आमतौर पर सफलता को पैसे, भौतिक सुख सुविधाओं से जोड़ कर देखा जाता हैं, अगर आपके पास काफी धन-दौलत, शोहरत है तो आपको सफल माना जाता हैं. पर क्या ये सच हैं? अगर ये सच है तो अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के पास इन सभी चीज़ों में से क्या नही था? सुशांत जी के आत्महत्या ने सफलता की परिभाषा पे एक गहरी चोट पहुचाई हैं,जिसका ज़ख्म  आने वाले कई सालों तक हमारे दिलों को आहत करता रहेगा.

मनुष्य सफलता पाने के ख़्वाब लिए अपनी सारी जिंदगी पैसे के पीछे भागते भागते गवां देता हैं और जब कही एकांत में बैठ कर सोचता हैं तो उसे एहसास होता हैं कि जिसे वो अपनी सफलता सोच रहा है वो तो बस एक दौड़ थी जिंदगी की जिसने सब कुछ दिया बजाए सुकून और सफलता के.

बाहरी दिखावा, आडंबर, झूठी शान,  जलन, ईर्ष्या, अहंकार इन त्रुटियों ने समाज को इस तरह जकड़ कर रखा है की इंसान ने इसे ही सफलता मान लिया हैं. पर क्या ये सफलता हैं? बड़ा सवाल जिसका जवाब आप सब को पता है, पर जरूरत इस बात की हैं कि हमे सफलता का असली मायने समझना हैं
अगर सच पूछे तो सफलता के मायने सबके लिए अलग अलग हैं.
उद्धरण के तौर पे,

1. एक सन्यासी की सफलता ईश्वर  को पाने में हैं.
2. एक विद्यार्थी की सफलता उसके पास हो जाने में हैं.
3. एक गरीब की सफलता खुद की भूख मिटाने में हैं.
4. एक मरीज़ की सफलता उसके स्वस्थ हो जाने में हैं.
5. अगर कोई इंसान खुद को अकेला महसूस करता हैं और अगर उसे कोई व्यक्ति मिल जाये जो उसका अकेलापन दूर करे, ये भी सफलता हैं.

सुशांत जी के अचानक निधन से मै बहुत आहत हूँ, बिहार का वो लाल जिसने 34 की इतनी कम उम्र में अपनी  मेहनत से फ़िल्म जगत में जिस  मुकाम को  हासिल किया था वो निसंदेह ही इतिहास के सुनहरे पन्नो पर दर्ज हो चुका हैं.इसकाए  विपरीत ये भी सत्य हैं कि उन्होंने लोगो के सफलता के मायने पे एक बड़ा प्रश्न चिह्न लगा दिया हैं जिसे नज़रअंदाज़ करना किसी के बस में नही हैं.

सफलता के मायने भले ही सब के लिए अलग अलग हो पर उन सभी माईनो में एक चीज़ ज़रूर सामान्य होनी चाहिए और वो हैं "मन की शांति". इसके बिना सफलता की परिभाषा अधूरी हैं.
 इसकी कमी लगभग हर किसी के जीवन मे होती हैं, क्योंकि मन की शांति जीवन के विभिन्न पहलुओं 
 से जुड़ी  हैं. जैसे कि आप अस्वस्थ है तो आपके मन मे शांति नही होगी. घर मे कलह हैं तो मन मे शांति नही होगी.
आपको अपने जीवन को संतुलित रखना होगा तभी "मन की शांति" मिल सकती है.

जिस प्रकार इंसान अच्छे कर्म करता हैं  उसी प्रकार उससे गलतियां भी होती हैं, कभी मन प्रसन्न  रहता हैं, तो कभी निराश भी होता है . 8 वर्ष की उम्र में सफलता ये है कि आप अपने घर आने का रास्ता जानते हैं, वही दूसरी तरफ सफलता ये भी है 85 की उम्र में आपको अपने घर आने का रास्ता पता है.
अतः यही तो जीवन चक्र हैं जो घूम फिर कर वापस वही आ जाता है जहां से उसकी शुरूआत हुई थी. और यही जीवन का परम सत्य हैं.
आज मैं अपने इस लेख के माध्यम से आप सब से विनती करना चाहता हूँ  की चाहे आप किसी भी हालत में हो या आपके जानने वालो के साथ आपका कैसा भी रिश्ता हो, सब से बात करे, एक दूसरे की भावनाओं को समझने की कोशिश करे. कभी भी मन कुंठित हो तो अपनो से साझा करें, अपने अंदर चल रहे अनियंत्रित भावनाओं को अपने करीबियों से साझा करें. क्या पता हमारी एक छोटी से पहल किसी को नई ज़िन्दगी देदे और उसके परिवार को उसके अस्तित्व की खुशी.
सुशांत सिंह राजपूत जी के परिवार ने जो खोया हैं उसकी कमी तो हम कभी पूरी नही कर सकते पर अपनो का खयाल रख कर कोशिस जरूर कर सकते हैं कि दुबारा ऐसी परिस्थिति किसी के जीवन मे न आए.


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