मुद्दा. सुप्रीम कोर्ट को सियासी ढाल बनाना कब छोड़ेंगे राजनेता? यदि चौकीदार चोर है, यह कहना अवमानना है, तो अदालत के हवाले से चौकीदार चोर नहीं है, यह कहना भी तो अवमानना ही है?

यदि अदालत ने यह नहीं कहा कि चौकीदार चोर है, तो यह प्रमाण-पत्र भी कब दिया था कि- राफेल मामले में किसी भी तरह का भ्रष्टाचार नहीं हुआ?

खबर है कि... राफेल मामले में पीएम नरेन्द्र मोदी पर टिप्पणी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी से जवाब मांगा है. सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि हम ये साफ करना चाहते हैं कि उत्तरदाता ने जो कुछ सुप्रीम कोर्ट के हवाले से कहा है, वो गलत है. कोर्ट ने ऐसी कोई टिप्पणी नहीं की है. हम केवल दस्तावेज की ऐडमिसिबिलिटी पर फैसला करते हैं. कोर्ट ने राहुल गांधी से 22 अप्रैल 2019 तक जवाब देने को कहा है. अब मामले में अगली सुनवाई 23 अप्रैल 2019 को होगी. 

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने राफेल मामले में बीजेपी सासंद मीनाक्षी लेखी की याचिका पर सुनवाई की. उन्होंने राहुल गांधी के खिलाफ पीएम मोदी पर टिप्पणी पर अवमानना की याचिका दाखिल की है. 

खबरों के अनुसार मीनाक्षी लेखी ने अपनी याचिका में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने राफेल मामले में पुनर्विचार याचिका की सुनवाई के दौरान केंद्र की प्रारंभिक आपत्ति खारिज करते हुए कहा था कि वह द हिंदू में छपे रक्षा दस्तावेज पर विचार करेगा, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के हवाले से ये बयान दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि चौकीदार चोर है. याचिका में कहा गया है कि कोर्ट ने आदेश में ऐसा कुछ नहीं है, इसलिए ये कोर्ट की अवमानना है. 

यह सही है कि अदालत ने यह कहीं नहीं कहा कि- चौकीदार चोर है! लेकिन, सवाल यह है कि अदालत ने यह भी कब कहा था कि- चौकीदार चोर नहीं है? जबकि, पिछले लंबे समय से सुप्रीम कोर्ट के हवाले से बार-बार यह साबित करने की कोशिश की जाती रही है कि अदालत ने राफेल मामले में क्लीन चिट दे दी है! 

दरअसल, अदालत के विभिन्न फैसलों की व्याख्याएं राजनेता अपने हितों के सापेक्ष करते रहे हैं. लंबे समय से अदालत के विभिन्न फैसलों को राजनीतिक दल अपने फायदे के अनुरूप ढाल की तरह उपयोग में लेते रहे हैं. इसीलिए गंभीर प्रश्न यह है कि- राजनेता, सुप्रीम कोर्ट को सियासी ढाल बनाना कब छोड़ेंगे?

यदि सुप्रीम कोर्ट का कोई निर्णय सियासी दलों के लाभ के अनुकुल नहीं हो तो वे इसे संसद में बदलने के लिए एकमत हो जाते हैं! क्या यह अदालत की अप्रत्यक्ष अवमानना नहीं है? बगैर जनमत संग्रह के अदालत के निर्णय को संसद में बदलना केवल अदालत की अप्रत्यक्ष अवमानना ही नहीं है, जनता के प्रति अपराध भी है!

जब अयोध्या में विवादित ढांचा ढहा दिया गया था तब तो किसी कानून-कायदे की परवाह नहीं की थी, तो अब राम मंदिर निर्माण के लिए अदालत को ढाल क्यों बनाया जा रहा है?

कारण साफ है, तब उनके पास केन्द्र की कुर्सी नहीं थी, लेकिन अब केन्द्र की कुर्सी दाव पर थोड़ी लगाएंगे? यदि, अब मंदिर आंदोलन की तर्ज पर राम मंदिर बनने लगा तो पीएम मोदी की कुर्सी नहीं चली जाएगी? 

कुछ समय से सोशल मीडिया पर और टीवी पर बहस के दौरान भी अमर्यादित टिप्पणियां की जाती रही हैं, उनका क्या?

अदालत के किसी भी निर्णय के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सियासी उपयोग पर रोक लगाई जानी चाहिए, सुप्रीम कोर्ट को सियासी ढाल बनाना, किसी भी रूप में स्वीकार नहीं होना चाहिए! 

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