जैसलमेर का किला. कुछ साल पहले जब मैं साइकिल से जैसलमेर से तनोट और लोंगेवाला गया था तो मुझे जैसलमेर में एक फेसबुक मित्र मिला. उसने कुछ ही मिनटों में मुझे पूरा जैसलमेर ‘दिखा’ दिया था. किले के गेट के सामने ले जाकर उसने कहा - ‘किले में कुछ नहीं है... आओ, आपको हवेलियाँ दिखाता हूँ.‘ फिर हवेलियों के सामने भी ऐसा ही कहा और इस प्रकार मैंने पूरा जैसलमेर कुछ ही मिनटों में देख लिया. मुझे यह सब बड़ा खराब लगा था और बाद में मैंने उसे फेसबुक पर ब्लाक कर दिया.

हमारा अपना एक फ्लो होता है, अपनी रुचि होती है, अपना समय होता है, तब हम कहीं घूमने या न घूमने का निर्णय लेते हैं. अक्सर जब हम किसी शहर में जाते हैं तो उस शहर के मित्रा हमारी रुचि, फ्लो और समय का ध्यान न रखते हुए अपनी मर्जी से शहर घुमाने लगते हैं. हम मना करने में संकोच कर जाते हैं और इस प्रकार हमारा वह समय भी बर्बाद हो जाता है और हमारे मन में उस शहर की भी छवि खराब होती है.

ऐसा ही जैसलमेर के साथ था. फिर हमने परसों जोधपुर का किला देखा. वहाँ हमारा मन नहीं लगा, तो लग रहा था कि कहीं जैसलमेर के किले में भी ऐसा न हो लेकिन जैसलमेर आए हैं तो किले में जाना ही पड़ेगा.

जैसलमेर के किले में आबादी रहती है - यह मुझे पता था. बाहर आटो वाले किले के अंदर छोड़ने को कह रहे थे लेकिन सबने पैदल ही चलना पसंद किया. बड़े और ऊँचे कई दरवाजों को पार करने के बाद हम किले में प्रवेश कर गए.

किले के अंदर पैदल ही घूमना होता है और घरों व दुकानों के बीच गलियों में घूमना वाकई शानदार अनुभव होता है. एक राजमहल भी है जिसके लिए हमने गाइड कर लिया. यह गाइड यहीं किले में रहने वाला ही एक नागरिक था. ये गाइड लोग वैसे तो बोर करते हैं लेकिन इसने बोर नहीं किया.

किला घुमाने के साथ-साथ इसने अपनी जिंदगी भी सुना दी. आसाम की एक लड़की से अभी हाल ही में शादी की है इसने.

खैर, किले में आप पूरे दिन घूम सकते हैं, फोटोग्राफी कर सकते हैं.. आपका मन नहीं भरेगा. मतलब जैसलमेर के किले में मस्ती तो है.

उम्मीद से ज्यादा समय यहाँ लगाकर हम चल दिए हवेलियों की ओर. जैसलमेर पुराने व्यापार मार्ग पर स्थित था और यहाँ से सिंध के साथ-साथ ईरान और अन्य खाड़ी देशों के साथ भी लगातार आवागमन व व्यापार चलता था, इसलिए कुछ बड़े सेठों ने यहाँ अपनी हवेलियाँ बनवाईं. ये हवेलियाँ आज जैसलमेर के पर्यटन का मुख्य केंद्र हैं. इनमें नथमल की हवेली और पटवों की हवेली प्रमुख हैं.

केवल एक ही हवेली बाहर से देखकर हम गड़ीसर झील की ओर निकल गए. ग्रुप में ऐसा ही होता है.

समय कम होता है और इस कम समय में आपको ज्यादा से ज्यादा देखना होता है. आज हमें गड़ीसर झील के बाद कुलधरा भी जाना था और सम में डेजर्ट सफारी भी करनी थी. यह सब वैसे तो कम से कम दो दिनों का काम है लेकिन सीमित समय की वजह से एक ही दिन में करने की योजना बनानी पड़ी. हवेलियों को विस्तार से देखना फिर से रह गया.

जब गड़ीसर झील पर पहुँचे, तो दोपहर हो चुकी थी. इस समय फोटो अच्छे नहीं आते, इसलिए ने तय किया कि कल शाम को तनोट से लौटने के बाद सीधे यहीं आएँगे और सूर्यास्त देखेंगे लेकिन अगले दिन लौटने में रात हो गई और गड़ीसर झील पर सूर्यास्त देखना रह गया.

कुलधरा में अब कुछ भी रोमांच नहीं बचा लेकिन यह इतना प्रसिद्ध हो चुका है कि अगर आप किसी ग्रुप को लीड कर रहे हो तो आपका जाना बनता है. किसी जमाने में यहाँ के निवासी इस गाँव को छोड़कर चले गए और इसकी गिनती भुतहा गाँवों में होने लगी लेकिन अब यह पूरी तरह कृत्रिम गाँव है... राजस्थान पर्यटन ने घरों को नए सिरे से बनाया लेकिन हर तरफ कृत्रिमता झलकती है. यहाँ हमने सबको आधे घंटे का समय दिया और आधे घंटे बाद सभी लोग गाड़ी में थे क्योंकि शाम हो चुकी थी और मरुस्थल में रेत के धोरों में सूर्यास्त देखने से अच्छा कुछ नहीं हो सकता.

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