कलाकार- तृप्‍त‍ि डिमरी, अविनाश तिवारी, पाउली दाम, राहुल बोस, परमब्रता चट्टोपाध्‍याय

निर्देशक- अन्‍व‍िता दत्तामूवी

टाइप- हॉरर

अवधि- 1 घंटा 34 मिनट

बुलबुल (तृप्ति‍ डिमरी) एक ठकुराइन है. सत्‍या ठाकुर (अविनाश तिवारी), बुलबुल का हमउम्र है. इस बीच गांव में कुछ अजीब घटनाएं होती हैं. रहस्‍यमई तरीकों से लोगों की मौत का सिलसिला शुरू होता है. इस सब के पीछे एक डायन का हाथ बताया जाता है. लेकिन इन सब के केंद्र में ठाकुर की हवेली भी है. क्‍या इस हवेली में कोई राज छुपा है?

अन्विता दत्त की यह कहानी धीमी गति से बढ़ती है, काल्पनिक नाटक तो है ही, इसमें रहस्‍य की दुनिया भी है. हालांकि, बतौर दर्शक आज कहानी का अनुमान लगा लेते हैं. इसलिए इस बात की उम्मीद न करें कि यह आपको थ्र‍िल करेगी. लेकिन हां, फॉर्म्‍यूला अच्‍छा है. कहानी में लोकगीतों का संदर्भ है. यदि बुलबुल एक उदास सामाजिक त्रासदी की कहानी है.

फिल्‍म में रात के सीन्‍स में लाल रंग की रोशनी का खूब इस्‍तेमाल हुआ है. लेकिन यह प्रभावी नहीं लगता. एक पीरियड ड्रामा के लिहाज से फिल्‍म का प्रोडक्शन डिजाइन भी थकाऊ है. फिल्‍म की कहानी में थोड़ी कसावट और होती तो यह बेतहर असर छोड़ती.

राहुल बोस, पाउली दाम और परमब्रता चट्टोपाध्‍याय भी लीड कैरेक्‍टर की तरह ही प्रमुखता से फिल्‍म को संभालते नजर आते हैं. अमित त्र‍िवेदी ने फिल्‍म में डरावना और भुतहा म्‍यूजिक दिया है, जबकि वीरा कपूर ने कॉस्‍ट्यूम का जिम्‍मा उठाया. दोनों ने ही अपना काम संजीदगी से किया है.

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