बिहार के मधुबनी जिले के मधेपुर का रहने वाला कमल नारायण 8 नवंबर 2004 को ट्रेन के जनरल डिब्बे से जा रहा था. डिब्बे में लाइट न होने की वजह से उसका सामान चोरी हो गया. इसके खिलाफ उसने मधुबनी के जिला उपभोक्ता फोरम में शिकायत दी. रेलवे ने कमल नारायण की दलीलों का विरोध किया, लेकिन जिला फोरम ने 5 सितंबर 2008 के आदेश में रेलवे को चोरी हुए सामान के लिए 8 नवंबर 2004 से 13,500 रुपए 12 फीसदी ब्याज के साथ कमल को देने का आदेश दिया.

इसके अलावा मानसिक कष्ट के लिए रेलवे को 10 हजार रुपए मुआवजा और कानूनी खर्च के लिए दो हजार रुपए देने को भी कहा. रेलवे को यह सभी राशि तीस दिन के भीतर देने को कहा गया, अन्यथा इस पर 15 फीसदी ब्याज भी देना पड़ेगा. 

इस आदेश को रेलवे ने बिहार के राज्य उपभोक्ता आयोग में चुनौती दी. राज्य आयोग ने 13 जनवरी 2015 को दिए आदेश में जिला फोरम के आदेश को बरकारार रखा, लेकिन ब्याज की दर को 12 फीसदी से घटाकर छह फीसदी कर दिया और इसे लागू करने की तिथि घटना के दिन की बजाय शिकायत करने के दिन से कर दिया. साथ ही दस हजार मुआवजे को घटाकर 3000 रुपए कर दिया, लेकिन कानूनी खर्च को 2000 रुपए बरकरार रखा. 

इस आदेश को रेलवे में राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग में चुनौती दी. 3 जुलाई 2019 को आयोग के पीठासीन अधिकारी प्रेमनारायण ने अपने आदेश में कहा कि उन्होंने दोनों ही पक्षों के वकीलों को ध्यान से सुना है. रेलवे का तर्क है कि वह रिजर्व डिब्बे की तरह जनरल डिब्बे में यात्रियों के सामान की सुरक्षा का कोई वादा नहीं करता है. यात्रियों को ही उनके सामान की सुरक्षा करनी होती है.

डिब्बे में बिजली न आने की वजह उस समय इंजन का बोगी से अलग होना था. इसलिए राज्य आयोग का फैसला गलत है और उसे रद किया जाए. रिवीजन याचिका में 98 दिन की देरी की वजह रेलवे ने कानूनी विभाग से चर्चा और ऊपरी स्तर से आदेश आने में देरी बताया है. रेलवे की ओर से दावा किया गया है कि उसका केस बहुत मजबूत है इसलिए इस देरी से उसे छूट दी जाए.

पीठासीन अधिकारी ने कहा कि शिकायतकर्ता की ओर से दलील दी गई है कि राज्य आयोग मुआवजा व ब्याज की दर पहले ही कम कर चुका है, लेकिन जिला व राज्य दोनों ही जगह इस बात पर सहमति थी कि रेलवे की गलती से सामान चोरी हुआ. इसलिए राष्ट्रीय आयोग तथ्यों की समीक्षा नहीं कर सकता. इसके अलावा डिब्बे में बिजली उपलब्ध कराना रेलवे की जिम्मेदारी है और वह इससे इनकार नहीं कर सकता. 

पीठासीन अधिकारी ने कहा कि दाेनों पक्षों को सुनने और दस्तावेज देख्रने के बाद यह बाद स्पष्ट है कि दोनों ही फोरम इस तथ्य पर एक राय हैं कि शिकायतकर्ता को रेलवे की लापरवाही की वजह से नुकसान उठाना पड़ा. इसलिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा श्रीमती रूबी चंद्रा दत्ता व यूनाइटेड इंडिया इंश्योरंेस मामले में दिए गए फैसले के आलोक में वह तथ्यों की दोबारा समीक्षा नहीं कर सकते. समीक्षा याचिका को 98 दिन की देरी से दायर करने पर आयोग ने कहा कि रेलवे के तर्कों से स्पष्ट है कि यह देरी सिर्फ प्रक्रियागत है.

इसलिए इनके आधार पर इसमें छूट देने का आधार भी नहीं बनता है. सुप्रीम कोर्ट पोस्टमास्टर जनरल और लिविंग मीडिया इंडिया लिमिटेड मामले में कह चुका है कि सरकारी विभागों की लाल फीताशाही की वजह से होने वाली देरी पर छूट देने का कोई आधार नहीं है. इसके अलावा भी सुप्रीम कोर्ट के अन्य आदेशों से स्पष्ट है कि इस मामले में देरी से याचिका दाखिल के लिए छूट नहीं दी जा सकती. इस आधार पर आयोग ने रेलवे की याचिका को खारिज कर दिया. 

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