अन्ना हजारे हमारे समय की उस पीढ़ी के प्रवक्ता के रूप में मौजूद हैं जिनकी बातें लोग सुनते हंै और उस पर अमल करने की कोशिश भी करते हैं. ये वही अन्ना हजारे हैं जिनकी वजह से कांग्रेस केन्द्र की सत्ता से बेदखल हो गई.जनलोकपाल के मुद्दे पर उन्होंने ऐसा समां बांधा कि कांग्रेस सरकार के खिलाफ जनमत एकत्र हो गया.इस अभियान में अचानक से कहीं से भाजपा ने अपना स्पेस क्रिएट कर लिया और नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री के रूप में स्वयं को स्थापित कर लिया.तब के प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह का मौन रहना कांग्रेस को भारी पड़ा तो बेलाग बोलने वाले नरेन्द्र मोदी में लोगों ने बदलते भारत का सपना देखा था.इस बदलाव का श्रेय अन्ना हजारे को जाता है लेकिन चार साल पीछे पलटकर देखते हैं तो उम्मीद कहीं मरती हुई दिखती है.बेबाक और बेलाग बोलने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश के ज्वलंत मुद्दों पर भी खामोशी अख्तियार कर लेते हैं.देश अवाक रह जाता है.देश उम्मीद कर रहा है कि जनलोकपाल के मुद्दे को अभियान बनाने वाले अन्ना क्या लोकलाज की कोई मुहिम छेड़ेंगे? क्या वहशियों की शिकार बच्चियों के दरिदों को सजा दिलाने के लिए अपना मुंह खोलेंगे? जनलोकपाल से भी बड़ा मुद्दा है लोकलाज का जिस पर अन्ना की चुप्पी से उनकी विश्वसनीयता संकट में है।
    चार साल पहले जनलोकपाल को लेकर उठे आंदोलन में उनके साथ अरविंद केजरीवाल, कुमार विश्वास, किरण बेदी, संजय सिंह जैसे दर्जनों लोग थे जो जनलोकपाल मुद्दे को हवा दे रहे थे.आम आदमी को बता रहे थे कि जन लोकपाल बन गया तो भारत भ्रष्टाचार मुक्त हो जाएगा लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं.केन्द्र की सत्ता कांग्रेस के हाथ से जाती रही और भाजपा काबिज हो गई.केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए और किरण बेदी भाजपा की हो गईं.संजय सिंह आम आदमी पार्टी से राज्यसभा में पहुंच गए.तल्ख बातों से लोगों के दिलों में नश्चतर चुभोने वाले कवि कुमार विश्वास और अन्ना हजारे साइडलाइन कर दिए गए.अन्ना हजारे को ना तो जनलोकपाल मिला और ना कुमार विश्वास को राज्यसभा में जाने का मौका.जिस आम आदमी को टारगेट कर आम आदमी पार्टी मैदान में उतरी थी, वहां आम गायब हो गया और खास रह गए.आज की स्थितियों में इसे मौकापरस्त राजनीति का एक चेहरा कह सकते हैं।
खैर, अन्ना हजारे एक बार फिर इस बीच जनलोकपाल को लेकर अनशन पर बैठते हैं लेकिन इस बार उनका ओज फीका रहता है.इसमें बढ़ती उम्र और सेहत भी एक कारण है लेकिन उन्हें वायदे के साथ वापस उनके गांव भेज दिया जाता है.इस समय देश सुलग रहा है.उसकी अस्मिता पर सवालिया निशान लगा हुआ है.देश के कई राज्यों से मासूम बच्चियों के साथ दुष्कर्म करने और मार डालने की घटना पूरे देशवासियों को झकझोर कर रख दिया है. संयुक्त राष्ट्र संघ भी चिंता जाहिर कर रहा है.प्रधानमंत्री मोदी लम्बी चुप्पी के बाद देश को आश्वस्त करते हैं कि बच्चियों को न्याय मिलेगा.लेकिन गृहमंत्री राजनाथसिंह अन्ना की तरह खामोश हैं.अन्ना को भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा लगता है लेकिन मासूमों के साथ दरिंदगी पर वे भी चुप हैं.जब उनके लिए नारा लगता है कि ‘अन्ना नहीं आंधी है, देश का दूसरा गांधी है’ तो इस गांधी को काठ क्यों मार गया है? क्यों उन्होंने अब तक एक शब्द इन बच्चियों के लिए बोला हैज़ क्या कभी उनकी आत्मा कहेगी कि अन्ना कुछ तो बोलो?लोकलाज की बातें उन्हें परेशान क्यों नहीं करती हैं? क्यों वे इस मामले में केन्द्र सरकार को, जिन राज्यों में ऐसे अत्याचार की खबर आयी है, उन्हें कठघरे में खड़ा करने की कोशिश क्यों नहीं करते हैं? क्यों राष्ट्रपति से उत्तरप्रदेश के उन्नाव का मामला हो या कश्मीर के कठुवा का मामला, राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग करने में पीछे क्यों रह जाते हैं? अन्ना हमारे समय की पीढ़ी के पुरखों में एक हैं इसलिए दायित्व बनता है कि बच्चियों के आवाज उठाएं. उन्हें न्याय दिलाएं और यह करना अन्ना के लिए जनलोकपाल से बड़ा मुद्दा है.
    अन्ना से इसलिए उम्मीद की जा सकती है लेकिन उनके पुराने साथी केजरीवाल से कोई उम्मीद करना बेमानी है.उन्होंने भी अन्ना की तरह अपने मुंह सील रखा है.दिल्ली की निर्भया कांड उन्हें डराती नहीं है, सताती नहीं है या वे खालिस पॉलिटिशियन बन गए हंै, जिन्हें समय के साथ भूल जाने की आदत सी हो जाती है. कुमार विश्वास की चुप्पी और किरण बेदी की खामोशी देश को परेशान कर रही है. राजनीति कीजिए लेकिन मासूमों के साथ खड़े होने की हिम्मत तो दिखाइए. राज्यसभा में सरकार के खिलाफ थोकबंद आरोप को लेकर गरजने वाले आप पार्टी के संजयसिंह को भी पार्टी ने बोलने से मना कर दिया है? इन्हें तो सीखना चाहिए कि डरी होने के बाद भी राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ने अपने पद से विरोधस्वरूप इस्तीफा दे दिया.भाजपा सांसद हेमामालिनी ने भी विरोध जताया है लेकिन महबूबा को कुर्सी छोडऩे में वक्त लगेगा, यूपी के योगी भी शायद इस दुष्कर्म को महज एक हादसा मानते हैं.अपने विधायक सेंगर की गिरफ्तारी इसलिए रोक दी थी कि पर्याप्त सबूत नहीं थे.वह तो समाज अदालतों का शुक्रगुजार रहेगा कि जिनके हस्तक्षेप के बाद मासूमों को न्याय मिलने की आस जगी है।
    अन्ना हजारे अभी भी वक्त है कि जनलोकपाल के साथ समाज के लोकलाज बचाने के लिए आवाज उठायें.ऐसा नहीं किया तो इतिहास कभी माफ नहीं करेगा.जनलोकपाल नहीं बनेगा तो भी इस देश की जनता भ्रष्टाचार से तो फिर भी निपट लेगी लेकिन लोकलाज खतरे में पड़ गया तो पूरा समाज नष्ट हो जाएगा.अखिलेश और मायावती भी सशक्त विपक्ष की भूमिका में नहीं दिखते हैं वहीं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी आधी रात को कैंडल मार्च निकालकर लोकलाज बचाने में अपनी भूमिका का निर्वाह करते हैं.यह विपक्ष का दायित्व है और इस दायित्व की पूर्ति में कामयाब दिखते हैं.दुर्भाग्य तो यह है आरोपियों को बचाने के लिए तर्क नहीं बचे तो कुतर्क दिया जा रहा है.अन्ना आओ, रामलीला मैदान तुम्हारा इंतजार कर रहा है.आवाज उठाओ और बता दो कि जनलोकपाल ही नहीं, देश और समाज की लोकलाज की चिंता में तुम परेशान होते हो.


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