हर संकट नई सीख और नई समझ पैदा करता है. कोरोना संक्रमण ने सम्पूर्ण राष्ट्र को एकजुटता की सीख और आपसी सहयोग की समझ विकसित किया है. चीन द्वारा उत्पादित यह कृत्रिम आपदा पूरी दुनिया में आफत की तरह अचानक आई. लाखों लोगों के कदम जहां थे,वहीं ठिठकने को विवश हो गए. सबसे कठिन स्थिति समाज के उस तबके के सामने पैदा हुई जो रोटी-रोजगार के लिए अपना घर छोड़कर परदेश में था. सहसा लगा कि इतने सारे लोगों का प्रबंधन कैसे होगा? परन्तु भारतीय संस्कार निखरकर सामने आया और समृद्ध वर्ग असहाय वर्ग की मदद के लिए मैदान में उतर पड़ा. कड़ियां जुड़ती गईं और पूरे देश में मददगारों की लम्बी चैन बन गई. पहली बार सोशल मीडिया का सकारात्मक प्रयोग हुआ. सहयोग के लिए फेसबुक, ट्वीटर, व्हाटसअप सबसे सार्थक साधन साबित हुए. नतीजा, आठ अप्रैल-2020 से शुरू हुआ मदद का सिलसिला सतत बढ़ता गया और दूर-दराज में फंसे लोगों तक सहयोग पहुंचता गया.

25 मार्च को देश लॉकडाउन हो गया. लोग घरों में कैद हो गए. पूरे पखवाड़े देश में सन्नाटा पसरा रहा. संचित सामान से लोगों ने गुजर किया, लेकिन अप्रैल का पहला सप्ताह बीतते भोजन-राशन का संकट मंडराने लगा.  दूर फंसे लोगों ने तब उक्ति लगाई और उन्होंने अपनी समस्या फेसबुक में पोस्ट करनी शुरू कर दी. वह पोस्ट वहां से साधन बदलता हुआ दौड़ना शुरू किया. फेसबुक की सूचना ट्वीटर पर आने लगी. बस, यहीं से सहयोग का सिलसिला चल पड़ा. ट्वीटर पर जो जिस राज्य में प्रभावी था, उसे टैग कर मदद का आग्रह किया गया और कुछ घंटों में संबंधित व्यक्ति तक मदद पहुंच गई. मुम्बई, नागपुर, पुणे, सूरत, बदोदरा, अहमदाबाद, दिल्ली, हैदराबाद जैसे महानगरों में बहुतायत में श्रमिक वर्ग काम के लिए जाता है. लॉकडाउन के बाद सर्वाधिक संकट की स्थिति उनके सामने पैदा होना स्वाभाविक है. सभी राज्यों में राजनीतिक दलों में भाजपा के कार्यकर्ता इस काम में सबसे आगे थे. संगठनों में विभिन्न तरह की सामाजिक संस्थानों के अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका सबसे उम्दा थी. संघ के अनुषांगिक संगठन सेवा भारती,चौपाल, दीनदयाल शोध संस्थान द्वारा जहां भोजन के पैकेज दिए गए, वहीं घर के लिए आवश्यक रसोई के सामान की पूरी किट बनाकर लोगों तक पहुंचाई गई. जो आंकड़ा सामने आया, उसके अनुसार अप्रैल-मई माह के 30 दिनों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा देश के 69 हजार जगहों पर साढ़े लाख से ज्यादा कार्यकर्ताओं द्वारा जरूरतमंदों को 60 लाख राशन किट, 4करोड़ 17 लाख भोजन के पैकेज बांटे गए. यही नहीं संघ द्वारा 50 लाख मास्क भी लोगों को वितरित किए गए.

महाराष्ट्र में रमेश सोलंकी टीम, दर्शन एन. पोपट, अतुल कुलकर्णी, फीड-नीड ग्रुप, मुम्बई पुलिस, गुजरात में सांसद सी.आर. पाटिल, मनीष कापड़िया, भविन भाई टोपीवाला, नागपुर में केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी, नागपुर महापौर, पुणे में संदीप जाधव, संकेत शाह जरूरतमंद लोगों की मदद करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं. महाराष्ट्र में कांग्रेस,एनसीपी के लोगों ने भी सहयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है,लेकिन समय के साथ कदमताल मिलाकर चलने में वह पिछड़े रहे. मप्र में तीन-चार नामों का उल्लेख करना जरूरी है. पूर्व मंत्री व रीवा विधायक राजेन्द्र शुक्ला की तरफ से देश के किसी भी हिस्से में फंसे मप्र के लोगों की हरसंभव मदद की गई. राजेन्द्र शुक्ला से जुड़े दो उल्लेखनीय किस्से बताना जरूरी है. इस लॉकडाउन में सतना की गर्भवती महिला पति के साथ गुजरात से पैदल निकल पड़ी थी. रास्ते में दर्द हुआ. राजेन्द्र शुक्ला को पता चला, उन्होंने तत्काल चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना, उसे वाहन से घर पहुंचवाया. दूसरा  वाकिया श्रमिकों से जुड़ा है. बहादुरगढ़ से श्रमिकों का जत्था पैदल रीवा के लिए निकल लिया. दिल्ली पहुंचने तक उनके पैरों में छाला पड़ गया. फेसबुक में पोस्ट डाला और राजेन्द्र शुक्ला ने तुरंत गुरूग्राम में उनके भोजन और रहने का प्रबंध कराया. विंध्य क्षेत्र के लोगों की मदद करने में राज्यसभा सांसद अजय प्रताप सिंह भी पूरे मनोभाव से काम किए. वहीं इन्दौर विधायक रमेश मैंदोला, विधायक आकाश विजयवर्गीय द्वारा मालवा में देश के वि•िान्न हिस्सों से फंसे लोगों की पूरी सहायता की गई. सहयोगी कार्य में सबसे महत्वपूर्ण पहलू ये रहा कि सांसद हो या विधायक किसी ने क्षेत्रीयता का भाव नहीं दिखाया. कोरोना संकट में वास्तव में जनता और प्रतिनिधि एक पक्ति में एक सूत्र से बंधे हुए काम किए.

यह काम किसी योजना के तहत नहीं हुआ. बल्कि,स्वप्रेरित होता चला गया. सार्थकता के साथ इसलिए हो सका,क्योंकि किसी के मन में व्यक्तिगत फायदे की मंशा नहीं थी. इसलिए किसी ने किसी का परिचय जानने का प्रयास नहीं किया. बस, सहयोगी हाथ बढ़ते चले गए और मदद होती चली गई. सबसे उल्लेखनीय बात ये है कि लाखों लोगों की मदद करने वाले कोई किसी से ना कभी मिले थे और ना ही उनकी कभी बात हुई, लेकिन मौन संवाद इतना प्रभावी रहा कि कहीं से यह आभास नहीं हुआ कि देश में अपरिचितों की टोली मिलकर सामाजिक कार्य कर रही है. इसमें एक उल्लेखनीय पहलू ये भी है कि मदद मांगने वाला भी उसी अधिकार से सहयोग मांग रहा था, जैसे लोग परिवार के सदस्य से मांगते हैं. सारा काम संदेश से हो रहा था. ऐसा नहीं है सहयोग का काम केवल शहरी क्षेत्र में हुआ. रीवा, सीधी, सतना के वह लोग जो पुणे शहर से 40 किमी दूर गांवों में फंसे थे, उन्हें राशन पहुंचाने का काम हुआ. सूरत से 30 किमी दूर ग्रामीण क्षेत्र में फंसे विंध्य के लोगों की भी मदद की गई. मुम्बई में सुदूर जगहों पर फंसे लोगों को भी मदद पहुंचाई गई. ट्वीटर पर व्यक्तिगत संदेश के जरिए मदद का बहुत प्रभावी काम हुआ. कोरोना काल में मदद के बहुत अलग-अलग अनुभव रहे. कई जगहों पर जिनकी तरफ से मदद मांगी गई, उनकी ओर से असहयोग किया गया. कई जगहों पर ऐसा हुआ जहां राशन लेकर पहुंचे सहयोगियों के फोन करने पर उन्हें बाद में आकर देने को कहा. कुछ ऐसे लोग भी मिले, जो राशन मिलने के बाद बताना उचित नहीं समझे. वास्तव में सहयोग के लिए जो नंबर दिया जाता था, पहले उसमें फोन करके पता लगाया जाता था कि उन्हें किस चीज की जरूरत है. वह किस जगह पर हैं. कुछ पोस्ट मजाक के लिए भी किए गए. राशन की आवश्यकता होने की बात कही गई, फोन करने पर इनकार कर दिया गया.

कुछ पोस्ट इस तरह के भी आए, जो मन को छू गए. मेरे ट्वीटर अकाउंट पर एक रात के डेढ़ बजे आठ साल के बच्चे की फोटो के साथ उप्र के एक शहर से एक संदेश आया. संदेश निजी कम्पनी में काम करने वाले व्यक्ति का था,  जिसकी नौकरी चली गई थी. वह संदेश बड़ा मार्मिक था. संदेश में लिखा था कि आज राशन खत्म हो जाने के कारण उनका बच्चा भूखा सो गया. मेरो मन व्याकुल हो गया. समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें. अभी तक जितना काम किया था, वह सब व्यर्थ लग रहा था. रात में उनसे फोन पर बात करके नंबर लिया और सुबह का इंतजार करने लगा. सुबह दिल्ली में उसी शहर के रहने वाले अपने मित्र हर्षवर्धन त्रिपाठी को  फोन लगाया. उनसे सारा किस्सा साझा किया. उन्होंने तत्काल उस शहर में उसी मोहल्ले में रहने वाले अपने मित्र को फोन लगाया. कुछ देर में राशन पहुंच गया. उस पोस्ट को हमारे मित्र सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने देखा उन्होंने तत्काल केन्द्रीय मंत्री महेन्द्र पाण्डेय को मदद के लिए कहा. इसके बाद उस व्यक्ति को कलेक्टर के यहां से पूरी मदद मिली. इसी तरह से दिल्ली में बिहार दरभगा की विधवा महिला जो संकोच में मदद नहीं मांग रही थी, उसके बारे में एक सज्जन से जानकारी मिली. तत्काल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार समित के सदस्य राजीव तुली के माध्यम से उसका सहयोग किया गया.

आठ अप्रैल से मई माह तक सोशल मीडिया के जरिए देशभर में लाखों लोगों द्वारा लाखों लोगों के सहयोग का कार्य किया गया है. 21वीं सदी में आधुनिक साधन का प्रयोग करते हुए पुरातन पद्धति के संस्कारी तरीके के कार्य का इससे बड़ा उदाहरण और कोई नहीं हो सकता है. शायद लोगों के इसी सहयोगी भाव के कारण कोरोना को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में फंसे लोगों को भोजन-राशन से संबंधी समस्या का सामना नहीं करना पड़ा, क्योंकि इस देश में संवेदना, समभाव अभी कायम है.

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