महाराष्ट्र में बिना लाइसेंस साहूकारों की नहीं चलेगी मनमानी, चेक बाउंस केस में शुरुआत में ही दिखाना होगा कर्ज देने का लाइसेंस

महाराष्ट्र में बिना लाइसेंस साहूकारों की नहीं चलेगी मनमानी, चेक बाउंस केस में शुरुआत में ही दिखाना होगा कर्ज देने का लाइसेंस

प्रेषित समय :20:17:20 PM / Sun, Nov 1st, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. महाराष्ट्र में बिना वैध लाइसेंस के ब्याज पर कर्ज देने वाले साहूकारों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है. ऐसे साहूकार प्रॉमिसरी नोट के आधार पर दिए गए कर्ज की वसूली के लिए चेक बाउंस का मुकदमा दायर कर केवल चेक के अनादर को आधार नहीं बना सकते. उन्हें मुकदमे की शुरुआत में ही यह साबित करने के लिए वैध साहूकारी लाइसेंस पेश करना होगा कि संबंधित कर्ज कानून के तहत वसूली योग्य है. अदालत ने स्पष्ट किया कि महाराष्ट्र में बिना लाइसेंस साहूकारी के तहत दिया गया ऐसा कर्ज वैधानिक रोक के दायरे में आ सकता है और उसे नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत कानूनी रूप से वसूली योग्य ऋण नहीं माना जा सकता.

यह मामला सुप्रीम कोर्ट के 26 मई 2026 के एम/एस मानसी फाइनेंस (चेन्नई) लिमिटेड बनाम एम. ललिता एवं अन्य फैसले से जुड़ा है. न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने 29 अक्टूबर 2026 को व्योमेश महीपात्राय शाह की ओर से दायर विविध आवेदन पर सुनवाई की. आवेदक ने आशंका जताई थी कि मई में दिए गए फैसले का हवाला देकर महाराष्ट्र में बिना लाइसेंस साहूकार भी चेक बाउंस के मुकदमे चला सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने दोनों राज्यों के कानूनों में अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि तमिलनाडु से जुड़े फैसले को महाराष्ट्र में स्वतः लागू नहीं किया जा सकता.

महाराष्ट्र और तमिलनाडु के साहूकारी कानून में अंतर

सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या मई 2026 के फैसले को पूरे देश में लागू होने वाला सामान्य सिद्धांत मान लिया जाए. आवेदक का कहना था कि मई के फैसले में प्रॉमिसरी नोट के आधार पर दिए गए कर्ज पर विचार किया गया था, लेकिन महाराष्ट्र का कानून तमिलनाडु के कानून से अलग है.

तमिलनाडु साहूकार अधिनियम, 1957 में परक्राम्य लिखतों के आधार पर दिए गए अग्रिम को कर्ज की परिभाषा से बाहर रखा गया है. इसमें प्रॉमिसरी नोट भी शामिल है. इस कारण तमिलनाडु में ऐसे दस्तावेज के आधार पर सुरक्षित कर्ज कानूनी रूप से वसूली योग्य ऋण बना रह सकता है.

इसके विपरीत महाराष्ट्र साहूकारी (विनियमन) अधिनियम, 2014 में प्रॉमिसरी नोट के आधार पर ब्याज पर दिए गए अग्रिम को कर्ज की परिभाषा से बाहर नहीं रखा गया है. कानून की धारा 2(13)(j) के तहत इस तरह का कर्ज साहूकारी कानून के दायरे में आता है. इसलिए महाराष्ट्र में बिना लाइसेंस प्रॉमिसरी नोट के आधार पर ब्याज पर कर्ज देना कानून की पाबंदियों के अधीन होगा.

बिना लाइसेंस कर्ज देने पर धारा 4 और 13 की रोक

पीठ ने महाराष्ट्र साहूकारी अधिनियम की धारा 4 और धारा 13 के महत्व को रेखांकित किया. धारा 4 बिना वैध लाइसेंस साहूकारी का कारोबार करने पर रोक लगाती है. वहीं धारा 13 के तहत कानून का उल्लंघन करके दिए गए कर्ज की वसूली नहीं की जा सकती.

इसका सीधा प्रभाव उन मामलों पर पड़ सकता है, जिनमें कोई निजी साहूकार बिना लाइसेंस ब्याज पर रकम देता है और बदले में उधार लेने वाले से प्रॉमिसरी नोट तथा चेक लेता है. यदि कर्ज कानून के तहत वसूली योग्य ही नहीं है, तो केवल चेक बाउंस होने से नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत आपराधिक कार्रवाई का आधार स्वतः तैयार नहीं हो जाता.

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि महाराष्ट्र में चेक अनादरण या कर्ज वसूली से संबंधित कार्यवाही में साहूकार को शुरुआत में ही अपना लाइसेंस प्रस्तुत करना होगा. अदालत को यह संतुष्ट करना होगा कि कर्ज देते समय उसके पास संबंधित कानून के तहत वैध लाइसेंस था.

अप्रैल के आदेश में भी दिया गया था महत्वपूर्ण निर्देश

पीठ ने 6 अप्रैल 2026 को विविध आवेदन संख्या 1176/2026 में पारित अपने पूर्व आदेश का भी उल्लेख किया. यह आदेश एसएलपी (क्रिमिनल) संख्या 5485/2024 से संबंधित था. उसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बिना लाइसेंस प्रॉमिसरी नोट के आधार पर कर्ज देने पर राज्य के साहूकारी कानूनों के तहत वैधानिक रोक लागू होती है. यह रोक उस स्थिति में भी लागू हो सकती है, जब प्रॉमिसरी नोट के साथ चेक, संपत्ति के दस्तावेज या कोई अन्य सुरक्षा ली गई हो.

अदालत ने यह भी उल्लेख किया था कि साहूकारी लाइसेंस होने पर भी ब्याज वसूली के संबंध में ‘दम दुपट’ का सिद्धांत लागू होता है. इसका आशय है कि वास्तविक रूप से दी गई मूल रकम से अधिक ब्याज वसूलने पर भी कानूनी सीमा लागू हो सकती है.

अप्रैल के आदेश में अदालतों से कहा गया था कि निजी साहूकारों की ओर से शुरू की गई दीवानी या आपराधिक कार्यवाही को शुरुआती स्तर पर ही रोकने पर विचार किया जाए, जब तक कि साहूकार कर्ज देने का लाइसेंस पेश न कर दे या यह न दिखा दे कि रकम ब्याज पर नहीं दी गई थी.

मई के फैसले को पूरे देश पर लागू नहीं माना

आवेदक व्योमेश महीपात्राय शाह ने सुप्रीम कोर्ट से मई 2026 के फैसले पर स्पष्टीकरण मांगा था. उनका कहना था कि उस फैसले को महाराष्ट्र में बिना लाइसेंस साहूकारों के खिलाफ लागू कानूनी रोक को समाप्त करने के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए.

पीठ ने कहा कि 26 मई 2026 के फैसले में तमिलनाडु साहूकार अधिनियम, 1957 या महाराष्ट्र साहूकारी (विनियमन) अधिनियम, 2014 के प्रावधानों पर विचार नहीं किया गया था. उस मामले में इन दोनों राज्य कानूनों की व्याख्या करने या उनके बीच अंतर तय करने का अवसर ही नहीं था. इसलिए मई के फैसले को महाराष्ट्र के कानून पर लागू सामान्य सिद्धांत के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता.

अदालत ने यह भी कहा कि यदि महाराष्ट्र में धारा 13 के तहत बिना लाइसेंस साहूकार द्वारा प्रॉमिसरी नोट के आधार पर दिए गए कर्ज की वसूली पर रोक लागू होती है, तो यह सवाल संबंधित अदालत को उठाए गए तर्क और मामले के तथ्यों के आधार पर तय करना होगा. ऐसा कर्ज नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के स्पष्टीकरण के तहत कानूनी रूप से वसूली योग्य ऋण है या नहीं, इस पर भी संबंधित न्यायालय विचार कर सकता है.

निचली अदालत में भी उठाया जा सकेगा लाइसेंस का मुद्दा

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संबंधित पक्ष इस कानूनी मुद्दे को उस निचली अदालत के सामने उठा सकते हैं, जहां चेक बाउंस या कर्ज वसूली का मामला लंबित है. जरूरत पड़ने पर इसे उच्चतर अदालत के समक्ष भी उठाया जा सकता है. संबंधित अदालत मामले के तथ्यों, कर्ज देने की परिस्थितियों और महाराष्ट्र के लागू कानून के आधार पर निर्णय करेगी.

इसका अर्थ यह है कि महाराष्ट्र में बिना लाइसेंस साहूकारी के आरोप वाले मामलों में आरोपी पक्ष शुरुआत में ही यह सवाल उठा सकता है कि शिकायतकर्ता के पास कर्ज देने का वैध लाइसेंस था या नहीं. यदि लाइसेंस नहीं है और कर्ज कानून के तहत वसूली योग्य नहीं है, तो धारा 138 की कार्यवाही की वैधता पर सवाल खड़ा हो सकता है.

सुप्रीम कोर्ट ने आवेदन किया निस्तारित

पीठ ने मई 2026 के फैसले पर अलग से स्पष्टीकरण जारी करने की आवश्यकता नहीं मानी, क्योंकि उस फैसले में महाराष्ट्र और तमिलनाडु के साहूकारी कानूनों की व्याख्या की ही नहीं गई थी. अदालत ने पक्षकारों को संबंधित ट्रायल कोर्ट या उच्चतर अदालत के सामने यह मुद्दा उठाने की स्वतंत्रता दी. इसके साथ ही स्पष्टीकरण मांगने वाला आवेदन निस्तारित कर दिया गया.

केस की स्थिति और नंबर: एम/एस मानसी फाइनेंस (चेन्नई) लिमिटेड बनाम एम. ललिता एवं अन्य, व्योमेश महीपात्राय शाह के आवेदन के संदर्भ में. विविध आवेदन संख्या 3002/2026, आपराधिक अपील संख्या 2849/2026 में दायर. संबंधित आवेदन संख्या IA 183707/2026. निर्णय दिनांक 29 अक्टूबर 2026. पीठ में न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया शामिल थे. तटस्थ उद्धरण 2026 INSC 1174 है. आवेदन का निस्तारण किया गया; मई के फैसले में संशोधन या अलग स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया.

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से महाराष्ट्र में साहूकारी के कारोबार और चेक बाउंस मामलों में लाइसेंस की अहमियत फिर सामने आई है. अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य के कानूनों की अनदेखी कर केवल प्रॉमिसरी नोट या चेक के आधार पर कर्ज वसूली की कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती. हालांकि, प्रत्येक लंबित मामले में लाइसेंस, कर्ज की प्रकृति और लागू कानूनी प्रावधानों की जांच संबंधित अदालत को करनी होगी.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-