आज से चार अरब साल से ढाई अरब साल के बीच के दौर को हम आर्केइयन कल्प के तौर पर जानते हैं. उस दौर मे धरती पर कुदरती हंगामा बरपा हुआ था. ज्वालामुखी विस्फोट की वजह से पूरे माहौल में राख और मलबा बिखरा हुआ था. उल्का पिंड लगातार धरती पर हमला करते रहते थे. सूरज की धुंधली सी रोशनी धरती पर पड़ती रहती थी.

उस वक्त हमारी धरती आज से ज्यादा तेज रफ्तार से घूमती थी. इसकी वजह से दिन छोटे होते थे. ये वही दौर था जब धरती पर महाद्वीप बने. इन महाद्वीपों में कई जगह हल्की गहराई वाले पानी के ठिकाने थे, जिनमें रोशनी से दूसरे केमिकल रिएक्शन होने लगे. 

दक्षिण अफ्रीका के एमपुमालंगा सूबे में स्थित मखोंज्वा पर्वत उसी दौर के हैं. बार्बर्टन शहर इन्हीं पहाड़ों के साए में बसा है. मखोंज्वा के पहाड़ आज से 3.57 अरब साल पुराने हैं. ये समंदर से बाहर निकलने वाले जमीन के पहले टुकड़ों में से एक थे. साल 2018 में मखोंज्वा के पहाड़ों को यूनेस्को ने विश्व की धरोहर घोषित किया है. इन्हें बार्बर्टन ग्रीनस्टोन बेल्ट के नाम से भी जाना जाता है. ये धरती पर सबसे पुरानी जमीनी चट्टानों में से एक हैं. 

2014 में बार्बर्टन-मखोंज्वा जियोट्रेल की शुरुआत हुई थी. इसके तहत सैलानियों को इस कुदरती धरोहर की सैर कराई जाती है. ये ट्रेल बार्बर्टन से शुरू होकर ईस्वातिनी यानी पुराने स्वाजीलैंड की सीमा तक जाती थी. ये ट्रेल मखोंज्वा पहाड़ों से होकर गुजरती है. इस ट्रेल से गुजरते हुए आप को धरती के विकास के अरबों साल के इतिहास के सबूत दिखते हैं. यहीं पर जिंदगी का पहला बीज फूटा था. इसीलिए इसे जिंदगी के आगाज का ठिकाना भी कहते हैं. 

इस जियोट्रेल की शुरुआत जर्मनी की जेना यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर क्रिस्टोफर ह्यूबेक और स्थानीय गाईड टोनी फेर्रार ने की थी. इन दोनों ने ही मिलकर इस जियोट्रेल की गाइडबुक भी लिखी है. ये किताब बार्बर्टन टूरिज्म ऑफिस में मिल जाती है. इसे पढ़कर आप ये जान सकते हैं कि मखोंज्वा के पहाड़ों की चट्टानों से वैज्ञानिकों ने क्या जानकारियां जुटाई हैं.  

आर्केइयन कल्प के दौरान धरती पर ऑक्सीजन नहीं थी. उस दौर में जो पहले बैक्टीरिया विकसित हुए, उन्हें फोटोफेरोट्रॉफ्स कहा जाता है, जो उस वक्त समंदर में मौजूद पानी और कार्बन डाई ऑक्साइड को सूरज की रोशनी की मदद से तोड़कर अपने विकास का रास्ता बना रहे थे. जब ये रासायनिक क्रिया करते थे, तो उन बैक्टीरिया से ऑक्सीजन निकलती थी.

समंदर में प्रचुर मात्रा में मौजूद लोहे का जब इस ऑक्सीजन से मेल होता था तो आयरन डाई ऑक्साइड बनती थी. ये उस बैक्टीरिया की ऊपरी खोल का काम करती थी. आज जियोट्रेल के दौरान आप अरबों साल पहले ही इस रासायनिक क्रिया के सबूत देख सकते हैं. इस हिस्से को बैंडेड आयरन फॉर्मेशन लेबाय कहते हैं. आयरन ऑक्साइड की वजह से यहां की चट्टानें लाल हो गई हैं. 

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