साइबर ठगी या डिजिटल अरेस्ट में बैंक की लापरवाही साबित हुई तो पीड़ित को लौटानी होगी ठगी गई पूरी रकम

साइबर ठगी या डिजिटल अरेस्ट में बैंक की लापरवाही साबित हुई तो पीड़ित को लौटानी होगी ठगी गई पूरी रकम

प्रेषित समय :20:19:05 PM / Sun, Nov 1st, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. साइबर ठगी और डिजिटल अरेस्ट के जरिए लोगों की जीवनभर की कमाई लूटने वाले अपराधियों के साथ अब बैंकों की जवाबदेही भी तय हो सकती है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी खाताधारक के साथ डिजिटल अरेस्ट या साइबर फ्रॉड होता है और जांच में बैंक अथवा उसके अधिकारियों की लापरवाही सामने आती है, तो वित्तीय संस्थान को इसकी जिम्मेदारी उठानी होगी. अदालत ने प्रस्तावित नियामक व्यवस्था में यह अनिवार्य करने पर जोर दिया है कि बैंक या वित्तीय संस्थान ऐसे पीड़ितों को उनकी गंवाई गई रकम से कम नहीं, बल्कि पूरी राशि का मुआवजा दें. यह जिम्मेदारी तब लागू होगी, जब धोखाधड़ी में वित्तीय संस्थान की ओर से उचित सावधानी नहीं बरतने की बात सामने आएगी.

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने यह भी कहा कि संदिग्ध लेन-देन की पहचान होने पर बैंक केवल औपचारिकता निभाकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते. उन्हें ऐसे खातों और ट्रांजैक्शन पर निगरानी रखने के लिए प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था बनानी होगी. अदालत का मानना है कि बैंकों के पास खाताधारकों की वित्तीय गतिविधियों का रिकॉर्ड और लेन-देन की जानकारी होती है. ऐसे में असामान्य या संदिग्ध ट्रांजैक्शन दिखाई देने पर समय रहते हस्तक्षेप किया जा सकता है.

यह मामला डिजिटल अरेस्ट के पीड़ितों से जुड़ा स्वतः संज्ञान मामला In Re: Victims of Digital Arrest Related to Forged Documents है. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है. केस नंबर SMW (Crl.) 3/2025 है.

बैंक अधिकारियों की भूमिका पर भी उठे गंभीर सवाल

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने साइबर अपराधों में बैंक अधिकारियों की संभावित भूमिका और बैंकों की कार्यप्रणाली पर चिंता जताई. अदालत ने कहा कि जब न्यायालय लगातार सुरक्षा उपाय करने की आवश्यकता बता रहा है, तब भी भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) बैंकों से सलाह-मशविरा करने में समय क्यों लगा रहा है.

मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि समस्या यह है कि कुछ मामलों में बैंक अधिकारी भी अपराधियों के साथ शामिल हो सकते हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि जब बैंक खाताधारक की पहचान, खाते में उपलब्ध रकम और लेन-देन की गतिविधियों से परिचित होते हैं, तो संदिग्ध गतिविधियों पर तत्काल रोक लगाने के लिए प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए जाते.

पीठ ने कहा कि बैंकिंग व्यवस्था में ऐसा सुरक्षा कवच होना चाहिए, जो ग्राहकों को धोखाधड़ी से बचाने में सक्रिय भूमिका निभाए. यदि किसी खाते से अचानक असामान्य तरीके से बड़ी रकम निकालने या स्थानांतरित करने का प्रयास होता है, तो बैंक को उसकी जांच करनी चाहिए. जरूरत पड़ने पर संबंधित ट्रांजैक्शन को रोककर स्थानीय पुलिस को सूचना देने की व्यवस्था भी होनी चाहिए.

संदिग्ध ट्रांजैक्शन पर रोक लगाने की व्यवस्था क्यों नहीं

सुनवाई के दौरान अदालत ने पूछा कि क्या ऐसा कोई नियामक प्रावधान बनाया जा सकता है, जिसके तहत असामान्य लेन-देन सामने आने पर बैंक उसे तत्काल रोक दें और पुलिस को सूचित करें. इसके बाद पुलिस अधिकारी खाताधारक से संपर्क कर यह पुष्टि कर सके कि वास्तव में उसने ही यह ट्रांजैक्शन किया है या वह किसी दबाव, धमकी अथवा धोखाधड़ी का शिकार हुआ है.

मुख्य न्यायाधीश ने सुझाव दिया कि बैंकों के खातों को जोखिम के आधार पर अलग-अलग समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है. इससे सामान्य लेन-देन और संदिग्ध गतिविधियों के बीच अंतर पहचानने में मदद मिलेगी. यदि किसी खाते में अचानक असामान्य रकम का लेन-देन होता है, तो बैंक अतिरिक्त सत्यापन की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं.

पीठ ने यह भी कहा कि डिजिटल अरेस्ट के मामलों में पीड़ित व्यक्ति अक्सर अपराधियों के मानसिक दबाव में रहता है. उसे पुलिस, जांच एजेंसी या सरकारी अधिकारी बनकर फोन करने वाले लोग गिरफ्तारी, मुकदमे और परिवार की सुरक्षा को लेकर डराते हैं. इस भय के कारण व्यक्ति अपनी जमा पूंजी तक अपराधियों के बताए खातों में भेज देता है. ऐसे में बैंकिंग प्रणाली को केवल ग्राहक की ओर से किए गए ट्रांजैक्शन को अंतिम सहमति मानकर नहीं चलना चाहिए, बल्कि संदिग्ध परिस्थितियों की पहचान करने की क्षमता विकसित करनी होगी.

RBI दिसंबर तक ला सकता है नए नियामक उपाय

सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने केंद्र सरकार और संबंधित संस्थाओं की ओर से उठाए गए कदमों की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद साइबर धोखाधड़ी और डिजिटल अरेस्ट की घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए कई स्तरों पर काम किया जा रहा है.

उन्होंने अदालत को बताया कि भारतीय रिजर्व बैंक कुछ नए नियामक उपायों पर विचार कर रहा है, जिन्हें दिसंबर तक लागू किया जा सकता है. RBI के साथ इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) तथा दूरसंचार विभाग (DoT) भी इस समस्या से निपटने के लिए काम कर रहे हैं. अटॉर्नी जनरल ने कहा कि बैंकिंग व्यवस्था के सभी संस्थानों को एक समान सुरक्षा प्रणाली के अनुरूप लाने के लिए कुछ और समय की आवश्यकता है.

उन्होंने यह भी बताया कि बैंक अब संदिग्ध ट्रांजैक्शन की पहचान करने के लिए कदम उठा रहे हैं. इसके साथ ही बैंक अधिकारियों की जवाबदेही का पहलू भी विचाराधीन है. यदि किसी अधिकारी की साइबर अपराधियों के साथ मिलीभगत सामने आती है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई का सवाल भी नियामक व्यवस्था में शामिल किया जा सकता है.

बैंकों पर सख्त जवाबदेही लागू करने के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट

अदालत ने केवल दिशा-निर्देश जारी करने के बजाय बैंकों की जवाबदेही को प्रभावी बनाने पर जोर दिया. मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि जब तक बैंकों के लिए सख्त दंडात्मक व्यवस्था नहीं होगी, तब तक उनकी कार्यप्रणाली में अपेक्षित बदलाव नहीं आएगा.

न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि पीठ वित्तीय संस्थानों पर ‘सख्त जवाबदेही’ यानी Strict Liability लागू करने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है. हालांकि RBI नियामक उपाय लाने की तैयारी कर रहा है, लेकिन यह देखना जरूरी होगा कि प्रस्तावित नियम वास्तव में पीड़ितों को कितनी सुरक्षा प्रदान करते हैं.

पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि क्या प्रस्तावित नियमों में व्हाट्सएप जैसे डिजिटल मध्यस्थों की भूमिका को शामिल किया गया है. डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी के कई मामलों में अपराधी मैसेजिंग प्लेटफॉर्म, इंटरनेट कॉल और फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल करते हैं. इन माध्यमों के जरिए वे लोगों को सरकारी अधिकारी, पुलिसकर्मी या जांच एजेंसी का प्रतिनिधि बताकर डराते हैं. अदालत ने संकेत दिया कि ऐसी धोखाधड़ी रोकने के लिए केवल बैंकों पर ही नहीं, बल्कि डिजिटल संचार व्यवस्था से जुड़े पक्षों की भूमिका पर भी विचार करना होगा.

ट्रांजैक्शन की लिखित पुष्टि तक रोकने का सुझाव

मुख्य न्यायाधीश ने एक ऐसी अनिवार्य व्यवस्था बनाने की आवश्यकता बताई, जिसमें संदिग्ध लेन-देन को तब तक रोका जा सके, जब तक खाताधारक से उसकी वास्तविकता की पुष्टि न हो जाए. अदालत का जोर इस बात पर था कि बैंकिंग प्रणाली में सुरक्षा का दायित्व केवल ग्राहक पर नहीं छोड़ा जा सकता.

पीठ ने कहा कि यदि किसी ग्राहक के खाते से बड़ी रकम संदिग्ध परिस्थितियों में स्थानांतरित की जा रही है, तो बैंक को उसकी पुष्टि करने के लिए पर्याप्त प्रक्रिया अपनानी चाहिए. इसके लिए ग्राहक से लिखित पुष्टि लेने या अन्य विश्वसनीय सत्यापन व्यवस्था लागू करने पर विचार किया जा सकता है.

अदालत ने डिजिटल अरेस्ट के मामलों में पीड़ित के खाते से होने वाली अनधिकृत निकासी को रोकने की आवश्यकता पर भी जोर दिया. पीठ का मानना है कि यदि बैंक समय रहते संदिग्ध गतिविधि पहचानने और रोकने में सक्षम हैं, तो पीड़ित की रकम अपराधियों तक पहुंचने से बचाई जा सकती है.

बैंक की लापरवाही साबित होने पर पूरी रकम का मुआवजा

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में दोहराया कि RBI द्वारा प्रस्तावित नियामक उपायों में वित्तीय संस्थानों के लिए यह अनिवार्य प्रावधान होना चाहिए कि वे डिजिटल अरेस्ट या साइबर फ्रॉड के पीड़ितों को मुआवजा दें. यह मुआवजा पीड़ित की गंवाई गई रकम से कम नहीं होना चाहिए, बशर्ते यह पाया जाए कि धोखाधड़ी वित्तीय संस्थान की ओर से उचित सावधानी नहीं बरतने के कारण हुई.

इसका अर्थ यह है कि बैंक की जिम्मेदारी केवल शिकायत दर्ज करने या जांच में सहयोग करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. यदि उसकी लापरवाही के कारण ग्राहक की रकम ठगों तक पहुंचती है, तो उसे आर्थिक नुकसान की भरपाई भी करनी पड़ सकती है. साथ ही, बैंक या संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कानूनी और नियामक कार्रवाई का रास्ता भी खुला रहना चाहिए.

हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि मुआवजे की व्यवस्था बैंक की लापरवाही और उचित सावधानी नहीं बरतने की स्थिति से जुड़ी होगी. हर साइबर ठगी के मामले में बिना जांच के बैंक को स्वतः जिम्मेदार मानने की बात नहीं कही गई है.

वरिष्ठ नागरिकों को निशाना बनाने वाले अपराधियों पर सख्त टिप्पणी

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने डिजिटल अरेस्ट के नाम पर वरिष्ठ नागरिकों को निशाना बनाने वाले अपराधियों पर कड़ी टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि ऐसे अपराधी बेहद क्रूर तरीके से लोगों को मानसिक दबाव में डालते हैं. यदि कानून इसकी अनुमति देता, तो ऐसे अपराधियों को मुकदमे की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही सजा दिए जाने की बात कही जा सकती थी.

अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि डिजिटल अरेस्ट के नाम पर देशभर में हजारों करोड़ रुपये की ठगी होने की आशंका है. अपराधी लोगों को फर्जी गिरफ्तारी वारंट, जांच एजेंसियों के नाम पर वीडियो कॉल और नकली दस्तावेज दिखाकर डराते हैं. कई पीड़ितों को घंटों या दिनों तक डिजिटल निगरानी में रखने का दावा किया जाता है. इस दौरान उन्हें परिवार और परिचितों से संपर्क नहीं करने दिया जाता तथा कथित जांच के नाम पर बैंक खातों से रकम ट्रांसफर कराई जाती है.

अब सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव की उम्मीद

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से स्पष्ट है कि डिजिटल अरेस्ट और साइबर फ्रॉड से निपटने के लिए केवल पुलिस कार्रवाई पर्याप्त नहीं मानी जा रही. अदालत बैंकिंग प्रणाली, डिजिटल प्लेटफॉर्म और नियामक संस्थाओं की संयुक्त जवाबदेही तय करने की दिशा में जोर दे रही है.

केस विवरण: In Re: Victims of Digital Arrest Related to Forged Documents, स्वतः संज्ञान मामला, SMW (Crl.) 3/2025. सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष हुई.

सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख चिंता यह है कि साइबर अपराधियों के हाथों रकम जाने से पहले ही बैंकिंग प्रणाली सक्रिय हो. यदि बैंक की लापरवाही से ग्राहक को नुकसान होता है, तो उसकी भरपाई की जिम्मेदारी भी वित्तीय संस्थान पर तय की जाए. अब निगाहें RBI के प्रस्तावित नियामक उपायों पर हैं, जिनसे डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी के पीड़ितों को वास्तविक सुरक्षा और मुआवजे का रास्ता मिल सकता है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-