पीएचडी के साल एसोसिएट प्रोफेसर की योग्यता में जुड़ेंगे या नहीं, सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी हजारों शिक्षकों की नजरें

पीएचडी के साल एसोसिएट प्रोफेसर की योग्यता में जुड़ेंगे या नहीं, सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी हजारों शिक्षकों की नजरें

प्रेषित समय :19:57:28 PM / Sun, Nov 1st, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए आवश्यक अनुभव की गणना को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण कानूनी विवाद पहुंच गया है. मामला इस सवाल से जुड़ा है कि क्या पीएचडी करने में बिताए गए समय को एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति के लिए अनिवार्य शिक्षण अनुभव माना जा सकता है. यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) के नियमों की व्याख्या से जुड़े इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 30 अक्टूबर 2026 को सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया. जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने यूजीसी तथा प्रोफेसर जोसेफ स्कारिया की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई की. इन याचिकाओं में केरल हाईकोर्ट के 2023 के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसने कन्नूर यूनिवर्सिटी में प्रिया वर्गीस की एसोसिएट प्रोफेसर पद पर नियुक्ति को बरकरार रखा था.

इस मामले का महत्व केवल एक नियुक्ति तक सीमित नहीं है. इसका असर विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के अनुभव की गणना, शोध के लिए मिलने वाली छुट्टी, प्रतिनियुक्ति और यूजीसी के भर्ती नियमों की व्याख्या पर भी पड़ सकता है. एसोसिएट प्रोफेसर के पद के लिए सामान्य तौर पर कम से कम आठ वर्ष का शिक्षण और/या शोध अनुभव आवश्यक है. विवाद इस बात पर है कि पीएचडी के दौरान बिताई गई अवधि को इस आठ वर्ष की पात्रता में शामिल किया जा सकता है या नहीं.

कन्नूर यूनिवर्सिटी की नियुक्ति से शुरू हुआ विवाद

यह मामला केरल की कन्नूर यूनिवर्सिटी में मलयालम विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर पद पर प्रिया वर्गीस की नियुक्ति से जुड़ा है. प्रिया वर्गीस CPI(M) नेता के.के. रागेश की पत्नी हैं. रागेश तत्कालीन मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के निजी सचिव रह चुके हैं. नियुक्ति प्रक्रिया में प्रोफेसर जोसेफ स्कारिया का नाम वर्गीस के बाद आया था. स्कारिया ने उनकी उम्मीदवारी को चुनौती देते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था.

स्कारिया का तर्क था कि वर्गीस के पास एसोसिएट प्रोफेसर पद के लिए निर्धारित आठ वर्ष का आवश्यक शिक्षण अनुभव नहीं है. उन्होंने नियुक्ति प्रक्रिया में उनके अनुभव की गणना और पात्रता पर सवाल उठाए. इस विवाद के बाद मामला केरल हाईकोर्ट पहुंचा, जहां अलग-अलग स्तरों पर अलग-अलग निष्कर्ष सामने आए.

केरल हाईकोर्ट की दो पीठों के फैसले अलग-अलग

नवंबर 2022 में केरल हाईकोर्ट के सिंगल जज ने माना था कि प्रिया वर्गीस के पास निर्धारित शिक्षण अनुभव नहीं है. अदालत ने कन्नूर यूनिवर्सिटी को उनके दस्तावेजों और अनुभव की दोबारा जांच करने का निर्देश दिया था. इस आदेश को वर्गीस ने हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में चुनौती दी.

जून 2023 में डिवीजन बेंच ने सिंगल जज के फैसले को पलटते हुए वर्गीस के पक्ष में निर्णय दिया. डिवीजन बेंच ने माना कि फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत पीएचडी करने में बिताई गई अवधि को उनके अनुभव की गणना से बाहर नहीं किया जा सकता. इसके अलावा, कन्नूर यूनिवर्सिटी में डायरेक्टर ऑफ स्टूडेंट सर्विसेज और राष्ट्रीय सेवा योजना से जुड़े पद पर प्रतिनियुक्ति के दौरान बिताई गई अवधि को भी अनुभव में शामिल करने की अनुमति दी गई थी.

इस फैसले के खिलाफ प्रोफेसर जोसेफ स्कारिया और यूजीसी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की. अब शीर्ष अदालत को यह तय करना है कि यूजीसी के 2018 के नियमों के अनुसार पीएचडी की अवधि को किस सीमा तक शिक्षण या शोध अनुभव माना जा सकता है.

यूजीसी के नियम 3.1.1 की व्याख्या पर टिकी सुनवाई

मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यूजीसी रेगुलेशंस 2018 का नियम 3.1.1 है. इस नियम में कहा गया है कि एमफिल या पीएचडी की डिग्री हासिल करने में उम्मीदवार द्वारा लिया गया समय शिक्षण पदों पर नियुक्ति के लिए शिक्षण या शोध अनुभव के रूप में नहीं गिना जाएगा.

हालांकि, नियम में एक महत्वपूर्ण अपवाद भी है. इसके अनुसार, यदि कोई व्यक्ति सक्रिय सेवा में रहते हुए बिना किसी प्रकार की छुट्टी लिए शिक्षण कार्य के साथ-साथ शोध डिग्री हासिल करता है, तो उस अवधि को सीधी भर्ती या पदोन्नति के लिए शिक्षण अनुभव माना जा सकता है. नियम में नियमित फैकल्टी सदस्यों के लिए कुल शिक्षकों की संख्या के 20 प्रतिशत तक को पीएचडी के लिए अध्ययन अवकाश देने का प्रावधान भी शामिल है.

यही तीनों प्रावधान इस विवाद के केंद्र में हैं. एक पक्ष का कहना है कि पीएचडी के लिए लिया गया समय सामान्य रूप से अनुभव में नहीं जोड़ा जा सकता. वहीं दूसरा पक्ष नियम के अपवाद और नियमित शिक्षकों के लिए अध्ययन अवकाश की व्यवस्था को अलग तरीके से पढ़ने की मांग कर रहा है.

यूजीसी और स्कारिया ने उठाए अनुभव की गणना पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट में प्रोफेसर स्कारिया की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पी.एन. रवींद्रन ने दलील दी कि नियम 3.1.1 का पहला हिस्सा सभी उम्मीदवारों पर लागू होता है. इसके तहत पीएचडी हासिल करने में बिताया गया समय शिक्षण या शोध अनुभव नहीं माना जा सकता. उनका तर्क था कि बिना छुट्टी के शिक्षण कार्य के साथ शोध करने वाले व्यक्ति को ही इस अवधि का लाभ मिलना चाहिए.

यूजीसी की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने भी वर्गीस के अनुभव की गणना पर आपत्ति जताई. यूजीसी का कहना है कि 2018 के नियमों ने पहले के प्रावधानों और स्पष्टीकरणों का स्थान ले लिया है. इसलिए पीएचडी के लिए बिताई गई अवधि को अनुभव में शामिल करने के लिए 2018 के नियमों की शर्तों का पालन जरूरी है.

यूजीसी ने यह भी तर्क दिया कि वर्गीस पीएचडी के दौरान नियमित शिक्षण कार्य नहीं कर रही थीं. उनके कॉलेज में उनकी अनुपस्थिति के दौरान वैकल्पिक शिक्षक नियुक्त किए जाने का हवाला देते हुए कहा गया कि इससे पता चलता है कि वह उस अवधि में शिक्षण जिम्मेदारियां नहीं निभा रही थीं.

वर्गीस की ओर से प्रतिनियुक्ति का दिया गया तर्क

प्रिया वर्गीस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने दलील दी कि वह पीएचडी के दौरान छुट्टी पर नहीं थीं, बल्कि प्रतिनियुक्ति पर थीं. उनके पक्ष का कहना था कि फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत पीएचडी करने की अवधि को अनुभव में शामिल किया जाना चाहिए.

वर्गीस की ओर से यह भी कहा गया कि यूजीसी ने फरवरी 2016 में स्पष्टीकरण जारी किया था, जिसके अनुसार बिना छुट्टी लिए सक्रिय सेवा के दौरान पीएचडी करने की अवधि को एसोसिएट प्रोफेसर और उससे ऊपर के पदों पर नियुक्ति या पदोन्नति के लिए शिक्षण अनुभव माना जा सकता है. हालांकि, यूजीसी का तर्क है कि 2018 के नियमों के बाद इस मामले का निर्धारण नए प्रावधानों के आधार पर किया जाना चाहिए.

सुनवाई के दौरान पीठ ने नियम के अलग-अलग हिस्सों की व्याख्या पर सवाल किए. जस्टिस मनमोहन ने यह भी पूछा कि यदि विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक और अकादमिक जिम्मेदारी वाले पदों पर काम करने की अवधि को अनुभव नहीं माना जाएगा, तो शिक्षक ऐसे पदों को स्वीकार करने से हिचक सकते हैं.

पीएचडी के अलावा दो अन्य अवधियों पर भी विवाद

मामले में केवल पीएचडी की अवधि ही विवादित नहीं है. वर्गीस के शुरुआती करियर में गेस्ट लेक्चरर के रूप में काम करने की अवधि और कन्नूर यूनिवर्सिटी में डायरेक्टर ऑफ स्टूडेंट सर्विसेज के पद पर प्रतिनियुक्ति के दौरान बिताया गया समय भी जांच के दायरे में है.

यूजीसी रेगुलेशंस 2018 के प्रावधानों के तहत गेस्ट लेक्चरर के रूप में किया गया कार्य सीधे भर्ती या पदोन्नति के लिए अनुभव में शामिल नहीं किए जाने का नियम है. हालांकि, कुछ परिस्थितियों में पूर्व संविदा या अस्थायी सेवा को अनुभव मानने के लिए अलग शर्तें निर्धारित हैं. इसी कारण शुरुआती नियुक्तियों की प्रकृति और वेतन से जुड़े पहलुओं पर भी सवाल उठे हैं.

डायरेक्टर ऑफ स्टूडेंट सर्विसेज के पद पर बिताई गई अवधि को लेकर यूजीसी ने कहा कि विश्वविद्यालय के नियमों में यह गैर-शिक्षण पद है. इसके विपरीत वर्गीस के पक्ष ने तर्क दिया कि शिक्षक की प्रतिनियुक्ति पर ऐसी जिम्मेदारी निभाने की अवधि को अनुभव से बाहर करना उचित नहीं होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने अनुभव का चार्ट मांगा

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने प्रिया वर्गीस के वकील से उनके शिक्षण अनुभव का पूरा विवरण तालिका के रूप में प्रस्तुत करने को कहा था. अदालत ने निर्देश दिया कि यह विवरण एक सप्ताह के भीतर दिया जाए, ताकि यूजीसी और प्रोफेसर स्कारिया की ओर से उस पर आपत्तियां और जवाब प्रस्तुत किए जा सकें. इससे अदालत को विवादित अवधियों और कुल अनुभव की गणना को स्पष्ट रूप से समझने में मदद मिलेगी.

अब सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य प्रश्न यह है कि यूजीसी के 2018 के नियमों के तहत पीएचडी के लिए बिताई गई अवधि को कब और किन परिस्थितियों में अनुभव माना जा सकता है. अदालत का फैसला विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों के लिए अनुभव की गणना से जुड़े भविष्य के मामलों में भी महत्वपूर्ण हो सकता है.

फैसले पर टिकी शिक्षाविदों की नजरें

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है. फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि शीर्ष अदालत पीएचडी की पूरी अवधि को अनुभव में शामिल करने की अनुमति देगी, केवल बिना छुट्टी के शिक्षण कार्य के साथ शोध करने की अवधि को मान्यता देगी या नियमों की कोई अलग व्याख्या करेगी.

इस मामले में अंतिम निर्णय आने के बाद यह स्पष्ट होगा कि एसोसिएट प्रोफेसर पद के लिए आठ वर्ष के अनुभव की गणना किस आधार पर की जाएगी. विश्वविद्यालयों में नियुक्ति प्रक्रिया, फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम और शोध के लिए मिलने वाली छुट्टियों से जुड़े नियमों पर भी इसका असर पड़ सकता है. फिलहाल प्रिया वर्गीस की नियुक्ति को लेकर अंतिम कानूनी स्थिति सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ही तय होगी.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-