मुद्दा. ‘बाढ़ की संभावनाएं सामने हैं और नदियों के किनारे घर बने हैं.’ यह पंक्ति है दुष्यंत कुमार की गजल की. मानवीय विडंबनाओं, विरोधाभासों और विसंगतियों पर इससे अच्छी और कोई टिप्पणी नहीं हो सकती. मिथ्या आनंद और क्षणिक उत्तेजना के लिए जानबूझ कर मौत के मुंह में जाने की कोशिश समझ से परे है.

वास्तव में यह स्वपनिल दुनिया की खोज में स्वयं के प्रति सबसे बड़ी लापरवाही है जिसके लिए कोई अपने तन-मन को शराब में डुबो देता है तो कोई सिगरेट, बीड़ी या सिगार के धुंए में. कोई नशीले पदार्थों के सेवन से अपनी बोझिल सांसों को थपकियां देकर सुलाता है तो कोई तंबाकू या तंबाकू युक्त पदार्थों को गले में उतारकर क्षणिक सुकून पाता है.

इन व्यसनों में मजा लेने वाले यह भूल जाते हैं कि यही मौत रुपी भीषण कज़ा है और दर्जनों जानलेवा बीमारियों की मुंह फाड़े अनंत तक जाती कतार. जिस रास्ते पर वे कदम बढ़ाते हैं, उसकी मंजिल है-सिर्फ असमय मौत या फिर कष्टकारी जीवन. ऐसी स्थिति के लिए किसी शायर ने बिल्कुल ठीक कहा है- ‘जिंदगी से तो खैर शिकवा था, मुद्दतों मौत ने भी तरसाया.’

अपने ही मुंह पर यह छोटा अग्निकांड कितना घातक है, इसका प्रमाण यह है कि जलती हुई सिगरेट के मुंह पर 90 सेंटीग्रेड का तापमान होता है और श्वास में खींचे गए धुंए का 30 सेंटीगे्रड का तापमान जो एक इंच सिगरेट रह जाने पर 50 सेंटीग्रेड हो जाता है. यह ताप श्वास नलिका को अत्यंत नुकसान पहुंचाता है. एक सिगरेट प्रायः 500 मिलीग्राम धुंआ उगलती है. इसमें अत्यंत हानिकारक रसायन होते हैं. इन रसायनों की संख्या चार हजार बताई जाती है जिनमें से 43 कारसोजेनिक होते हैं जो कैंसर उत्पन्न करते हैं.

अनुमान है कि विश्व की एक तिहाई वयस्क आबादी धूम्रपान करती है. इसके परिणामस्वरुप 35 लाख लोग विश्व में प्रतिवर्ष मौत के मुंह में समा जाते हैं. भारत में यह व्यसन करीब 4 लाख लोगों को धर दबोचता है. दुनिया में प्रति दस सैकंड में एक व्यक्ति धूम्रपान जन्य रोगों से मृत्यु का ग्रास बनता है. यदि यही स्थिति अविराम चलती रही तो वर्ष 2025 तक तंबाकू सेवन व धूम्रपान से मरने वालों की संख्या पचास लाख हो जाएगी.

इस व्यसन से जो बीमारियां आदमी को जकड़ती हैं, उनमें मुंह और फेफड़ों का कैंसर, ब्रोन्काइटिस, हृदयाघात, फेफड़ों में हवा भर जाना प्रमुख है. इसके अलावा इससे आंखें भी खराब होती हैं और कभी अंधत्व की स्थिति भी पैदा हो जाती है.

यह सबसे बड़ी त्रासदी है कि आज विश्व में पंद्रह प्रतिशत बच्चे धूम्रपान करते हैं और इतना ही दुखद तथ्य यह है कि चालीस प्रतिशत महिलाएं भी इस जानलेवा शौक की शिकार हैं. भारत में धूम्रपान करने वाली महिलाओं की संख्या लगभग 30 प्रतिशत है. महिलाओं द्वारा गर्भ काल में धूम्रपान करने से गर्भस्थ शिशु पर सीधा दुष्प्रभाव पड़ता है और बच्चे में विकृति आ जाती है.

जन जागरुकता जनतंत्रा में सबसे बड़ा हथियार होता है. यही कारण है कि अनेक सरकारी और गैर सरकारी संगठन अपने-अपने ढंग से धूम्रपान के विरोध में सक्रिय हैं. उधर विश्व स्वास्थ्य संगठन के आह्वान पर दुनिया भर में प्रतिवर्ष 31 मई को तंबाकू निषेध दिवस मनाया जाता है पर परिणाम होता है- वही ढाक के तीन पात. इस तरह के दिवस उद्देश्य की सीमित या सांकेतिक पूर्ति ही कर पाते हैैं और कई व्यक्ति इसे उबाऊ कर्मकांड मानकर इसकी हंसी तक उड़ाते हैं.

लोकतंत्रा में सरकारें जनमत के दबाव की उपेक्षा नहीं कर सकती मगर इस तरह की सामाजिक बुराइयों को खत्म करने के लिए कानून पर्याप्त नहीं होते. इसके लिए जन जागरण प्रभावी हथियार सिद्ध होता है. नशा चाहे छोटा हो या बड़ा, वह मनुष्य के विवेक को सबसे पहले आहत करता है.

इसका सबसे बड़ा प्रमाण तो यही है कि अनेक लोग शराब या धूम्रपान के खतरों के बारे  में जानते हुए भी उसे बार-बार मुंह से लगाने की गलती करते हैं.

ऐसी गलतियों को ‘प्रसापराध’ कहा जाता है और प्रसापराध करने वाले का परिणाम अत्यंत दुखद एवं भीषण होता है. ऐसे लोग अपने हाथों से अपनी कब्र स्वयं खोदते हैं. यह निसंदेह उनकी निजी मूर्खता है.

साथ ही यह सभ्यता का भी अभिशाप है जो जीवन की श्रेष्ठता और उपयोगिता को भूलकर हर क्षण भौतिकता रुपी मृग तृष्णा की ओर भागती रहती है. 

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