेष जांच दल से जांच के लिए गैर सरकारी संगठन कॉमन कॉज की याचिका और आवेदनों पर सुनवाई कर रहा था.

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