नई दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने पांच साल की बच्ची से दुष्कर्म और हत्या मामले में फांसी की सजा को कम करते हुए कहा कि मृत्युदंड केवल उस स्थिति में दिया जाना चाहिए जब आजीवन कारावास की सजा अपर्याप्त लग रही हो. न्यायमूर्ति एन वी रमण, न्यायमूर्ति एम एम शांतागौदार और न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी की पीठ ने कहा कि अपराध से जुड़े तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सजा दी जानी चाहिए. पीठ ने दोषी सचिन कुमार की मौत की सजा कम करते हुए उसे बिना राहत के 25 साल के कारावास की सजा सुनाई. यह मामला नाबालिग के बलात्कार से जुड़ा है जिसने मध्यप्रदेश के सतना जिले में फरवरी 2015 में दम तोड़ दिया था.

निचली अदालत की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए शीर्ष अदालत ने मंगलवार को कहा कि साक्ष्यों में कुछ विसंगतियां भले ही हों और प्रक्रियागत खामियां रिकार्ड में लाई गई हों, लेकिन इसके लिए आरोपी को संदेह का लाभ नहीं दिया जा सकता. शीर्ष अदालत ने कहा कि निचली अदालत द्वारा दी गई और बाद में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा सही ठहरायी गयी मौत की सजा इस मामले में उचित नहीं है.

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