प्रदीप द्विवेदी. इनदिनों मध्यमवर्ग बड़ा नाराज है कि केन्द्र सरकार उनके लिए कुछ नहीं कर रही है!

लेकिन, बड़ा सवाल यह है कि कोई सरकार काहे मध्यमवर्ग की परवाह करे?

सत्ता को साधनेवाले नेता जानते हैं कि यह वर्ग चार साल चिल्लाएगा और पांचवे साल कोहनी पर आर्थिक आरक्षण जैसा गुड़ लगाते ही वोटों की झौली भर जाएगा.... चार साल के सारे दुख-दर्द भूल जाएगा!

अभी क्या है? चुनाव तो 2024 में हैं! तब की तब सोचेंगे?

फिलहाल तो सरकार के पास तीन ही प्रमुख काम हैं....

एक- सरकार के लिए धन जुटाना, जिसके लिए दारू चालू, गुटका शुरू, अच्छे दाम पर पेट्रोल-डीजल बिक्री चालू, वसूली वाले तकरीबन सारे विभाग खुले हैं. यही नहीं, बड़े दानदाताओं के समर्पण से खजाना भरने का काम भी चल रहा है!

दो- पर्दे के पीछे सियासत और पर्दे पर प्रवचन जारी हैं, मध्यमवर्ग इन प्रवचनों से प्रेरणा ले और सरकार को विभिन्न बिलों का भुगतान करे, बच्चों की स्कूल फीस भरे, सभी लाइसेंस फीस भरे, सरकारी कर्मचारियों को भले ही आधा वेतन मिले, लेकिन व्यापारीवर्ग अपने कर्मचारियों को लाॅकडाउन में वेतन दे, बगैर दुकान खोले, किराया, लाईट बिल भरे, बचत पर कम ब्याज स्वीकार करे आदि जिम्मेदारियां निभाए, बावजूद इसके पैसा बच जाए, तो दान का विकल्प खुला है!

तीन- मध्यमवर्ग पार्टी चंदा देनेवाला या वोटबैंक तो है नहीं, जो हैं, उनका पूरा ध्यान रखा जा रहा है!

सियासी सयानों का मानना है कि मध्यमवर्ग की याददाश्त बहुत कमजोर है, इसलिए आज के हालात यदि वाकई 2024 तक याद रखना हो, तो अखबारों की कतरनें या फिर मोबाइल का स्क्रीनशाट जरूर रख लें, शायद कुछ काम आ जाए?

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