मीना जैन छाबड़ा. आज समाज में एक शिकायत आम हो गई है कि समाज मेें लड़कियों की कमी है. किसी को यह शिकायत रहती है कि लड़के और लड़कियों के संबंध नहीं हो पा रहे हैं. कोई यह कहता नजर आता है कि क्या करें, बच्चों की उम्र ज्यादा होती जा रही है पर अच्छे संबंध नहीं मिलते. कहीं लड़की अधिक पढ़ी लिखी रहती है तो उसके योग्य लड़का नहीं मिलता. इस तरह की शिकायतों की श्रृंखला बढ़ती चली जा रही है.

आज वैवाहिक संबंध तय करने के पहले बहुत सोचना पड़ता है, बहुत कुछ देखना-समझना पड़ता है. आज अपने बच्चों की शादी करने के पहले की हमारी धारणा में बहुत परिवर्तन आ गया है. वैवाहिक रिश्ते तय करने के हमारे मापदंड बदल गये हैं और जब किसी विषय में हमारे मापदंड बदल जाते हैं, मूल्यांकन की कसौटियां बदल जाती हैं तो स्वाभाविक है हमारी मानसिकता में भी बदलाव आ जाता है और फिर समाज का रूप भी बदला सा लगने लगता है. जब हम अपनी मानसिकता में आये बदलाव से सामंजस्य नहीं बैठा पाते तो हमें चारों ओर समस्याओं का जाल बिछा नजर आता है. हमें अपनी धारणा में आये मौलिक परिवर्तन को स्वीकार करना होगा.

आज समाज में शिक्षा का स्तर बढ़ता चला जा रहा है. रहन-सहन का स्तर ऊंचा होता चला जा रहा है. परिस्थितिवश लड़कियों की संख्या में कमी आती जा रही है. ‘हम दो हमारे दो‘ की जगह ‘हम दो हमारा एक‘ की भावना बलवती होती चली जा रही है.

ऐसे में जिस दंपति की पहली संतान लड़का होता है, वह दूसरी संतान की चाहत नहीं रखता. लड़की होने पर लड़के की चाहत अवश्य रहती है और इस तरह लड़कियों की संख्या में कमी होती चली आ रही है. परिस्थितिजन्य ऐसे ही कारणों से वैवाहिक संबंधों के बारे में हमारे चिंतन को नई दिशा देना आवश्यक हो गया है.

वैवाहिक रिश्ते जोड़ने के लिए सभी को सुयोग्य वर-वधू की तलाश होती है किंतु हम अपनी बेटी के लिए सुयोग्य वर तथा अपने बेटे के लिए सुयोग्य वधू के बारे में ऊंचे-ऊंचे मंसूबे पालकर अपने समाज की वास्तविक परिस्थिति को नजरअंदाज कर देते हैं. इन ऊंची व्यक्तिगत आकांक्षाओं के चलते न तो सुयोग्य वर ही मिल पाता है और न ही वधू मिल पाती है.

हमारी हमेशा यह धारणा रहती है कि लड़की की उम्र लड़के से कम हो, लड़की लड़के से कम पढ़ी-लिखी हो, सुंदर हो, गुणवान हो, शीलवान हो, साथ में मोटा दहेज भी लाये. लड़की वालों की चाहत रहती है कि लड़का उच्च शिक्षित हो, सुंदर हो, स्मार्ट हो, अपने पैरों पर खड़ा हो, परिवार माडर्न विचारों वाला हो अर्थात् आधुनिक रूप से समृद्ध तथा सुसभ्य हो.

एक तरफ तो हम अपनी बेटियों को स्वच्छंद वातावरण में पाल रहे हैं दूसरी ओर वधू को शीलवान, गुणवान रूप में देखना चाहते हैं. ऐसी विरोधी परिस्थिति में दोनों ही परिवारों को अपने विचारों में थोड़ा बदलाव लाना होगा.

शिक्षित लड़कियों में आर्थिक सुखों व स्वतंत्रा मानसिकता की चाहत बढ़ रही है. दूसरी ओर लड़के भी सुंदर, शहरी, संपन्न घर की युवती की चाहत रखने लगे हैं लेकिन क्या प्रत्येक को सुंदर, आकर्षक व सर्वगुणसंपन्न जीवन साथी मिल सकता है? अतः प्रत्येक पक्ष को व्यक्तिगत, पारिवारिक एवं समाज के दायरे में रहकर ही अपने बच्चों के लिए जीवन-साथी ढूंढना चाहिए ताकि वर वधू दोनों जीवन पथ पर साथ चलने में एक दूसरे के योग्य साथी साबित हो सकें.

ऊंची आशा-आकांक्षा रखकर बेटे के लिए वधू तथा बेटी के लिए वर खोजना, शिकायतों को ही जन्म देता रहेगा जो आज हमारे सामने मुंह बाये खड़ी हैं.  वर-वधू के संबंध में आने वाले प्रस्तावों पर व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए. सकारात्मक दृष्टिकोण से समस्याएं स्वतः कम होती चली जाती है. नकारात्मक मानसिकता रखने से प्रतिफल भी नकारात्मक ही होता है.

एक बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि दुनियां में हर कोई पूर्ण नहीं होता और न ही सभी को सब कुछ मिलता है, अतः व्यावहारिक सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाकर वर-वधू के चयन में दिलचस्पी ली जाय तो इस संबंध में कोई भी उलझन नहीं आयेगी और हमारे बच्चों के लिए अच्छे संबंध मेें कोई तकलीफ नहीं आयेगी. 

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