पहली बार भारत में सरोगेसी के लिए तब बहस शुरु हुआ जब 2004 में पता चला कि एक 47 साल की महिला ने अपनी बेटी के लिए अपनी कोख दी. गुजरात की रहने वाली उस नानी ने तब अपनी कोख से दो जुड़वां बच्चियों को जन्म दिया था. तभी से सामाजवेज्ञानिकों ने इस पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे. बाद में इससे समाज पर पड़ने वाले प्रभाव, महिलाओं के शारिरिक शोषण, बच्चों की नागरिता के साथ-साथ मानवाधिकार हनन संबंधी कई मसलों पर देश भर में चर्चा होती रही. माननीय उच्चत्म न्यायालय तक ने भी सरकार को इससे उत्तपन्न हो रही समस्याओं पर ध्यान देने को कहा .

सरोगेसी (नियमन) विधेयक को कैबिनट की मंजूरी के बाद अब भले हीं सरोगेसी के लेकर चलने वाली बहस पर पुर्णविराम लग जाएगा, जैसी की संभावना व्यक्त की जा रही है, लेकिन अब तक की परिस्थिति तो इस ओर इशारा करती है कि इस प्रक्रिया में शामिल महिलाओं का दोहन हुआ है साथ हीं सामाजिक औऱ परिवारिक माहोल पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और भारत 'टेक अवे कॉफी' के तर्ज पर 'टेक होम बेबी' का बड़ा बाज़ार हो गया .

दुनिया के एक तिहाई गरीब भारत में रहते हैं और सरोगेसी के आलोचको का मानना है कि भारत की महिलाओं का किराये पर कोख देने के पीछे ग़रीबी हीं मूल कारण है. भलें हीं गरीबी कारण रहा हो लेकिन बढ़ते सरोगेसी के पीछे महत्वपुर्ण बजहें यहां का लचीला कानून, कम कीमत में कोख की उपलब्धता, जवाबदेही मुक्त प्रक्रिया और सस्ते मे अच्छी तकनीक से लैस अस्पताल भी हैं. कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि जवाबदेही मुक्त के दायरे में रहकर कम लागत में ममत्व को खरीदना भारत में संभव है. जिसके कारण अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, अर्जन्टीना, आयरलैंड, स्वीडन, स्पेन, जापान, नॉर्वे, इस्राएल और ब्राजील जैसे देशों से लोग किराये की कोख से ममत्व पाने के लिए भारत आने लगे.

देखते हीं देखते सरोगेसी हब बन चुके भारत में किराय की कोख के कारोबार में गरीब महिलाओं का शोषण होने लगा. भलें ही गरीबी से मुक्त होने के लिए उन्होंने ये रास्ता अपनाया हो लेकिन गरीबी से मुक्ति के बदले शोषण हो तो फिर मुक्ति कैसा. उपर से इन महिलाओं के प्रति समाज के लोगों का नज़रिया बदल जाता है. उनकी सामाजिक जिंदगी इतनी आसान नहीं रह जाती, समाज में उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाने लगता है. निःसंतान लोगों को तो संतान सुख मिल जाता है लेकिन किराये पर कोख देने वाली ज्यादातर महिलाओं की स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं होता.

माताओं को नियमों के ऐसे मकड़जाल मे फंसा कर रखा जाता है कि गर्भाधान के दौरान किसी भी तरह दुर्घटना के लिए कोई जिम्मेदार नहीं होता, न हीं अस्पताल, न हीं डॉक्टर और न संतान चाहने वाला दंपति इसकी कोई जिम्मेबारी लेते हैं. हालात ये है कि अगर किसी कारणवश गर्भपात हो गया तो चंद रुपए देकर उन्हें छोड़ दिया जाता है और इससे होने वाले शारीरिक नुकसान और दुरगामी दुष्परिणाम माताओं को हीं झेलनी पड़ती है. ऑपरेशन के जरिए बच्चे को जन्म देने से उनका शरीर कमजोर हो जाता है. भलाई करने के नाम पर इमोशनल करके, पैसे का लालच देकर या करार की कानूनी दांव पेंच का हवाला देकर महिलाओं को शारीरिक संबंध बनाने के लिए भी मजबूर किया जाता है. ये सरोगेट माताओं का शोषण नहीं तो क्या है.

हद तो ये है कि जिस तरह से शादी के लिए तो लड़की में सुंदरता और रंग को देखे जाने की मानसिकता हमारे समाज में है वेसे हीं इन खूबियों को किराए की कोख लेते समय भी प्राथमिकता की सुची मे रखा जाता है. जात का भी ख्याल रखा जाता है, और जति के हिसाब से भी कोख की कीमत तय होती है.

एक रिपोर्ट के मुताबिक़ कुछ अस्पताल और वेबसाइटें तो कई तरह के पैकेज देती हैं जिनमें ‘इकॉनमी’ से लेकर ‘लग्ज़री’ पैकेज शामिल हैं. विज्ञापन देकर अस्पताल जरुरतमंद को लुभा रहें हैं. ये बच्चे दोने की गारंटी तक करते हैं, जिसके तहत वो पहले से हीं ऐसी महिलाओं के सुची तैयार रखते हैं और इन सुची को अपने क्लाइंट से शेयर किया जाता है . कई मामलों में तो माताओं को करार के तहत मिलने वाली ज्यादातर राशि अस्पताल हीं हड़प लेती है.

तेजी से बढ़ती सरोगेसी की प्रवृत्ति कई तरह की सामाजिक, पारिवारिक, कानूनी एवं नैतिक समस्याएं पैदा कर रहीं हैं. पुर्व महिला एवं विकास मंत्री रेणुका चौधरी ने तो यहां तक आशंका जताई थी कि किराये की कोख से पैदा होने वाले बच्चों का इस्तेमाल अंगों की खरीद फरोख्त या देह व्यापार के लिए भी हो सकता है. सरकार को किराए पर कोख देने वाली महिलाओं तथा किराए की कोख के जरिए पैदा होने वाले बच्चों के कानूनी एवं चिकित्सकीय अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए .

बहुत सारे देशों में किराये की कोख से बच्चा पैदा करने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा हुआ है. चीन में एक-बच्चे का नियम है और किराये की कोख से बच्चा पैदा करना ग़ैर-क़ानूनी है. इस क़ानून के उल्लंघन करने जुर्माना भरना पड़ता है और जेल की सज़ा दा जा सकती है. यूरोप के कई देशों में सरोगेसी गैरकानूनी है. जर्मनी में तो इतनी सख्ती है कि वहां के नागरिकों को भारत का वीजा लेने से पहले जिन नियमों को ध्यान में रखने को कहा जाता है, उनमें सोरोगेसी को एक खास जगह दी गयी है. सन् 2010 में जर्मनी ने इस सख्ती पर अमल करते हुए एक दंपत्ति को भारत में पैदा हुए जुड़वां बच्चों को देश में लाने की अनुमति नहीं दी. भारत में किराये की कोख से पैदा हुई जापानी बच्ची मांझी को तो कानूनी पेचिदगियों एवं लंबी जिद्दोजहद के बाद जपान में पनाह मिली.

तमाम परिस्थितियों कारण पैदा हुई स्थितियों के मद्देनजर अब केन्द्रीय कैबिनेट ने जिस सरोगेसी (नियमन) विधेयक को मंजूरी दी है उससे उम्मीद जगी है कि धंधे का रूप ले चुकी सरोगेसी के कारण महिलाओं और समाज पर पड़ने वाले प्रतिकुल असर पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी. महिलाओं को शोषण से बचाया जा सकेगा. अपनी कोख में दूसरों के लिए औलाद पाने वाली महिलाओं के मानवाधिकार की रक्षा होगी. 

साथ हीं बंझपन या फिर करियर की चिंता के चलते किराये पर कोख लेकर बच्चा लेने वालों को भी सोचना चाहिए की कहीं उनके कारण किसी आदिवासी या गरीब महिला का शोषण तो नहीं किया जा रहा. अच्छा तो ये होता कि अपना खुन और अपना डीएनए की मानसिकता से बाहर निकलकर किसी आनाथ बच्चे को गोद ले लेते. कम से कम हजारों बच्चों को तो माता पिता का साया मिल जाता . और उनकी अच्छी परवरिश होती. समाज में एक अच्छा संदेश भी जाता. सरकार को चाहिए की सोरोगेसी के बदले गोद लेने की चलन को बढ़ावा दे.

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