आधुनिक मानव सभ्यता में मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा जाता है  ͎और इसी वजह से हम अपने परिवार, समाज के साथ समय बिताना पसंद करते हैं , नए नए मित्र बनाते हैं. हम समूह में उत्सव मनाते हैं और विपत्ति के समय एक दूसरे की सहायता करके आत्मिक सुख प्राप्त करते हैं. परन्तु इस वैश्विक महामारी हमारे सामने नयी स्थितियां पैदा की हैं जो हमारे मूल स्वाभाव के एकदम विपरीत हैं , वर्तमान स्थिति यह है कि अगर इस वक़्त हमारा कोई अपना मुसीबत में है तो सिवाय फ़ोन पर सांत्वना देने के आप कुछ नहीं कर सकते. अभी इस लॉक डाउन के समय कई घटनाएं देखी है अपने नज़दीक ही जहाँ घर में किसी सदस्य के निधन पर परिजन ही अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो पाए.

भारतीय काफी संवेदनशील होते हैं और इसीलिए हम अपनों के ग़म और ख़ुशी में शरीक होते हैं. पर कोरोना के प्रकोप के चलते अब नयी परिस्थियाँ उपस्थित हो रही हैं जिसके तहत हमें यह बताया जा रहा है की अगर हमें एक दूसरे को सुरक्षित रखना है तो दूरी (सामाजिक) बनानी होगी.

 अब क्या यह दूरियां स्थायी हो जाएँगी? या यह मात्र वैकल्पिक - अस्थायी व्यवस्था होगी, शायद अब यही व्यवस्था होगी।  और सामाजिक ही क्यू  बल्कि हमारे दैनिक क्रियाकलापों जैसे व्यावसायिक व खेल जगत में भी यह देखने को मिलेगा और हमें नए कायदे बनाने होंगे , मानने होंगे. 

यह कितना सुगम होगा भारत जैसे विशाल और सघन आबादी वाले देश में जहाँ भीड़ भाड़ वाले बाजार, मॉल , स्टेशन एक आम दृश्य था . आईपीएल में भरे हुए स्टेडियम , मल्टीप्लेक्सेज में फिल्म देखने वाले दर्शक , यह फिलहाल अतीत की बात होगी ऐसा प्रतीत होता है.  क्या अब बिग  फैट इंडियन वेडिंग किम्वदंतियां हो जाएँगी? लगता यही है और शायद यह वर्तमान समय की मांग भी है. 

आधुनिकता की दौड़ में हम बदहवास भागे जा रहे थे।  हर चीज़ हमें जल्दी चाहिए थी. किसी के पास इंतज़ार का वक़्त नहीं था।  लोग यहाँ तक कहने लगे थे कि भाईसाहब इतना काम है कि मरने की फुरसत नहीं है. लेकिन प्रकृति ने ऐसी करवट ली जैसे संपूर्ण विश्व ही थम सा गया है. करने के लिए कुछ भी नहीं है सिवाय इंतज़ार के कि कब इस महामारी से निजात मिले और जीवन पुनः अपने पुराने दौर में  चले. यह होगा तो अवश्य क्योंकि जब भी मानव जाति के सामने कोई चुनौती आयी है तो उसका सामना भी किया है और उसपर विजय पाकर नयी राह  भी बनायी है.

लेकिन प्रश्न वहीँ है कि  क्या  हम  पहले की तरह ही जीवन जियेंगे , कदाचित नहीं.  हमें बदलना होगा , अपने लिए व आने वाली संतति के लिए भी क्यूँकि परिवर्तन ही एक मात्र स्थिर तत्त्व है प्रकृति का.


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