नई दिल्ली. लैंडर विक्रम अबतक मौन है. तकरीबन 90 घंटे से इसरो के वैज्ञानिक लैंडर विक्रम की खामोशी को तोड़ने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं लेकिन चांद की सतह पर मौजूद विक्रम कुछ भी हरकत करने को तैयार नहीं है. यानी विक्रम लैंडर पर इंडियन स्पेस रिसर्च सेंटर (ISRO) के वैज्ञानिकों का मानमनौव्वल फिलहाल कोई काम करता नहीं दिख रहा है. हालांकि इसरो के वैज्ञानिकों ने भी अपनी हिम्मत नहीं हारी है. इसरो के वैज्ञानिक सिग्नल भेजकर लैंडर से सम्पर्क स्थापित की कोशिश कर रही है. इसरो ने ट्वीट कर कहा है कि चांद की सतह पर पहुंचे विक्रम लैंडर से अबतक संपर्क नहीं हो पाया है. इसरो ने आज ट्वीट कर इसकी जानकारी दी. उसने कहा कि चंद्रयान- 2 के ऑर्बिटर ने विक्रम लैंडर का पता तो लगा लिया, लेकिन उससे संपर्क नहीं हो पा रहा है. इसरो ने लिखा, लैंडर से संपर्क स्थापित करने की सारे संभव प्रयास किए जा रहे हैं.

इससे पहले सोमवार को खबर आई थी कि विक्रम चंद्रमा की सतह पर तिरछा पड़ा है और उसमें कोई टूट-फूट नहीं हुई है. इसरो ने बताया था कि ऑर्बिटर ने जो तस्वीर भेजी है, उसमें विक्रम का कोई टुकड़ा नहीं दिख रहा है. इसका मतलब है कि विक्रम बिल्कुल साबुत बचा है. तब वैज्ञानिकों ने विक्रम से दोबारा संपर्क साधे जाने की संभावना व्यक्त की. इसरो के चेयरमैन के सिवन ने भी रविवार को कहा था कि ऑर्बिटर ने विक्रम की लोकेशन का पता लगा लिया है. इसरो का कहना है कि उनकी टीम लगातार सिग्नल भेजकर लैंडर से सम्पर्क की कोशिश कर रही है.

विक्रम को मनाने में जुटा है इसरो...

- इसरो को वह फ्रिक्वेंसी पता है, जिसमें विक्रम के साथ कम्युनिकेट किया जाना है. ऐसे में उनकी टीम लगातार इस उम्मीद के साथ अलग-अलग कमांड भेज रही है कि विक्रम किसी कमांड पर जवाब दे. हालांकि अभी तक कोई कामयाबी हाथ नहीं लगी है.

- इसरो सम्पर्क के लिए कर्नाटक के एक गांव बयालालु में लगाए गए 32 मीटर ऐंटेना का इस्तेमाल कर रहा है. इसका स्पेस नेटवर्क सेंटर बेंगलुरू में है.

- इसरो एक और रास्ते का इस्तेमाल कर रहा है. इसरो की कोशिश है कि ऑर्बिटर के जरिए विक्रम से सम्पर्क स्थापित हो सके, लेकिन इसमें भी अभी तक सफलता नहीं मिली है.

ऐसे जवाब देगा विक्रमलैंडर विक्रम तीन तरफ से ट्रांसपोंडर्स और एक तरफ आरे एंटेना से घिरा है. इसके ऊपर गुंबद जैसा एक यंत्र लगा है. इन्हीं यत्रों के जरिए विक्रम पृथ्वी या फिर ऑर्बिटर को सिग्नल भेजेगा या फिर कोई भी सिग्नल रिसिव करेगा. फिलहाल ये साफ नहीं है कि विक्रम के ये इक्विपमेंट सही सलामत हैं या उन्हें क्षति पहुंची है. इतना ही नहीं विक्रम की बाहरी सतह पर सोलर पैनल लगा है. जिसके जरिए विक्रम को पॉवर मिलना था. साथ ही पावर के लिए विक्रम में वैटरी सिस्टम भी लगा है.

ऐसे में सवाल उठता है कि कहीं हार्ड लैंडिंग के कारण इसके कुछ इक्विपमेंट टूट गए हों और विक्रम पावर जेनरेट नहीं कर पा रहा हो. साथ ही कुछ लोगों का कहना है कि चांद की सतह पर विक्रम कुछ इस कदर झुका हुआ है कि अबतक उसके सोलर पैनल पर सूर्य की किरणों नहीं पड़ पाई है और ऐसे की जैसे ही सूर्य की किरणें उन पैनल्स पर पड़ेंगी विक्रम सिग्नल भेजना और रिसिव करना शुरू कर देगा. हालांकि वैज्ञानिकों की मुश्किलें ये भी है कि 14 दिन तक ही विक्रम को सूरज की रोशनी मिलेगी. इसमें से चार दिन गुजर चुके हैं. ऐसे में इसरो के वैज्ञानिकों को अगले 10 दिन में ही कुछ करना होगा. वरना फिर 14 दिन की एक लंबी काली रात होगी.

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