कलाकार- इनामुलहक,शारिब हाशमी,कुमुद मिश्रा,राजेश शर्मा,पवन तिवारी,अनिल रस्तोगी

निर्देशक- जैगम इमाम 

मूवी टाइप- Drama

अवधि- 1 घंटा 40 मिनट

एक प्रतिभाशाली शिल्पकार - अल्ला रक्खा (इनामुलहक) - अपने एकमात्र बच्चे मोहम्मद को एक धार्मिक स्कूल में दाखिला लेने के लिए, अपने शिल्प के प्रति समर्पण के कारण शत्रुता और संघर्ष का सामना करता है, जो उसे देवी-देवताओं की मूर्तियां डिजाइन करने के काम में ले जाता है. एक और प्रमुख धर्म. 

बहुत सुंदर मूर्तियां डिजाइन करने की विरासत को उनके पूर्वजों द्वारा अल्ला रक्खा को दिया गया था, जिन्होंने बहुत ही कोमल उम्र से उनमें धार्मिक सहिष्णुता की भावना पैदा की थी. और, जब वह उन पाठों का उपयोग करता है और देश में एक अन्य प्रमुख धार्मिक समूह की पूजा के विभिन्न स्थानों पर काम करने के लिए जाता है, अल्ला रक्खा एक अंग में फंस जाता है - या तो केवल वही काम जारी रखता है जिसे वह जानता है और असाधारण रूप से पूरा करता है धार्मिक कट्टरपंथियों पर अच्छा या कृपा करें और अच्छे के लिए अपनी सेवाएं वापस लें.

बहुत सुंदर मूर्तियां डिजाइन करने की विरासत को उनके पूर्वजों द्वारा अल्ला रक्खा को दिया गया था, जिन्होंने बहुत ही कोमल उम्र से उनमें धार्मिक सहिष्णुता की भावना पैदा की थी. और, जब वह उन पाठों का उपयोग करता है और देश में एक अन्य प्रमुख धार्मिक समूह की पूजा के विभिन्न स्थानों पर काम करने के लिए जाता है, अल्ला रक्खा एक अंग में फंस जाता है - या तो केवल वही काम जारी रखता है जिसे वह जानता है और असाधारण रूप से पूरा करता है धार्मिक कट्टरपंथियों पर अच्छा या कृपा करें और अच्छे के लिए अपनी सेवाएं वापस लें.

लेखक-निर्देशक जैगम इमाम ने आज के दौर में समाज में फैली धार्मिक और सामाजिक वितृष्णा और घृणा को ध्यान में रखकर एक अच्छी नियत से फिल्म बनाई है. लेखक होने के नाते उन्होंने किरदारों पर मेहनत और रिसर्च भी खूब की है, मगर क्लाईमैक्स को वे बेहतर बना सकते थे. हालांकि अंत आपको भावुक करता है, मगर फिर यह सवाल भी उठता है कि धार्मिक सौहाद्र के लिए कुर्बानी क्यों देनी पड़ती है? 

कुछ हिस्सों में फिल्म की गति धीमी मालूम पड़ती है. अभिनय के मामले में कलाकारों ने बेहतरीन काम किया है. अल्ला रखा के रूप में इनामुलहक ने किरदार की संवेदना और समझदारी दोनों को बखूबी निभाया है. अंत तक आते-आते आपको उनके किरदार पर तरस आने लगता है. 

शारिब हाशमी एक सहज-संपन्न अभिनेता हैं और उन्होंने अपनी भूमिका में कई रंग भरे हैं. कुमुद मिश्रा अपने चरित्र में प्रभावशाली लगे हैं, मगर राजेश शर्मा को पर्दे पर ज्यादा कुछ खास करने का मौका नहीं मिला है. बालकलाकार हरमिंदर सिंह ने मोहम्मद के रोल को बहुत ही मासूमियत से जिया है. बाप-बेटे के रूप में उनके व इनामुलहक के सीन पर्दे पर अच्छे बन पड़े हैं. सबीहा की भूमिका में गुलकी जोशी ने सहज अभिनय किया है.

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