नई दिल्ली. ईरान से तेल खरीदने की छूट अमेरिका ने आगामी 2 मई से खत्म करने का ऐलान किया है, लेकिन उसका असर अभी से दिखाई देने लगा है.  मंगलवार को कच्चा तेल पांच महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गया है. यह अभी से दिखाई देने लगा है कि अमेरिकी पाबंदी भारत के लिए अच्छा संकेत नहीं है और इसका असर आने वाले दिनों में अर्थव्यवस्था के साथ ही वित्तीय बाजारों पर देखने को मिलेगा.

सोमवार को पाबंदी से संबंधित अमेरिका के फैसले की खबर आने के तुरंत बाद घरेलू शेयर बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई. इस साल अब तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा 63,000 करोड़ रुपये के निवेश से बाजार में खासी तेजी देखी गई थी. अगर कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी बरकरार रही, तो इससे डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत पर प्रतिकूल असर पड़ेगा, जिससे एफआईआई निवेश में गिरावट आएगी.

मंगलवार को जून डिलीवरी के लिए ब्रेंट फ्यूचर 0.6 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ प्रति बैरल 74.51 डॉलर पर कारोबार कर रहा था, जो 31 दिसंबर को प्रति बैरल 54.57 डॉलर की कीमत से 37 फीसदी अधिक है. सोमवार को क्रूड फ्यूचर में भारी तेजी आई थी. ब्रेंट नॉर्थ सी क्रूड मंगलवार को प्रति बैरल 74.70 डॉलर पर पहुंच गया, जो नवंबर के बाद का उच्च स्तर है. डब्ल्यूटीआई भी छह महीने के उच्च स्तर प्रति बैरल 66.19 डॉलर पर पहुंच गया.

भारत अपनी तेल की कुल जरूरत का 80 फीसदी आयात करता है. कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से डॉलर की मांग बढ़ेगी, जिससे डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत पर प्रतिकूल असर पड़ेगा. रुपये की कीमत में गिरावट से विदेशी निवेशकों का डॉलर रिटर्न कम होगा, जिससे भारत निवेश के लिहाज से आकर्षक नहीं रह जाएगा. रैलिगेयर ब्रोकिंग के जयंत मांगलिक ने कहा, 'भारत की तेल के आयात पर निर्भरता को देखते हुए यह सचमुच में चिंता का एक बड़ा कारण है. कच्चे तेल की कीमत में बढ़ोतरी की वजह से रुपये की कीमत में आई गिरावट से विदेशी निवेशक घरेलू बाजार में बिकवाली को मजबूर हो सकते हैं.'

आंकड़ों पर गौर करें तो एक बैरल तेल की कीमत में 10 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का चालू खाता घाटा जीडीपी के 0.4 फीसदी के बराबर बढ़ता है. कच्चे तेल की कीमत में 10 फीसदी की बढ़ोतरी से महंगाई दर 0.20 फीसदी बढ़ती है.

चालू खाता बढ़ने और महंगाई बढ़ने के दबाव से भारतीय रिजर्व बैंक मूल ब्याज दरों को बढ़ाने पर मजबूर होना पड़ सकता है. भारत के लिए इससे मुसीबत और बढ़ सकती है, क्योंकि जून के पॉलिसी रिव्यू में केंद्रीय बैंक द्वारा तीसरी बार दरों में कटौती करने की संभावना है.

कच्चे तेल की कीमत में बढ़ोतरी से रसायन, ऑटोमोबाइल, कंज्यूमर स्टेपल्स, पेंट और ल्यूब्रिकैंट जैसे उद्योगों के लिए कार्यशील पूंजी, परिचालन संबंधी लागत और कच्चे माल की कीमत बढ़ेगी. विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिकी पाबंदी से कच्चा तेल 80-85 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में पहुंच सकता है. ऐसे परिस्थिति में अगर अमेरिका तेल आपूर्ति में बढ़ोतरी करता है, तभी राहत मिलेगी, क्योंकि ओपेक और उसके सहयोगियों द्वारा आपूर्ति में बढ़ोतरी मांग को पूरा करने में सक्षम नहीं होगा.

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