मुद्दा. देश आज चीन से आई कोरोना महामारी की विभीषिका से जूझ रहा है, परंतु इस संकट की घड़ी में एक तथ्य सामने आया है कि सिर्फ सरकारी तंत्र और सरकारी विभाग ही काम कर रहे हैं. प्राइवेट तंत्र और गैर सरकारी संगठन, चैरिटेबल संस्थाएं सुधार के नाम बनाए गए नए संगठन सभी भाग खड़े हुए और उनका योगदान एकदम नगण्य है.

इस घड़ी में स्वास्थ्य सेवाओं का अत्यंत महत्त्वपूर्ण रोल है परंतु सिर्फ सरकारी अस्पताल ही इस लड़ाई को अकेले ही लड़ रहे हैं. ज्यादातर प्राइवेट अस्पताल और नर्सिंग होम बंद होकर भाग खड़े हुए हैं. यह अलग बात है कि इसके लिए प्राइवेट अस्पताल और चिकित्सा सरकार और नौकरशाही को ही इसके लिए जिम्मेदार बता रही है तथा उनके द्वारा उन्हें बुरी तरह प्रताडि़त किया जा रहा है. ऐसे में सारा बोझ सरकारी अस्पताल और सरकारी चिकित्सकांे पर ही आ गया है. हमले तक किए गए.

पुलिस विभाग का कार्य भी अत्यंत सराहनीय रहा. अपनी डयूटी करते हुए बड़ी संख्या में पुलिस के लोग संक्रमित भी हुए, अनेक जवान और अधिकारियों की मृत्यु भी हुई फिर भी पुलिस बल का कार्य अत्यंत उत्कृष्ट श्रेणी का रहा. हर क्षेत्रा में पुलिस बल ने बहुत ही अच्छा कार्य किया. इतना ही नहीं, अनेक स्थानों पर पुलिस ने प्रवासी मजदूरों को दवा, खाना, ट्रांसपोर्ट आदि की सुविधा मुहैय्या करवाई. इतना सब कुछ होते हुए भी अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों ने उन पर अनेक स्थानों पर हमले भी किए, फिर भी पुलिस बल मुस्तैदी से अपने कार्य में जुटा रहा है. राष्ट्र उनका सदैव ऋणी रहेगा.

सरकारी बैंकों का कार्य भी बहुत सराहनीय रहा. यहां यह बात महत्त्वपूर्ण है कि डा. मनमोहन सिंह के द्वारा प्रारंभ किए गए तथाकथित रिफार्म में बड़ी संख्या में प्राइवेट बैंक और वित्तीय संस्थाएं खड़ी कर दी गई परंतु इस कठिन समय में सभी भाग खड़े हुए. सिर्फ सरकारी बैंक ही लगातार खुले रहे तथा समाज को बहुमूल्य सेवा दी. कुछ बैंक कर्मचारियों को लंबी दूरी तय करके बैंक पहुंचना पड़ता था. ऐसे में बैंक प्रबंधन यह सुनिश्चित करे कि बैंक कर्मचारी को उसके घर के समीप ही नियुक्त करें जिससे उन्हें आने जाने मेें कोई मुश्किल न हो और वे अपनी सेवा समाज को दे सकें. प्राइवेट बैंक और प्राइवेट वित्तीय संस्थाओं ने देश को अत्यंत निराश किया है.

इस महामारी के दौर में सरकारी स्कूल और कालेजों का कार्य भी अत्यंत सराहनीय रहा है. अनेक सरकारी शिक्षण संस्थानों में क्वारंटाइन सेंटर बनाए गए  जिनमें बड़ी संख्या में कोरोना मरीज क्वारंटाइन किए गए. अनेक सरकारी शिक्षकों ने राशन वितरण में सरकार की और समाज की बड़ी सेवा की. इतना ही नहीं, अनेक सरकारी शिक्षण संस्थाओं ने प्रवासी मजदूरों के रहने और खाने की भी व्यवस्था की. यहां भी प्राइवेट शिक्षण संस्थाओं का रोल एकदम नकारात्मक रहा. इतना ही नहीं, उन्होंने लॉकडाउन के दौरान फीस वसूली और आय के नए-नए हथकंडे अपनाते देखे गए.

इस सारे वर्णन से स्पष्ट होता है कि सिर्फ सरकारी संस्थाओं और सरकारी कर्मचारी ही संकट के समय समाज और राष्ट्र के काम आते हैं. रिफार्म अथवा सुधार के नाम पर खड़े किए गए प्राइवेट संस्थान, एन जी ओ और चैरिटेबिल संस्थान आदि सभी सफेद हाथी ही साबित हुए हैं तथा सिर्फ पैसा कमाने का ही माध्यम बन गए हैं.
अतः देश हित में यह अत्यंत आवश्यक है कि सरकार अब तथाकथित सुधार और निजीकरण एकदम बंद कर दे. ये राष्ट्रहित में नहीं हैं. इसी तरह सरकारी संस्थानों और सार्वजनिक उपक्रम का प्राइवेटकरण एकदम बंद कर दें. आउट-सोर्सिंग, पब्लिक, प्राइवेट- पार्टनरशिप, डिस-इन्वेस्टमेंट जैसी बीमारियों से सरकारी संस्थाओं को दूर रखा जाए जिनसे सरकारी तंत्रा में सिर्फ भ्रष्टाचार और निकम्मापन ही आया है.

अब सुधारों अथवा रिफार्म को अलविदा कहने का समय आ गया है. सरकार-सरकारी विभागों को मजबूत करे तथा उन्हें बंद करने अथवा बेचने का विचार एकदम अपने दिमाग से ही निकाल दे. यही राष्ट्रहित में होगा. 

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