उन असंख्य भारतीय उपभोक्ताओं में से एक हूं जिसे जीएसटी के बारे में कुछ भी नहीं मालूम. यह जितना सच है, उससे बड़ा सच यह है कि मैं इसके बारे में बहुत ज्यादा जानना भी नहीं चाहता हूं. मुझे पता है कि एक कमीज खरीदने के लिए मेरे पास 6 सौ रूपये हैं तो मैं दुकानदार से सौदा करते समय अपने बजट पर ले आऊंगा. ऐसा मैं ही नहीं करता बल्कि मेरे जैसे करने वालों की गिनती बेशुमार है. वास्तव में भारतीय बाजार का चेहरा यही है क्योंकि बदलते समय में भी मुझ जैसी पुरानी पीढ़ी अभी भी विनिमय बाजार से बाहर नहीं हो पायी है. भारतीय बाजार की खासियत है कि वह आपस में भरोसे का व्यापार करे. इस भरोसे के बाजार में कब वेट आया, हम जैसे क्रेताओं को खबर भी नहीं हुई और जीएसटी भी कब लागू हो जाता, हमें खबर नहीं होती अगर इसे लेकर हंगामा नहीं होता. मैं एक उपभोक्ता के अलावा पत्रकार-लेखक हूं तो मेरा नैतिक दायित्व बन जाता है कि इस बारे में पड़ताल करूं. 

जीएसटी को लेकर अपने जैसे सौ-पचास लोगों से बात की तो उन्हें इसके बारे में पता नहीं था. अलबत्ता उनका एक लाईन का जवाब था जो टैक्स लगेगा, वह तो देना है. हां, ज्यादा टेक्स से उन्हें महंगाई बढ़ जाने की चिंता थी. इस जवाब का अर्थ हुआ कि व्यापारियों को जीएसटी अपने लाभ के खाते से नहीं देना है बल्कि पूर्व की तरह दूसरे टैक्स की भांति उपभोक्ता से वसूल कर देना है. जब ऐसा है तो हंगामा किस बात का? दरअसल, केन्द्र सरकार ने जीएसटी के माध्यम से उन लेन-देन पर शिकंजा कसने की कोशिश की है जिससे राजस्व का नुकसान होता था. इसमें गैरवाजिब कोई बात नहीं है. एक और शिकायत यह है कि जीएसटी का हिसाब रखने के लिए कम्प्यूटर और इंटरनेट की जानकारी भी रखनी होगी तो यह भी कोई बड़ी समस्या नहीं है. वह दिन बीत गए जब व्यापारी की नई पीढ़ी में शिक्षा के बजाय कारोबार में अधिक दिलचस्पी होती थी लेकिन वर्तमान समय में नई कारोबारी पीढ़ी शिक्षित है और इंटरनेट से वाकिफ है. ऐसे में जीएसटी का हिसाब रखना कोई मुश्किल काम नहीं है. 

ऐसे में जब हम भारतीय बाजार संस्कृति और जीएसटी से उपजे गुस्से को जांचने की कोशिश करते हैं तो लगता है कि कोई बहुत बड़ा मसला वैसा है नहीं, जैसा कि बताया, समझाया जा रहा है. हां, महंगाई से लोगों का गुस्सा वाजिब है क्योंकि सरकारी नौकरियों में एक के बाद एक वेतनमान आ जाने से उनका वेतन इतना अधिक हो गया है कि समाज में असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो रही है. इस पर ध्यान देना होगा कि निजी क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों की आर्थिक स्रोत भी बढ़ें. कुछ लोगों को नागवार गुजर सकता है लेकिन सच यह है कि हम मुफ्त के आदी हो चुके हैं. हमारी इस कमजेारी का लाभ बाजार उठाता है. आए दिन लगने वाले सेल और एक के साथ एक मुफ्त देने का ऐलान हम सबको लुभाता है. सवाल यह है कि एक के साथ एक मुफ्त देने के बजाय वह एक का ही दाम आधा क्यों नहीं कर देता है? वह ऐसा करेगा तो उसका स्टॉक क्लियर नहीं होगा और नए स्टॉक में वह पुराने की कुछ क्षतिपूर्ति हुई हो तो उसे वह एडजस्ट कर लेगा. लेकिन हम एक के साथ एक के लालच में बाजार का चेहरा ही बदल देते हैं. अक्सर अखबारों में बड़े विज्ञापन देखने को मिल जाएंगे कि फलां कंपनी को करोड़ों का नुकसान हुआ तो वह अपना माल औने-पौने दाम में बेचने आई है. फिर वही कहानी. हमारे भीतर के लालच को बाजार ने चिंह लिया है और वह हमें लुभा-लुभा कर लुटने की जुगत में लगी रहती है.

इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमें जियो मोबाइल की मार्केटिंग से समझना चाहिए. कंपनी का ऐलान है कि वह मोबाइल इंटरनेट सुविधा के साथ फ्री दे रही है लेकिन बतौर सिक्योरिटी वह 1500 रुपये लेगी. यह राशि तीन वर्षों बाद लौटा दी जाएगी. अब समझने वाली बात यह है कि इस फ्री मोबाइल और जमानत राशि से किसका लाभ हो रहा है और किसका नुकसान हो रहा है. जियो हो या कोई और कंपनी वह हमें मुफ्त में कोई सुविधा क्यों देगी? वह कारोबारी कंपनी है और कंपनी का प्रथम उद्देश्य लाभ कमाना होता है लेकिन वह हम और आपको फ्री देने की बात कर रही है. एक समय था जब सेल्समेन आपके दरवाजे पर आकर कहता था कि यह सामान खरीदने पर आपको यह फ्री-गिफ्ट मिलेगा. तब भी उस सेल्समेन से मेरा सवाल होता था कि गिफ्ट के पैसे कब लिए जाते थे लेकिन मेरे जैसा सिरफिरा कोई दो-पांच मिलते होंगे. सो आज तक जवाब नहीं मिला लेकिन वापस यही सवाल जब मोबाइल कंपनियों से फ्री सेवा क्यों? 

जितना मेरा कारोबारी समझ है, उसक मुताबिक सेल करने पर कायदानुसार जीएसटी भुगतान करना होगा लेकिन जियो अपना प्रोडक्ट बेच नहीं रही है तो जीएसटी भुगतान करने का सवाल नहीं है. जहां तक अमानत राशि की बात है तो कंपनी इस फ्री सेवा से होने वाले नुकसान की भरपाई इस राशि से कर सकती है. इस महादेश में 1500 के मान से अरबों की राशि कंपनी के पास जमा होगी जिसे वह पंूंजी के तौर पर बिना ब्याज दिए उपयोग कर सकेगी. तीन वर्ष की अवधि में इस पंूजी से वह इतना कमा लेगी कि उपभोक्ताओं को उनकी जमा रकम लौटाने में भी उसे कोई परेशानी नहीं होगी. इनमें से 25 प्रतिशत उपभोक्ता इस राशि पर दावा नहीं करेंगे या भूल जाएंगे, वह कंपनी को अलग से फायदा देगी. सरकारी संस्थाओं यथा नगर निगम, बिजली विभाग और बीमा कम्पनियों में करोड़ों रुपये इसी तरह के जमा हैं जिनका दावेदार कभी आया ही नहीं.

खैर, मोबाइल कंपनियों के इस खेल में नुकसान किसका हो रहा है और नफे में कौन है? बात एकदम साफ है कि निजी कम्पनियां ही इस खेल में फायदे में हैं. जब फ्री में इंटरनेट और मोबाइल मिले तो बीएसएनएल की तरफ कोई क्यों जाएगा? लगातार इसके घाटे में जाने का एक बड़ा कारण यह है तो दूसरा बड़ा कारण सरकारी सेक्टर में सर्विस नहीं मिलने की शिकायत. निजी कम्पनियां ऐन-केन देश को मिलने वाला राजस्व का बड़ा हिस्सा ले जाती हैं जिससे सरकार को बुनियादी ढांचा सुधारने और आम आदमी को सुविधा देने में बजट की समस्या आती है जो स्वाभाविक है. इन सबकी जड़ में ना तो निजी कम्पनियां दोषी हैं और ना कोई और बल्कि इसके लिए आप और हम दोषी हैं जो थोड़े से लाभ के लिए मुफ्त की सेवाओं के आश्रित हो जाते हैं. औसतन एक आदमी इस सेवा के उपभोग से 2 से 5 सौ रुपयों की बचत कर लेता है लेकिन इससे देश के राजस्व का जो नुकसान होता है, वह कंपकंपा देने वाला होता है. जिस तरह हम सब जीएसटी के खिलाफ लामबंद हुए हैं तो क्या वह दिन भी आएगा जब निजी कंपनियों के इस लोभ-लालच योजनाओं का प्रतिकार कर सकेेंगे? जिस दिन हम फ्री की बातें अपने दिमाग से निकाल देंगे और सेवा का भुगतान करने का निश्चय कर लेेंगे तो किसी पश्चिमी देश जैसा विकसित होने में दशक नहीं, साल लगेंगे.


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