अभिमनोज. कोरोना संकट के दौरान मजदूरों को सबसे पहले गुजरात में ही बाहर का रास्ता दिखाया गया? अहमदाबाद जैसे शहर से ही पैदल चल कर एमपी, यूपी, राजस्थान आदि राज्यों में अपने घर पहुंचने की शुरूआत हुई? ये वही राज्य हैं, जिनके दम पर पीएम मोदी केन्द्र की सत्ता हांसिल करने में कामयाब रहे हैं?

यूपी के मतदाताओं ने न केवल पीएम मोदी को यूपी से सांसद बनाया, बल्कि यूपी के कारण ही पूर्ण बहुमत भी मिला, लेकिन पीएम मोदी और उनके गृहराज्य गुजरात ने मजदूरों को क्या दिया?

जिस पेट्रोल-डीजल की सरकारी लूट के कारण केन्द्र सरकार जेब भरकर आज इठला रही है, उसका थोड़ा सा हिस्सा भी मजदूरों को बसों के लिए दे दिया होता तो बेबस मजदूरों को भूखे-प्यासे सैकड़ों किमी सड़के नहीं नापनी पड़ती.

कोरोना संकट शुरू होते ही गुजरात में मजदूरों को नौकरी से निकाल दिया गया, जेब में पैसा नहीं, हाथ मेें रोटी नहीं, कारखाने बंद कर दिए गए, आनेजाने के साधन नहीं रहे, सूरत जैसे शहर में आक्रोशित मजदूर प्रदर्शन करते रहे, पुलिस की लाठियां खाते रहे, लेकिन पीएम मोदी खामोश रहे, क्यों?

क्योंकि, मजदूरों की सियासी औकात एक वोटर से ज्यादा कुछ नहीं है?

जब वोट की जरूरत हो तो पीएम मोदी मजदूरों के पैर भी धोने का नाटक कर सकते हैं, परन्तु चुनावी समय गुजर जाने के बाद मजदूरों के पैर के छालों की ओर एक नजर देखना भी जरूरी नहीं समझते हैं?

यह बात अलग है कि यूपी के सीएम योगी ने इन मजदूरों को संभाल लिया, उनके छालों पर मरहम लगाया!

वैसे भी पीएम मोदी का अनुभव अलग तरह का है जबकि, योगी को सेवा का अनुभव है, हालांकि, आपदा को लाभ का अवसर बनाने के मामले में योगी कमजोर हैं?

इन सबके बावजूद, परेशान मत होइएगा मोदीजी, इन गरीब मजदूरों की याददाश्त बहुत कमजोर है, 2024 तक तो सबकुछ भूल जाएंगे? आपने भले ही उन्हें कुछ नहीं दिया हो, परन्तु वे आपको वोट जरूर देंगे!

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