मित्रों ! 25 मार्च को एक बार फिर नया साल हमारे दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है. आओ इस नववर्ष का भी उत्साह से स्वागत करें और इसे धूमधाम से मनाएँ लेकिन क्या ये संभव है जबकि हमारे सामने अनेक संकट और चुनौतियाँ हैं. हम कैसे नये साल का स्वागत कर सकते हैं? इसे कैसे धूमधाम से मना सकते हैं? हमारा पर्यावरण दिन-प्रतिदिन अधिकाधिक प्रदूषित व विषाक्त होता जा रहा है. प्राकृतिक आपदाएँ भी मनुष्य को पीडि़त करती ही रहती हैं.

कभी बाढ़ की विभीषिका तो कभी सूखे का प्रकोप तथा कहीं भूकंप से तबाही तो कहीं सुनामी से विनाश. आपदाएँ और संकट चाहे वे प्र्रकृति द्वारा प्रदत्त हों अथवा मनुष्य द्वारा स्वयं निर्मित, उनका समाधान केवल प्रकृति द्वारा ही संभव है. प्रकृति ही हमारी वास्तविक संपदा है. इसी से वास्तविक समृ़िद्ध का निर्माण संभव है.

वस्तुतः प्रकृति और समृद्धि एक दूसरे के पर्याय हैं और प्रकृति का संरक्षण करके ही हम सही अर्थों में समृद्ध और सुखी हो सकते हैं. अतः हम अपने इस ग्रह तथा इसके परिवेश को संरक्षित करने का संकल्प लेकर ही सही अर्थों में नववर्ष का स्वागत और अनुष्ठान कर सकते हैं. आइये नववर्ष विक्रम संवत्सर 2076 जो कि चैत्रा मास के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि को प्रारंभ हो रहा है, का स्वागत इस नए संकल्प अथवा प्रतिज्ञा के साथ करें कि हम अपनी इस धरती माता और इसके वायुमण्डल को प्रदूषित नहीं होने देंगे.

प्रकृति को बचाने, इसका संरक्षण करने अथवा पर्यावरण को प्रदूषित होने से रोकने के लिए प्रतिज्ञा या संकल्प किसी पर अहसान नहीं है. प्रकृति को अक्षुण्ण बनाए रखकर ही हम स्वयं के जीवन को सुरक्षित रख सकेंगे अन्यथा इस ग्रह से जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की अन्य कई प्रजातियों की तरह मनुष्य प्रजाति भी सदा के लिए विलुप्त हो जाएगी. प्रकृति का संरक्षण मनुष्य के स्वयं के लाभ के लिए ही है.

प्रकृति को बचाने और अक्षुण्ण रखने की प्रक्रिया के द्वारा एक बिलकुल नए प्रकार की जीवनशैली का प्रारंभ संभव है जिससे हम न केवल प्रकृति का सान्निध्य पा सकते हैं अपितु उस सान्निध्य के द्वारा प्रकृति के अनेकानेक उपहारों से भी मालामाल हो सकते हैं. एक ऐसी जीवनशैली जिसमें मनुष्य अधिकाधिक कर्मशील और सक्रिय जीवन व्यतीत कर तनाव, व्याधियों और समस्याओं से पूरी तरह मुक्त हो सकता है.

इसलिए मित्रो विलंब करने की अपेक्षा शीघ्र इस पर कार्य करने की आवश्यकता है. मनुष्य जाति का भविष्य मनुष्य के अपने ही हाथों में है. ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से पूरी दुनिया पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. धरती का तापमान बढ़ रहा है. ग्लेशियर पिघल कर समुद्र की सतह को बढ़ा रहे हैं. ओज़ोन परत में छेद हो जाने से धरती पर स्थित प्राणियों के अस्तित्व के लिए संकट उत्पन्न हो गया है जिससे मनुष्य भी अछूता नहीं.

पूरे ग्रह का अस्तित्व ही संकट में पड़ गया है और इसका कारण है स्वयं मनुष्य. दुनिया के कई हिस्सों में उत्पात मचाने वाली सुनामी लहरें , बवंडर अथवा भूकंप ऊपर से तो प्राकृतिक आपदाएँ ही लगती हैं लेकिन इन उपद्रवों में कहीं न कहीं मानव मन और उसकी प्रतिक्रिया भी सम्मिलित है. वास्तव में मनुष्य की इच्छानुसार ही यह ग्रह तथा आसपास के अन्य ग्रह प्रतिक्रिया करते हैं.

मनुष्य बेशक ग्रहों से प्रभावित होता हो लेकिन उसका अपना ग्रह पृथ्वी तथा अन्य ग्रह भी मनुष्य की सोच से प्रभावित होते हैं. इस संसार में कष्टों का क्या कारण है? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए डॉ दीपक चोपड़ा कहते हैं, ’हमारी सामूहिक रुचियाँ और पसंद जो हमारी सामूहिक इच्छा का परिणाम हैं, इस जीवमंडल या धरती के सूचना और ऊर्जा क्षेत्रा को प्रभावित करती हैं. यह समस्त भूमंडल मनुष्य का ही विस्तार है.

जब सामूहिक रूप से हम सब या अधिकांश लोग व्यग्र या अशांत होते हैं तो धरती या प्रकृति भी व्यग्र या अशांत हो उठती है और इस प्रकार प्राकृतिक आपदाओं के लिए हमारा बहुत बड़ा योगदान है जिसके लिए हम ईश्वर को दोषी ठहराने लगते हैं.’ मनुष्य प्रकृति से अलग नहीं है. मनुष्य प्रकृति की छवि है तो प्रकृति मनुष्य की छवि है.

यदि सामूहिक रूप से मनुष्य की अशांति समाप्त हो जाए तो संभव है प्रकृति का उपद्रव और अशांति भी उसी तरह शांत हो जाए. यद्यपि प्रत्येक आपदा या संकट मनुष्य जाति के लिए लाभदायक भी हो सकता है क्योंकि विषम परिस्थितियों में मनुष्य अपेक्षाकृत अधिक सीखता है लेकिन हमें चाहिए कि हम हर कार्य सावधानीपूर्वक करें और अत्यंत सावधानी, सम्मान और सकारात्मक मानसिक दृष्टिकोण के साथ प्रकृति का दोहन या उपयोग करें. संसार की प्रायः सभी जनजातियाँ प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम और श्रद्धा का भाव रखती हैं और यह भी देखा गया है कि प्राकृतिक आपदाओं के समय वे पूर्ण रूप से सुरक्षित रह पाती हैं.

तब तथाकथित सभ्य मनुष्य क्यों नहीं? हम सब भी प्राकृतिक प्रकोपों से बच सकते हैं यदि हम सब एक नए सकारात्मक मानसिक दृष्टिकोण का विकास करें और स्पष्ट रूप से वह है प्रकृति से प्रेम, श्रद्धा और उसकी देखभाल या चिंता अथवा संरक्षण. मित्रांे, आइये नववर्ष का उत्सव प्रकृति के प्रति एक नए मानसिक दृष्टिकोण से प्रारंभ करें. यह दृष्टिकोण स्वस्थ जीवन की शुरूआत के लिए मनुष्य और प्रकृति के संबंधांे को मज़बूत करेगा. इसका यह अर्थ नहीं है कि हमने पिछले वर्षों में उन्नति नहीं की है.

पूरी दुनिया में विभिन्न क्षेत्रों में अभूतपूर्व उन्नति हुई है. न केवल विज्ञान और टेक्नोलॉजी तथा आर्थिक क्षेत्रों में हमने पर्याप्त उन्नति की है अपितु आध्यात्मिक क्षेत्रा में भी कम उन्नति नहीं की है. हम निरंतर अधिकाधिक सचेत, जाग्रत तथा ज्ञानवान हो रहे हैं. फिर भी आत्मज्ञान के क्षेत्रा को और अधिक विकसित करने की आवश्यकता है ताकि हम आंतरिक और बाह्य उन्नति में संतुलन बना सकें ;आध्यात्मिकता और भौतिकता में संतुलन कायम रख सकें जिससे मनुष्य और प्रकृति का विरोध समाप्त हो सके और हम अच्छी प्रकार जीवन जी सकें.

अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन के लिए संतुलन अनिवार्य है जिसकी आज कमी है. जीवन में संतुलन की प्राप्ति के लिए शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मन की सही सोच तथा आध्यात्मिक उन्नति भी अनिवार्य है और इन सब की प्राप्ति के लिए आवश्यक है उचित परिवेश या प्रदूषण रहित स्वच्छ प्रकृति.

प्रदूषण रहित परिवेश स्वच्छ प्रकृति की सन्निधि में ही संभव है. अनुकूल प्राकृतिक परिवेश के अभाव में हम आंतरिक और बाह्य प्रगति में संतुलन स्थापित करने की मानसिक अवस्था कभी भी नहीं प्राप्त कर सकते इसलिए नववर्ष को नए अंदाज़ में मनाने के लिए संकल्प करें: प्रकृति हमारी वास्तविक संपत्ति है.

मैं इसका सम्मान करता हूँ और इसकी देखभाल तथा सुरक्षा करता हूँ. प्रकृति और मनुष्य दोनों को प्रशांत बनाए रखने के लिए प्रकृति और मनुष्य के प्रति मैं पूरी तरह सकारात्मक मानसिक दृष्टिकोण रखता हँू. मेरे जीवन में पूर्ण संतुलन है. मेरी आंतरिक और बाह्य प्रगति तथा शरीर , मन और चेतना तथा मेरी अपनी चेतना व ब्रह्मांडीय चेतना के मध्य पूर्ण संतुलन है.

इस प्रकार हम एक नए अंदाज़ में नए साल का उत्सव मना सकते हैं जो मात्रा आने वाले वर्ष को ही नहीं अपितु आने वाली सदियों और सहस्राब्दियों को भी सुखमय बनाने में सक्षम होगा और इसके लिए किसी विशेष दिन की भी आवश्यकता नहीं. इसे हम किसी भी महीने किसी भी दिन अथवा किसी भी क्षण मना सकते हैं.

पहले ही बहुत देर हो चुकी है अतः आइये आज ही इसी क्षण को नववर्ष स्वीकार कर नए ढंग से मनाने की शुरूआत करें. यह शुरूआत जितनी जल्दी हो सकेगी उतनी ही जल्दी हम वास्तविक सुख-समृद्धि तथा उन्नति की ओर अग्रसर हो सकेंगे.

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