विनोद बब्बर. घुमक्कड़ी के अनेक लाभ -हानि हैं. सबकी चर्चा करने पर संभव है कि बात किलोमीटरो लंबी होकर आपको नाराज कर दें लेकिन यह जानकर आप हर्गिज नाराज नहीं होंगे कि उड़ीसा में कटक नगर के निकट एक स्थान का नाम ही ‘नाराज’ है. कई बार उड़ीसा जाने का अवसर मिला.

जगन्नाथ पुरी, भुवनेश्वर देखा लेकिन एक बार किसी ने ‘नाराज’ देखने का सुझाव दिया तो बिना नाराज हुए उसे ही साथ लेकर कटक से लगभग 15 किमी दूर उस स्थान पर पहुंचा जो कभी बौद्ध अध्ययन केंद्र था. कभी दुनिया भर से लोग प्रसन्नता पूर्वक इस ‘नाराज’ में बौद्ध दर्शन को जानने के लिए आते थे. आते तो अब भी हैं लेकिन अब उन स्मृतियों के स्मारक को देखते हैं. कठाजोडी नदी को देखते है.

कठाजोडी महानदी का उद्गम स्थल है. आश्चर्य नहीं कि ‘नाराज’ नामक इस रमणीक स्थान पर आकर मन की हर नाराजगी तिरोहित हो जाती है.

नाराज तो सब हो सकते हैं लेकिन सब उस ‘नाराज’ तक पहुंच नहीं सकते. सब तो उस ‘नाराज’ को जान भी नहीं सकते. जिसे नाराज ही होना हो, वह चाहे तो इसी बात पर नाराज हो सकता है कि हमने इस ‘नाराज’ की जानकारी उससे अब तक क्यों छुपाई? नाराज होना कोई पाप या अपराध तो है नहीं. यह एक ऐसी मानवीय प्रक्रिया है जो दुनिया में हुए अनेको बदलावों के बावजूद बिना बदले जस की तस जारी है. इसीलिए मैं, आप, वे, ये सब उचित समय पर अपने-अपने ढ़ंग से, अपनों से नाराज होकर नाराज होने के अपने अधिकार को संरक्षित करते रहते हैं.

जब कोई हमें मनमानी करने से रोकता है तो हम नाराज होकर मुंह फुला लेते हैं. ऐसा करना हमारा संवैधानिक अधिकार भी है. इसीलिए कुछ खाये-अघाये लोग गरीबों की चिंता में सूख-सूख कर हाथी मेरा मतलब नाराज होते रहते हैं. अब अगर आप उनके इस अधिकार पर प्रश्नचिन्ह लगाने का प्रयास किया तो वे आपसे नाराज होंगे ही.

नाराज होने और मनाने को पूरक माना जाता है. वास्तव में नाराज हुआ ही इसीलिए जाता है कि कोई मनाये और हम मन की कर पायें. नाराज होना हमारे जनजीवन का एक महत्वपूर्ण कर्मकाण्ड है. शादी विवाह में यदि कोई नाराज न हो तो बिन बैंड बाजे ढोल वाली बारात की तरह सब सूना लगता है. आमतौर पर नाराज होने के राज बिना ढूंढे स्वयं ही आपके समक्ष अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगते हैं. अब यह आपकी कुशलता है कि नाराज हुए बिना अपनी कितनी मांगे मंगाकर उनकी कितनी मांगें पूरी करते हैं.

आप रूठने को नाराज होना कहेंगे तो हम नाराज होने वाले नहीं हैं बल्कि रूठने के आपके अधिकार का सम्मान करेंगे लेकिन इस शर्त के साथ कि-

रूठना है तो शौक से रूठो, इजाजत दो मनाने की.

रूठना तुम्हारा शौक है, हमें आदत है मनाने की.

इधर सुना कि नाराज होने से भी लाभ होता है तो हम नाराज होने का अवसर ढ़ूंढने लगे लेकिन गुरु पीछे रह गया और चेला बाजी मार गया. तब जाना कि हमारे इर्द गिर्द नाराजों के इतने जंगल हैं कि खांडवप्रस्थ की अग्नि भी उन्हें इंद्रप्रस्थ नहीं बना सकती. चेला इसलिए नाराज था कि जब आज बिना परीक्षा पास किया जा सकता है तो आज से तीन दशक पहले हमने उसे फेल क्यों किया था जबकि उत्तर पत्रिका पर उसका नाम रोल नंबर बिल्कुल ठीक लिखा था. एक इसलिए नाराज है कि हम उसे टिकिट नहीं दिला सके लेकिन नाराज तो वह भी हैं जो टिकिट होते हुए भी सत्ता की बस पर चढ़ नहीं सका.

कोई इसलिए नाराज है कि उसे उसकी पसंद के साथी को जीवनसाथी बनने से रोका जा रहा है लेकिन जिसे नहीं रोका, वह भी नाराज है. उसका तर्क तर्कशास्त्रा की कसौटी पर सौ में से सौ अंक प्राप्त कर सकता है. कौन न मर जाये उस मासूम से तर्क पर, ‘मैं तो अनाड़ी था. मुझे गलत राह पर जाने से रोकना आप जैसे गुणी ज्ञानी का दायित्व था.’ कोई इसलिए नाराज है कि हमने साथ नहीं दिया पर वह कहां खुश है जिसे हमने खूब सपोर्ट किया. नाराज होना कोई बड़ी बात नहीं. नाराज होने के बहानों की सूची जरूर अन्तहीन है लेकिन सभी को न ‘राज’ दिया जा सकता है और न ‘ताज’. इसलिए कुछ तो नाराज हांेगे ही. वे अपना ‘नारा’  जरूर उछालेंगे ही.

फिलहाल अमेरिका चीन से नाराज है. चीन भारत से नाराज है. भारत पाकिस्तान से नाराज है तो पाक की नाराजगी अपने आपसे है इसलिए वे बड़े पैमाने पर इलाज की नहीं, बड़े प्लाट की व्यवस्था कर रहे हैं. मशीनें लगाकर खुदाई भी करा रहे हैं क्योंकि खुदा भी उनसे नाराज है जो अपनी नासमझी के कोरोना को खुदा के नाम डाल रहे हैं. खुदा ने उन्हें अक्ल दी, उन्होंने गिरवी रख दी उनके पास जिनकी अक्ल से दुश्मनी है. नतीजा तुम हलकान और हम भी परेशान. नाराज तो मेरा-आपका भगवान भी है. हम-आप भी कहां लाक डाउन को समझ रहे हैं. लाक के अतिरिक्त सब डाउन रखने का परिणाम नहीं समझा तो मिटना तय है. तब हमारी नाराजगी का क्या होगा. अपनी नाराजगी को जिंदा रखने के लिए तो हमे जिंदा रहना ही पड़ेगा.

आओ भूल जायें सबकी नाराजगी ताकि जिंदा रह सकें. ‘नारा’ जगी कि कोरोना ने घुमक्कड़ी के पैरों में बेडि़यां क्यों डाली हैं? जिन पैरों में कुछ जानने, सीखने के जनून के घुंघरू थे, वहां चाइनीज वायरस की बेडि़यां कब तक रहेगी? आज उड़ीसा के उस ‘नाराज’ की कहानी भी सुना दी लेकिन रूके हुए इन कदमों की नाराजगी यह कि कल के लिए कहानी कहां से लाओगे!

मेरे पंखों की उड़ान को इतना भी न रोक कि आसमान अकेला छूट जाये.

मेरे सब्र का इतना भी इम्तिहान न ले कि बेसब्री से बेडि़यां ही टूट जाये.

किसी का सुख चुराऊं, किसी की नींद उड़ाऊं तो तेरा हर जुल्म जायज है,

इतना भी न सता कि नाराजगी के इस मौसम में बहार ही हमसे रूठ जाये.

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