अर्जुन शर्मा. आज मेरे भीतर से फिर वो सवाल अपना फन उठा रहा है. कौन है भगवान! क्या है भगवान अर्थ क्या है भगवान शब्द का? बहुत साल पहले एक विद्वान ने बताया था इस शब्द का अर्थ. भ से भूमि, ग से गगन, व से वायु, अ (आ की आवाज) से अग्नि और न से नीर पर ये तो वो पांच तत्व हैं जिन्हें विज्ञान भी प्रमाणित करता है कि इन पांच तत्वों से ही मानव का शरीर बना हुआ है. तो क्या इसका अर्थ वो ही है जो साधारण बुद्धि से समझ में आ रहा है.

भगवान का अर्थ पांच तत्वों से बना मनुष्य यानी मनुष्य में भगवान है या मनुष्य ही भगवान है.
यदि मनुष्य स्वयं ही भगवान है तो क्या खोजने जाता है पहाड़ों की कंदराओं में. क्यों जाता है.

इसे कौन जाने को उकसाता है! क्या भगवान स्वयं! जो खुद उसके भीतर विराजमान है. गुरु नानक साहिब ने पहली बार इस शक्ति को पहचाना था. कहा था, ईश्वर निराकार है यानी निर-आकार. जिसका कोई आकार नहीं जैसे बिजली है. सूरत कैसी है बिजली की. क्या किसी ने देखा है कभी बिजली को. हां महसूस होती है. पावर कट लग जाए गर्मी में तो तुरंत पता चल जाता है कि लो जी गई बिजली. गर्मी से पसीने से तर-ब-तर किए होती है. तभी पंखा चलने लगता है.

पसीने से लथपथ शरीर पर पंखे की हवा का पड़ता झोंका जता देता है लो जी आ गई बिजली.
हो सकता है किसी को मेरा कहना अच्छा न लगे. मैने धर्म ग्रंथों, विशेष तौर पर गुरुबाणी व गीता से ईश्वर की तलाश की कोशिश की. जितना मेरी तुच्छ बुद्धि के समझ में आया, उससे लगता है कि मैने ईश्वर को पहचान लिया है. आप जान लें कि मेरे हिसाब से कौन है ईश्वर.

प्रकृति. कुदरत. वनस्पति. मिट्टी. जल. वायु. इन सब को संचालन करने वाली शक्ति जो दिखती नहीं, महसूस होती है. कभी तपती गर्मी में किसी छायादार पेड़ के नीचे रुकिए. लगेगा कि गर्मी के आवरण से किसी दूसरी दुनिया में प्रवेश मिल गया. बेहद राहत मिलती है. ठंडा जल ग्रहण करें. भीतर से आवाज निकलेगी. हे ईश्वर,! ईश्वर ने, कुदरत ने वो हर चीज पहले से ही बना रखी है जिनको आज नए अविष्कार कहा जाता है. रिसर्च यानी रि-सर्च. हो चुकी सर्च की दोबारा पड़ताल.
इंसान ने हवाई जहाज बनाया, सौ-दो सौ साल पहले. ईश्वर ने सदियों पहले बना दिया था. पंछी. पंछी की रि-सर्च है हवाई जहाज. इन्सान ने पनडुबी बनाई, सौ-दो सौ साल पहले. ईश्वर ने सदियों पहले बना दी थी मछली. क्या एक मुट्ठी भर मिट्टी बना सका है कोई आज तक, एक मुट्ठी भर मिट्टी. जहां भी जाओ, मिट्टी के ढेर हैं. किसने बनाई ये मिट्टी. ईश्वर ने. ब्रह्मांड में जितने भी पेड़ पौधे, घास फूस, फल-फूल का यहां तक कि एक तिनका भी सबके पीछे कोई तर्क है. सबका कोई न कोई उपयोग है. ईश्वर हर समय किसी न किसी रूप में हमारे सामने रहता है. हम उसके असली रूप को तो तबाह करने पर तुले हुए हैं और उसे ढूंढने जाते हैं मंदिरों में, गिरजों में, गुरुद्वारों में.

हम मिट्टी में जहर मिला रहे हैं. वनस्पति को जहरीला कर रहे हैं. पानी को दूषित कर रहे हैं. एक पेड़ कितने वर्ष में जवान होता है, उसमें कुदरत कितनी मिट्टी कितना पानी इस्तेमाल करती है. वो कितनी आक्सीजन देता है. ये जाने बिना विकास के नाम पर एक ही दिन में हजारों पेड़ काट रहे हैं. उनकी जड़ों को भी खोद खोद कर निकाल रहे हैं कि कहीं ये ससुरा फिर से उगने की गुस्ताखी न कर सके.

कुदरत के कहर से प्रभावित पूरा विश्व आपदा ग्रस्त है. इससे साफ जाहिर है कि दुनिया में आर्थिकता से जुड़ी बहुत बड़ी प्राचीरों से लेकर कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट समेत दुनिया का दिखावे वाला अर्थतंत्रा तबाह हो चुका है. किसने किया. ईश्वर ने, कुदरत ने. माफ करें त्रासदी बहुत ज्यादा बड़ी है. लाखों जानें जा चुकी हैं पर ये आंकड़े ये संदेश नहीं देते कि ईश्वर, कुदरत क्या चाहते हैं. कुदरत जमींदार के मरने से दुखी नहीं, किसान को जिंदा रखने में संघर्षरत है. कुदरत की मार के दौर में जब अखबारें बताती हैं कि इतने लाख करोड़ का कारोबार तबाह हो गया पर देखता हूं तो दुनिया तो वैसे की वैसी ही खड़ी है. भवन की कीमत कम होने से भवन को क्या फर्क पड़ता है? क्या कीमत कम होने से उसकी इमारत आधी रह जाती है? फिर से उफनती निर्मल जलधारा बहाती नदियां, साफ स्वच्छ आसमान हमें क्या संदेश देते हैं.

भगवान रूपी कुदरत हम हिंदुस्तानियों को तो कम से कम यही कहती दिखती है कि मत आएं मेरे घर. मैदान की गंदगी, प्लास्टिक की बोतलें, पालीथीन का कचरा मुझसे दूर रखो. मेरी आस्था के चलते आने वालों को ठगने वाले पापी मेरी धरती से दूर रहें. मेरी आस्था के नाम पर पिकनिक मनाने वाले कोई और मनोरंजक स्थान चुन लें. मुझे पाना है तो अपने घर दो पौधे लगा कर उनकी सेवा करें. पानी दें. उन पौधों को छू कर आने वाली हवा के माध्यम से मैं आपको आपके घर आ कर मिल जाया करूंगी.

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