जैसा की आप सबको पता है कि भारत और चीन के रिश्ते दिन पर दिन बदतर होते जा रहे हैं.एक तरफ चीन अपनी विस्तारवादी नीतियों से बाज़ नही आ रहा है वही दूसरी ओर भारत भी अपने ज़मीन के एक इंच का भी समझौता करने को तैयार नही हैं.और जब बात युद्ध की आती है तो किसी भी देश को सबसे ज्यादा उम्मीद अपने पडोसी देशों से रहती है वे कि हर मुश्किल में वो हमारे साथ खड़े रहेंगे.पर दुख की बात ये हैं कि भारत के अपने  पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते भी बिगड़ते जा रहे हैं.चीन और पाकिस्तान के बारे में तो हम सब को पहले से ही ज्ञात हैं, पर आश्चर्य की बात ये है कि हमारा करीबी मित्र देश नेपाल ,जिसके साथ हमारे रिश्ते सबसे बेहतरीन रहे हैं वो भी आज हमसे युद्ध की बात कर रहा हैं.आखिर ये नौबत आई क्यों? जिस देश के साथ हमारे इतने गहरे रिश्ते थे कि  वीसा तो दूर की बात है, वहां जाने के लिए पॉसपोर्ट की भी आवश्यकता नही होती थी .पर ऐसा क्या हो गया कि आज नेपाल हमारे खिलाफ चीन के साथ खड़ा हैं? आइये  समझने की कोशिश करते हैं.

भारत का नेपाल की राजनीति में हस्तक्षेप - जब नेपाल में संविधान के तैयार होने की कवायद हुई तो ओली इसके पक्षधर थे, पर एक गुट जो मधेसी थे वो इसके पक्ष में नही थे और भारत ने भी इसमें हस्तक्षेप करते हुए मधेसियों के अधिकारों को लेकर इसका विरोध किया. दूसरी तरफ, नेपाल में प्रधानमंत्री की रेस में आखिरी वक्त पर ओली के खिलाफ सुशील कोइराला खड़े हो गए और नेपाल में कई लोगों ने माना कि इसके पीछे भारत की रणनीति थी. हालांकि 2015 का चुनाव ओली ने जीत लिया था पर भारत से उनका मन खट्टा होने की शुरुआत हो चुकी थी.

मुश्किल समय मे भारत का नेपाल का साथ छोड़ देना -इसके बाद ओली को फिर एक झटका तब लगा जब नेपाल में भूकंप की त्रासदी से ओली सरकार जूझ रही थी और उन हालात में भारत ने सीमाएं बंद कर दीं. महीनों तक नेपाल को आपूर्ति होने में मुश्किल रही. इन तमाम हालातों के मद्दे नजर हुए चीन के पास यही मौका था और उसने दोनों हाथों से लपका भी.

जरूरत के वक़्त चीन का नेपाल के साथ खड़ा होना- नेपाली लेखक सुजीव शाक्य के हवाले से द हिंदू की रिपोर्ट की मानें तो इसी मौके का फायदा उठा के चीन ने नेपाल को मदद की पेशकश की और भारत के अड़ियल रुख को देखते हुए नेपाल ने मार्च 2016 में चीन के साथ एक संधि पर दस्तखत किए जिससे नेपाल को शुष्क बंदरगाहों, रेल सहित चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत सड़क ट्रांसपोर्ट के ज़रिये चीनी इलाकों के साथ जुड़ने का सीधा रास्ता मिला. इसके बाद फिर ओली के सामने संकट खड़ा हुआ जब प्रचंड यानी पीके दहाल के धड़े ने ओली सरकार के खिलाफ बगावत की.
ओली ने फिर आरोप लगाया कि यह भारत के इशारे पर हुआ लेकिन इस बगावत के बाद भी 2017 में ओली ने  खुलकर भारत विरोधी छवि के साथ जीत हासिल की . इस तरह, ओली के रूप में नेपाल पर चीन की पकड़ मज़बूत होती चली गई और भारत अपने एक मित्र राष्ट्र को गंवाता चला गया.

नेपाल के राजनैतिक संकट को नज़रअंदाज़ करना - इस साल मई के शुरुआत  में नेपाल में एक  राजनीतिक संकट आया और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टियों के वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर ओली से इस्तीफा मांगा था और उस वक़्त भारत कोरोना महामारी से लड़ने में व्यस्त था जिसके परिणामस्वरूप उसने नेपाल के राजनीतिक संकट को नज़रअंदाज़ कर दिया जिसका फायदा चीन ने बख़ूबी उठाया और चीन के राजदूत हाउ यैंकी ने नेपाली नेताओं के साथ कई बैठक की और संकट का हल निकाला .इसके परिणामस्वरूप ओली चीन के और करीब आ गए.

इन सभी कारणों से एक बात तो साफ है की हमारी सरकार कही न कही अपनी विदेश नीतियों में असफल रही हैं.चीन, पाकिस्तान और नेपाल तीनो से एक साथ लड़ने का जोखिम भारत बिल्कुल उठाना नही चाहेगा और ये भी सच है कि सरकार को फिर से अपनी विदेश नीति की समीक्षा करने की जरूरत है.आगे चुनौतियों की कतार हैं, देखना ये होगा कि भारत का अगला कदम क्या होगा? और क्या भारत नेपाल को फिर से अपने खेमे में कर पायेगा? ये तो आना वाला वक़्त ही बताएगा जिसका हम सब को बेसब्री से इंतेज़ार रहेगा.
 


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