परशुराम संबल. सत्पुरूष अपने तन, मन धन और निस्वार्थ भाव से मानव जाति की सेवा में जुटे रहते हैं. इसके फलस्वरूप वे किसी मान अथवा पुरस्कार की कामना तक नहंीं करते. दीन-दुखियों, असहायों और रोगियों की सेवा में अपने जीवन को लगाकर उन्हंे परम सुख  और शान्ति की अनुभूति होती है. अमीर-गरीब या जाति पाति का क्लेश इन महान् व्यक्तियों में लेशमात्रा का भी नहीं होता.

ऐसा ही एक पुराना प्रसंग हैः-

पृथ्वी पर किये गये अपने कर्मों स्वरूप महात्मा विद्रुध को मरने के पश्चात् स्वर्ग की प्राप्ति हुई. स्वर्ग के नियमानुसार उन्हें वहां सभी प्रकार के दिव्य और अलौकिक सुख प्राप्त होने लगे परन्तु जो व्यक्ति कर्म को अपना कर्त्तव्य मानता हो और भोग विलासिता से सदा कोसों दूर रहा हो, ऐसा वैभवपूर्ण वातावरण उसके लिए घुटन भरा हो जाता है.

पुण्यात्मा विद्रुध ने कुछ समय तो यों ही निठल्ले रूप में काट दिया परन्तु जैसे-जैसे समय खिसकता गया, वे चिन्तित और खिन्न से रहने लगे. महात्मा के दिन रात चिन्तातुर रहने की सूचना देवराज इन्द्र तक पहुंचाई गई. स्वर्ग जैसे स्थान में विद्रुध के अशांत रहने की सूचना पाकर देवराज इन्द्र भी आश्चर्य में डूब गये.

एक दिन इन्द्र का दरबार लगा हुआ था. सारे देवतागण उपस्थित थे. विद्रुध भी वहां विराजमान थे. इन्द्र ने उनके मलिन चेहरे को देखकर पूछ ही लिया - ‘कहिए महात्मन्, यहां स्वर्ग में आपको किसी प्रकार की असुविधा अथवा कष्ट तो नहीं है?‘

इस पर विद्रुध बड़े शान्त स्वर में इन्द्रदेव से बोले ‘नहीं देवराज, कष्ट तो मुझे कुछ भी नहीं है परन्तु मैं ऐसे वातावरण का अभ्यस्त नहीं हूं. बड़ा उपकार होगा यदि आप मुझे पुनः धरती पर भेज दें.‘

देवराज इन्द्र ने संयत और शांत वाणी में महात्मा से पूछा- ‘ऐसा क्या कारण है कि स्वर्ग का अलौकिक और अनन्त सुख आपको भाया नहीं? क्या यहां उपलब्ध सुख सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं?‘

‘देवराज क्षमा हो, जो सुख यहां है उस सुख की तनिक भी इच्छा मुझे नहीं है.‘‘

‘परन्तु क्यों?, उत्सुकता भरे स्वर में इन्द्र ने पूछा. 

‘मैंने पृथ्वी पर सारा जीवन तप, परमार्थ और पुण्यों में ही  व्यतीत किया है, इसलिये स्वर्ग के सुख में मेरी आत्मा को शान्ति  नहीं मिलती. मैंने सारा जीवन कभी सुख न तो भोगे और न ही ऐसी कामना की. यही कारण है कि स्वर्ग में मेरे लिये वास करना अत्यंत  कठिन हो गया है.‘

सारे देवता महात्मा विद्रुध की बात सुनकर अवाक् एक दूसरे का मुंह ताक रहे थे.

‘आप फिर से पृथ्वी पर जाकर क्या करेंगे?, देवराज इन्द्र ने प्रश्न किया.

‘फिर वही करूंगा जिसके करने से मुझे स्वर्ग की प्रप्ति हुई है. लोकसेवा, परोपकार और दीन दुखियों की सेवा तथा जो परमार्थ के हित में भी कार्य हैं उन्हें अपना कर्त्तव्य मानकर पूरा करूंगा.‘

‘परन्तु ऐसे सब कार्य करने पर आपको पुनः स्वर्ग की प्राप्ति होगी, यह तो निश्चित है.’ इन्द्र ने मुस्करा कर विद्रुध से कहा.

‘मैं फिर आपसे धरती पर भेजने का निवेदन करूंगा.‘

विद्रुध पृथ्वी पर आकर तप, धर्म और हजारों दीन-दुखियों की सेवा में लग गये. अब वे अधिक प्रसन्न, संतुष्ट और शान्ति का अनुभव कर रहे थे. 

आज का दिन : ज्योतिष की नज़र में


जानिए कैसा रहेगा आपका भविष्य


खबर : चर्चा में


************************************************************************************




Disclaimer : इस न्यूज़ पोर्टल को बेहतर बनाने में सहायता करें और किसी खबर या अंश मे कोई गलती हो या सूचना / तथ्य में कोई कमी हो अथवा कोई कॉपीराइट आपत्ति हो तो वह info@palpalindia.com पर सूचित करें। साथ ही साथ पूरी जानकारी तथ्य के साथ दें। जिससे आलेख को सही किया जा सके या हटाया जा सके ।