गंगा की पवित्र लहरों के बीच उठी एक व्यग्र धारा किनारे आकर जब जमीन से टकराई तो हिंदी साहित्य की धरा को अपनी ओजस्वी वाणी तथा लेखनी के बल पर एक अलग ही विधा में सींचने लगी. कविताओं का वो पौधा फला फूला मगर कांटो के बीच किसी गुलाब की तरह. बनारस के घाट से जन्मी और वहीं विलीन हुई एक ऐसी आत्मा जिसने न केवल अपने नाम को बल्कि हिंदी साहित्य के अस्तित्व को धूमिल नहीं होने दिया. अब जब नाम ही धूमिल हो तो वो कैसे किसी और के अस्तित्व को धूमिल कर सकता है. खुद मिट्टी में मिल गया किन्तु अपने हुनर से उसने जो खेत बोए वो आज भी लहलहा रहे हैं.

आज भी उसकी फसल से हिंदी साहित्य हराभरा है. यूं तो उसे कविताओं का एंग्री यंग मैन कहा जाता था. क्योंकि उसकी कविताओं के शब्दों में ऐसी मारक क्षमता थी जो सीधे निशाने पर चोट पहुंचाती थी. एक ऐसी गहरी चोट कि आदमी सोचने पर विवश हो जाए. आज भी जब संसद की बात हो या राज्य की विधानसभा की बात हो तो अक्सर टीवी चैनलों पर हम लोगों को संसद से सड़क तक बोलते सुनते हैं. यही संसद से सड़क तक जब एक रचना के आवरण में समान्य लोगों के मन मस्तिष्क में रहे तो उसे धूमिल का कारनामा कहते हैं.

जी हां, हम संसद से सड़क तक वाक्य रचना को सुनते हैं तो हमे साठोत्तरी हिंदी कविता के प्रमुख कवि धूमिल की बरबस याद आती है . संसद से सड़क तक धूमिल जी का चर्चित काव्य संग्रह रहा है. इस काव्य संग्रह के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया है. धूमिल का वास्तविक नाम सुदामा पांडे है जिनका आज जन्मदिवस है. धूमिल उत्तर प्रदेश के वाराणसी जनपद के खेवाड़ी नामक गाँव में आज के दिन 9 नवंबर 1936 में जन्मे थे . इनके पिता श्री शिवनायक पांडे थे, जो एक कर्मठ और स्वाभिमानी व्यक्ति थे.

इनकी माता राजवंती देवी थी जो एक धर्म परायण महिला थी. बालकाल में ही इनके पिता की मृत्यु हो जाने के कारण घर की आर्थिक स्थिति खराब हो गई थी. 12 वर्ष की आयु में इनका विवाह हो गया था. इसलिए घर की सारी जिम्मेदारी धूमिल के ऊपर आ गई जिसके कारण ये हाईस्कूल से आगे की पढ़ाई नहीं कर पाए थे. उन्होंने कलकत्ता में लोहा ढोने की नौकरी की एक लकड़ी व्यवसाई के यहां पर इनके मालिक का अमानवीय व्यवहार इन्हें 3 वर्ष तक झेलना पड़ा. इसके बाद ये बनारस वापस लौटा आये. 1958 में इन्होंने इलेक्ट्रिकल्स में डिप्लोमा कर लिया और 12 जुलाई 1958 से इस विभाग में नौकरी करने लगे.

धूमिल आजीवन इसी संस्थान में बने रहे और वहीं विभिन्न पदों पर कार्य करते हुए अपना गृहस्थ जीवन जीते रहे . उक्त संस्थान में नौकरी प्राप्त करने के उपरांत अनचाहे तबादले से त्रस्त होकर 1974 में नौकरी छोड़ दी और साहित्य सेवा में रम गए. . धूमिल की कविताओं में राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक विषमता का तीव्र प्रवाह है . धूमिल की काव्य यात्रा त्री-विक्रम काव्य यात्रा है अर्थात उनकी अब तक तीन कविता संग्रह प्रकाशित हुई है. जिसमें पहला कविता संग्रह है - संसद से सड़क तक और दूसरा कल सुनना मुझे और तीसरा सुदामा पांडे का प्रजातंत्र है . संसद से सड़क तक कविता संग्रह का प्रकाशन 1972 में धूमिल के जीवन काल में हुआ था.

इस कविता संग्रह की सभी कविताओं का चयन धूमिल द्वारा हुआ है . इस कविता संग्रह में 25 कविताएं हैं. अकाल दर्शन, मोचीराम, शहर में सूर्यास्त और प्रौढ़शिक्षा , नक्सलबाड़ी, पटकथा आदि रचनाएं कथात्मक नाटकीय तत्व होने के जीवंत उदाहरण हैं. इन कविताओं में आम आदमी की पीड़ा का बोध है . धूमिल की कविताओं में हमें सामाजिक सरोकारों , समकालीन बोध दृष्टिगोचर होता है.

उनका मानना था कि एक सही कविता पहले एक सार्थक वक्तव्य होती है धूमिल के लिए कविता केवल कला सज्जन नहीं है बल्कि कविता तो आदमी को आदमी होने की तमीज सिखाती है . वे लिखते हैं कविता क्या है ? / कोई पहनावा है ? / कुर्ता- पजामा है ? / ना , भाई, ना / कविता- / शब्दों की अदालत में / मुजरिम के कटघरे में खड़े बेकसूर आदमी का हलफनामा है / क्या यह व्यक्तित्व बनाने की- /चरित्र चमकाने की / खाने -कमाने की -/चीजे है ? / ना, भाई ,ना /कविता- भाषा में /आदमी होने की तमीज है .

धूमिल का मानना था कि कविता एक समझ लाती है वह हमारे अंदर एक विवेक जाग्रत करती है. उनकी मान्यता रही है कि कविता उत्तेजित नहीं करती है बल्कि वह पाठक को सहज बनाती है और सहज होने का अर्थ है चीजों को सही परिप्रेक्ष्य में देखना है. वे लिखते हैं मैं साहस नहीं चाहता, /मैं सहज होना चाहता हूं. /ताकि आम को आम और चाकू को चाकू कह सकूं .

संसद से सड़क तक कविता संग्रह की कविताओं में बीस साल बाद आजादी के 20 वर्ष होने पर जिस यथार्थ का बोध पाठक को कराती है वह शब्द भर नहीं है उन्होंने लिखा है अपने आप से सवाल करता हूं- /क्या आजादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है जिन्हें एक पहिया ढोता है / या इसका कोई और मतलब होता है ? इसी संग्रह की एक कविता प्रौढ़ शिक्षा है जिसमें वे लिखते हैं लालटेन की लौ जरा और तेज करो /उसे यहां-/ पेड़ में गड़ी हुई कील से लटका दो . / हां अब ठीक है .

इसके अलावा इस संग्रह की सबसे लंबी कविता पटकथा है यह एक बेजोड़ कविता है . इस कविता के कुछ अंश इस प्रकार हैं/ मैंने कहा -आ-जा-दी / और दौड़ता हुआ खेतों की ओर गया /वहां कतार के कतार /अनाज के अंकुए फूट रहे थे /मैंने कहा - जैसे कसरत करते हुए बच्चे /तारों पर चिड़ियां चहचहा रही थी. शहर में सूर्यास्त, मोचीराम इस काव्य संग्रह की महत्वपूर्ण कविताओं में से एक है. धूमिल जी की मोचीराम कविता हमारे जीवन के कितने बड़े सत्य को पेश करने में सफल हुई है इसका अंदाजा उनके इन पंक्तियों से लगाया जा सकता है बाबूजी ! सच कहूं-मेरी निगाह में /,न कोई छोटा है.

/न कोई बड़ा है, / मेरे लिए हर आदमी एक जोड़ी जूता है, / जो मेरे सामने मरम्मत के लिए खड़ा है. कल सुनना मुझे यह धूमिल की दूसरी कविता संग्रह है जिसका प्रकाशन उनके मरणोपरांत 1977 में उनके मित्र राजशेखर ने संपादित किया था . इस कविता संग्रह में 37 कविताएं संकलित है. इस संग्रह की प्रस्तावना डॉ. विद्यानिवास मिश्र ने लिखी है .इस संग्रह की पहली कविता नेहरू जी की मृत्यु पर लिखी गई है .

वे लिखते हैं असंख्य मुरझाए गुलाब, /हवा में उड़ते हुए संकेतों से पूछते हैं /कहां है वह प्यारा और दर्द भरा अपनापन/ जो हमें सीने पर टाकता था.. धूमिल की कविता जनतंत्र में रहते हुए जन की उपेक्षा को रेखांकित करने वाली कविता है , प्रतिरोध की कविता है वे लिखते हैं ना कोई प्रजा है /ना कोई तंत्र है /यह आदमी के खिलाफ /आदमी का खुलासा षड्यंत्र है धूमिल का तीसरा काव्य संग्रह सुदामा पांडे का प्रजातंत्र है जिसका संपादन 1984 में उनके पुत्र रत्नशंकर ने किया. इसमें कुल 60 कविताएं संकलित हैं . जो कि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई है.इस संग्रह में 1970 के बाद के लगभग सभी महत्वपूर्ण कविताओं को सम्मिलित किया गया है.

धूमिल की काव्य कृतियां प्रकाशित समय से ही बहुत चर्चित रही है धूमिल की काव्य कृतियों के केंद्र में हमेशा से मनुष्य रहे हैं . हरित क्रांति इस संग्रह की महत्वपूर्ण रचनाओं में से एक है इसमें कुल 7 से 8 पंक्तियां हैं जो इस प्रकार हैं . इतनी हरियाली के बावजूद /अर्जुन को नहीं मालूम /उसके गालों की हड्डी क्यों उभर आई है /उसके बाल सफेद क्यों हो गए हैं / लोहे की छोटी सी दुकान में बैठा हुआ /आदमी सोना /और इतने बड़े खेत में खड़ा आदमी मिट्टी क्यों हो गया है . धूमिल ने अपनी कविताओं में भद्दे शब्दों का भी प्रयोग किया है इसलिए इन्हें भदेश भाषा का कवि भी कहा जाता है .

वे लिखते हैं क्यों रोती है बदनसीब औरत !/क्या तू नहीं जानती कि---- / भाषा बलात्कार से बालिंग होती है . नये कवियों में भाषा क्षमता की दृष्टि से धूमिल की कविताओं को मुक्ति बोध की तरह ही प्राणवान और सशक्त माना गया है . सन 1975 में धूमिल को मध्यप्रदेश शासन की साहित्य परिषद के द्वारा मुक्तिबोध पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उनके मरणोपरांत 1989 में साहित्य अकैडमी पुरस्कार दिया गया. धूमिल की कविताओं में प्रायः बिंब जो हमें प्राप्त होते हैं वह है जनतंत्र, संसद ,जनता ,आदमी, जंगल व्याकरण, भाषा ,कविता आदि है. धूमिल की कविताएं वस्तु और शिल्प दोनों ही दृष्टि से हिंदी कविता को लोकतांत्रिक बनाती हैं. धूमिल साठोत्तरी पीढ़ी के महत्त्वपूर्ण कवि हैं .

जब उनका प्रादुर्भाव हुआ तो हिंदी कविता आंदोलन का समय था . धूमिल का देहावसान 10 फरवरी 1975 को ब्रेन ट्यूमर की वजह से हो गया. धूमिल ने अपने अल्पकालीन जीवन काल में संघर्ष और प्रतिरोध का जो मानसिक बिम्ब अपनी रचनाओं में प्रस्तुत किया है वह बड़ा सशक्त एवं मार्मिक है उनकी कविताओं को पढ़कर पाठक बेचैन होता है . काशीनाथ सिंह धूमिल के लिए विपक्ष का कवि: धूमिल -आलोचना -33: पृष्ठ संख्या 12 में लिखते हैं धूमिल के आने तक आलोचना का मुंह कहानी की ओर था वह आया और उसने आलोचना का मुंह कविता की ओर कर दिया अपनी और कर दिया.

धूमिल आज हमारे बीच नहीं है किंतु साहित्य में उनका नाम धूमिल हो जाए ऐसा भी नहीं है. वो बार बार, हर बार याद आते हैं. कविताओं के ओज और कविताओं की शक्ति क्या होती है जब भी ये सवाल उठता है तो धूमिल बरबस दौड़े चले आते है. ऐसे कुशल चितेरे यूं तो अपना कोई उत्तराधिकारी छोड़ कर नहीं गया किन्तु अपने पवित्र गंगा जैसे प्रवाह में हिंदी कविताओं को सींचने तथा सिंचते रहने का उनका कार्य आज भी जारी है.

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