वकील के निजी कार्यालय में जातिसूचक गाली देना भी माना जा सकता है सार्वजनिक अपमान, कर्नाटक हाईकोर्ट ने SC/ST एक्ट की कार्रवाई रद्द करने से किया इनकार

वकील के निजी कार्यालय में जातिसूचक गाली देना भी माना जा सकता है सार्वजनिक अपमान, कर्नाटक हाईकोर्ट ने SC/ST एक्ट की कार्रवाई रद्द करने से किया इनकार

प्रेषित समय :20:01:25 PM / Sun, Nov 1st, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

बेंगलुरु, 1 नवंबर. कर्नाटक हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी वकील का कार्यालय निजी परिसर होने के बावजूद अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत ‘पब्लिक व्यू’ यानी सार्वजनिक दृष्टि के दायरे में आ सकता है. यदि वहां अन्य मुवक्किल या आम लोग मौजूद हों और उनके सामने किसी व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर अपमानित किया जाए, तो यह कानून के तहत अपराध की जांच का आधार बन सकता है. अदालत ने इसी आधार पर एक महिला और उसकी मां के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया.

न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना की पीठ ने खारिज की याचिका

न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ महिला और उसकी मां की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी. दोनों ने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को निरस्त करने की मांग की थी. उनके विरुद्ध एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) तथा भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 352 के साथ धारा 3(5) के तहत आरोप लगाए गए हैं.

याचिकाकर्ताओं का मामला वैवाहिक विवाद से जुड़ा हुआ बताया गया है. दोनों ने पहले अपने वैवाहिक मामले के संबंध में शिकायतकर्ता महिला अधिवक्ता की कानूनी सेवाएं ली थीं. बाद में उनके बीच विवाद पैदा हुआ. शिकायतकर्ता अधिवक्ता का आरोप है कि महिला और उसकी मां उनके कार्यालय पहुंचीं और वहां मौजूद अन्य मुवक्किलों के सामने उनकी जाति का नाम लेकर अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया.

याचिकाकर्ताओं ने इस आधार पर आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की कि कथित घटना वकील के निजी कार्यालय में हुई थी. उनका पक्ष था कि निजी परिसर में हुई घटना को एससी/एसटी एक्ट के तहत आवश्यक ‘पब्लिक व्यू’ की शर्त के अनुरूप नहीं माना जा सकता. हाईकोर्ट ने इस दलील को कार्यवाही समाप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं माना.

निजी परिसर और सार्वजनिक दृष्टि में अंतर समझाया

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने ‘पब्लिक प्लेस’ और ‘प्लेस विदिन पब्लिक व्यू’ के बीच कानूनी अंतर को महत्वपूर्ण माना. अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2008 के फैसले स्वर्ण सिंह बनाम राज्य का उल्लेख किया. इस फैसले में शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया था कि ‘प्लेस विदिन पब्लिक व्यू’ और ‘पब्लिक प्लेस’ को एक ही अर्थ में नहीं समझा जा सकता.

हाईकोर्ट के अनुसार, किसी स्थान का निजी स्वामित्व होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वहां होने वाली घटना सार्वजनिक दृष्टि के दायरे में नहीं आ सकती. कोई परिसर निजी व्यक्ति या संस्था के स्वामित्व में हो सकता है, लेकिन यदि वहां दूसरे लोग मौजूद हैं और उनके सामने कथित अपमानजनक घटना होती है, तो उस स्थान की प्रकृति और वहां मौजूद लोगों की स्थिति कानूनी जांच का विषय बन सकती है.

इसके विपरीत, ‘पब्लिक प्लेस’ सामान्य तौर पर ऐसे स्थान को कहा जाता है, जिसका स्वामित्व या पट्टा सरकार, नगरपालिका, किसी स्थानीय निकाय, ग्राम सभा अथवा राज्य से जुड़ी संस्था के पास हो. अदालत ने स्पष्ट किया कि दोनों कानूनी अभिव्यक्तियों के बीच अंतर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. इस मामले में केवल कार्यालय के निजी होने के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वहां कथित घटना सार्वजनिक दृष्टि में नहीं हुई.

कार्यालय में अन्य मुवक्किलों की मौजूदगी बनी अहम आधार

हाईकोर्ट ने शिकायत और आरोपपत्र में दर्ज तथ्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनमें स्पष्ट आरोप है कि शिकायतकर्ता अधिवक्ता के कार्यालय में कई मुवक्किल मौजूद थे. इसी दौरान याचिकाकर्ताओं ने कथित तौर पर उनकी जाति का नाम लेकर अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया.

अदालत के अनुसार, कार्यालय का निजी होना अपने आप में उसे सार्वजनिक दृष्टि का स्थान नहीं बनाता, लेकिन वहां अन्य मुवक्किलों की मौजूदगी और उनके सामने कथित रूप से जातिसूचक अपशब्द कहे जाने का आरोप महत्वपूर्ण है. इस पहलू पर साक्ष्यों के आधार पर विचार करना आवश्यक होगा कि क्या शिकायतकर्ता को उसकी जाति के आधार पर जानबूझकर अपमानित किया गया था.

इसलिए इस स्तर पर यह मानकर आपराधिक कार्यवाही समाप्त नहीं की जा सकती कि घटना निजी कार्यालय में हुई थी और वहां सार्वजनिक दृष्टि की शर्त पूरी नहीं होती. अदालत ने माना कि कथित घटना के समय मौजूद लोगों की गवाही और अन्य साक्ष्य मुकदमे की सुनवाई में महत्वपूर्ण हो सकते हैं.

गूगल बिजनेस प्रोफाइल पर भी जातिसूचक टिप्पणी का आरोप

मामले में शिकायतकर्ता अधिवक्ता ने एक अन्य आरोप भी लगाया है. याचिकाकर्ताओं पर आरोप है कि उन्होंने शिकायतकर्ता के गूगल बिजनेस प्रोफाइल पर अपमानजनक टिप्पणियां पोस्ट कीं. शिकायत के अनुसार, इन टिप्पणियों में भी अधिवक्ता की जाति का उल्लेख किया गया था और इस तरह उनकी पेशेवर प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई.

हाईकोर्ट ने इन आरोपों को भी अपने विचार में शामिल किया. अदालत के अनुसार, कार्यालय में कथित जातिसूचक अपशब्द कहने और गूगल बिजनेस प्रोफाइल पर जाति का उल्लेख करते हुए अपमानजनक टिप्पणी करने की घटनाएं प्रथम दृष्टया एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध के आवश्यक तत्वों की जांच का आधार बनती हैं.

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि डिजिटल मंच पर की गई टिप्पणी को मामले के बाकी तथ्यों से अलग करके नहीं देखा जा सकता. हालांकि, इन आरोपों की सत्यता और उनके पीछे की मंशा का अंतिम निर्धारण साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ही होगा.

बीएनएस की धारा 352 का आरोप भी बरकरार

याचिकाकर्ताओं ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 352 के तहत लगाए गए आरोप को भी निरस्त करने की मांग की थी. हाईकोर्ट ने इस मांग को भी स्वीकार नहीं किया. अदालत ने टिप्पणी की कि अपमानजनक भाषा के इस्तेमाल से जुड़े आरोपों में आपराधिक धमकी का पहलू भी शामिल हो सकता है. इसलिए इस स्तर पर उक्त आरोप को कार्यवाही से अलग करने का पर्याप्त आधार नहीं बनता.

पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को अब मुकदमे की सुनवाई के दौरान अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों के संबंध में अपनी बेगुनाही साबित करने का अवसर मिलेगा. अदालत ने आरोपों की अंतिम सत्यता पर कोई निष्कर्ष नहीं दिया, बल्कि यह माना कि उपलब्ध शिकायत और आरोपपत्र के आधार पर मामले को सुनवाई के लिए आगे बढ़ने देना उचित है.

मुकदमा जारी रहेगा, दोषसिद्धि पर अभी कोई फैसला नहीं

कर्नाटक हाईकोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी. इस फैसले का अर्थ यह है कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ चल रही कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी. यह आदेश आरोपों को अंतिम रूप से प्रमाणित नहीं करता और न ही याचिकाकर्ताओं को दोषी ठहराता है. मामले में आरोपों की पुष्टि या खंडन मुकदमे के दौरान प्रस्तुत साक्ष्यों और न्यायिक परीक्षण के आधार पर होगा.

मामले का कानूनी संदर्भ: एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) जाति के आधार पर जानबूझकर अपमानित करने और अपमानित करने के इरादे से धमकाने से संबंधित है, जबकि धारा 3(1)(s) सार्वजनिक दृष्टि के भीतर जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल से जुड़ी है. इस मामले में हाईकोर्ट ने दोहराया कि सार्वजनिक दृष्टि का निर्धारण केवल परिसर के स्वामित्व से नहीं, बल्कि घटना की परिस्थितियों और वहां मौजूद लोगों के संदर्भ में भी किया जाना चाहिए.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-