आज जबकि भारत में मीडिया में भक्तिकाल का स्वर्णिम युग चल रहा हो और जम्मू कश्मीर जैसे संवेदनशील राज्य में प्रेस स्वतंत्रता कायम रखने की मीडिया संगठनों की मांग को बड़ी आसानी से दरकिनार कर दिया गया हो, उसी दौर में आॅस्ट्रेलिया में सरकार द्वारा मीडिया पर लगाम लगाने की कार्रवाई के विरोध में सभी अखबारों ने सोमवार ( 21 अक्टूबर ) को एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए अपने पहले पन्ने को काला कर के छापा. अखबारों के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया सरकार का सख़्त क़ानून उन्हें लोगों तक जानकारियां ला पाने से रोक रहा है. अखबारों के पहले पेज को काला रख कर विरोध जताने के पीछे इस साल जून में ऑस्ट्रेलिया के एक बड़े मीडिया समूह ऑस्ट्रेलियन ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (एबीसी) के मुख्यालय और न्यूज कार्प आस्ट्रेलिया के एक पत्रकार के घर पर छापे मारी की  घटना है.

इस कार्रवाई ने वहां समूचे प्रेस जगत को रोष से भर दिया है. सरकारी एजेंसियों ने ये छापे  व्हिसलब्लोअर्स के जरिए लीक हुई जानकारियों के आधार पर कुछ लेखों के प्रकाशन के बाद मारे गए थे. सरकार इन लेखों से बौखला गई थी. प्रेस के  इस विरोध प्रदर्शन को राइट टू नो कोएलिशन  नाम दिया गया है, जिसका प्रिंट मीडिया के अलावा कई टीवी, रेडियो और आनलाइन समूह भी समर्थन कर रहे हैं. यह अभियान चलाने वालों का कहना है कि पिछले दो दशकों में आस्ट्रेलिया में ऐसे सख्‍त कानून लागू किए गए हैं, जिससे खोजी पत्रकारिता को खतरा पहुंच रहा है. मीडिया और व्हिसलब्लोअर्स को संवेदनशील मामलों की रिपोर्टिंग करना कठिन होता जा रहा है. खास बात है कि एक मीडिया हाउस की आवाज दबाने के खिलाफ वहां सारे अखबार एकजुट हो गए हैं. सोमवार को प्रकाशित अखबारों के पहले पन्ने पर छपे सारे शब्दों को काली स्याही से पोत दिया गया और लाल मुहर लगाई गई, जिस पर लिखा था-सीक्रेट. ऐसा करने वालों में  आॅस्ट्रेलिया के नामी अखबार द आॅस्ट्रेलियन, द डेली एक्जामिनर,  द एडवर्टायजर, डेली मरकरी आदि शामिल हैं. इन अखबारों का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानूनों की आड़ में सही रिपोर्टिंग पर अंकुश लगाया जा रहा है और देश में एक गोपनीयता की संस्कृति बन गई है. इस बारे में आस्ट्रेलिया सरकार की दलील वही है, जो किसी भी सरकार की हो सकती है. सरकार के मुताबिक वह प्रेस की आजादी की समर्थक है, लेकिन कानून से बड़ा कोई नहीं है.
सीधे तौर पर कहें तो मीडिया की मुश्कें कसने की आस्ट्रेलिया सरकार की इस कोशिश को अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला माना जा रहा है. कुछ अखबारों ने सवाल उठाए- पत्रकारों और व्हिलसब्लोअर्स पर हमला: क्या आस्ट्रेलिया में ऐसा संभव था ? हां, लेकिन अब यह हो रहा है. क्योंकि सरकार सच को छुपाना चाहती है. उधर देश के कई जाने माने पत्रकारों ने एक सार्वजनिक चिट्ठी जारी कर कहा कि असहज करने वाले सच को उजागर करने वाली खोजी पत्रकारिता के बगैर स्वस्थ लोकतंत्र काम नहीं  कर सकता. जनता को सच जानने का पूरा  अधिकार है.  
गौरतलब है कि आस्ट्रेलिया में प्रेस की स्वतंत्रता की कोई सुस्पष्ट संवैधानिक गारंटी भले न हो, लेकिन उसकी आजादी का मोटे तौर सम्मान किया जाता रहा है. लेकिन अमेरिका में वर्ष 2001 में हुए 9/11 के हमले के बाद आॅस्ट्रेलिया में 70 आतंकरोधी और सुरक्षा से जुड़े कानून लागू किए गए. इन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा कानून कहा गया. ये सभी मीडिया की आजादी को नियंत्रित करने वाले थे. माना जाता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर इतने ज्यादा और कड़े कानून व   प्रतिबंध और किसी भी देश में नहीं है. इन कानूनों के दायरे में तकरीबन सभी पत्रकार आ गए तथा इन कानूनों के तहत खुफिया एजेंसियों तथा पुलिस को किसी भी पत्रकार के सपंर्कों को मानीटर करने का अधिकार मिल गया. साथ ही ऐसे कानून की जद में आने पर खुद को निर्दोष साबित करने की जिम्मेदारी भी सम्बन्धित पत्रकार की है. मानहानि कानून भी इतना कठोर बनाया गया है कि किसी के भी खिलाफ छापना खतरे से खाली नहीं है. वैसे भी अन्य यूरोपीय देशों तथा अमेरिका की तुलना में आॅस्ट्रेलिया में प्रेस की आजादी की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. इस लिहाज से अंतरराष्ट्रीय संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बार्डर्स  की पिछले साल  की ‍िरपोर्ट में 128 देशों  की सूची में आस्ट्रेलिया का नंबर 21 वां था. ( यह बात अलग है कि इस सूची में भारत 140 वे नंबर पर है. यानी  पाकिस्तान से दो पायदान ऊपर). दुनिया में प्रेस की आजादी  की संवैधानिक गारंटी यूरोप के स्केंडेनेवियाई देशो में है. सबसे पहले स्वीडिश संसद ने 1766 में एक कानून पास कर देश में  प्रेस और सूचना की स्वतंत्रता कायम रखने की गारंटी दी थी. ये तब की बात है, जब भारत में मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय का शासन था.  
बेशक अभिव्यक्ति की आजादी का दुरूपयोग नहीं होना चाहिए. भारत में भी मीडिया ट्रायल, निजता के सम्मान तथा सुरक्षा से जुडी संवेदनशील जानकारियां उजागर करने के कुछ मामले सामने आते रहे हैं. ऐसी प्रवृत्ति को नियंत्रित भी किया जाना चाहिए, लेकिन इसकी आड़ में मीडिया का मुंह बंद करने की कोई भी कोशिश अस्वीकार्य होनी चाहिए. भारतीय संविधान ने अनुच्छेद 19 के तहत हमे अभिव्यक्ति की आजादी दी हुई है. हालांकि इसे भी खत्म करने की कोशिशें भी होती रही हैं. तीस साल पहले पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार द्वारा देश में प्रेस पर नियंत्रण का कानून लाने के प्रस्ताव का  प्रेस ने जबर्दस्त विरोध किया था, जिसे वापस ले लिया गया. लेकिन आज भारतीय मीडिया में वैसा दम, प्रतिबद्धता और एकजुटता दिखाई नहीं देती. वर्तमान सरकार ने तो मीडिया नियं‍त्रण के दूसरे और परोक्ष नुस्खे खोज लिए हैं. ऐसे में मीडिया के बड़े तबके ने आज सत्ता को हर संभव खुश करने के लिए चौबीसों घंटे ढोल-मंजीरे बजाने का हाथ में ले लिया है और खुद अपनी रीढ़ निकालकर किसी तहखाने में रख दी है. जबकि यह अडिग सचाई है कि सच को उजागर करने और सत्ताधीशों को मुश्किल में डालना कहीं से देश विरोधी न तो है और  न ही हो सकता है. दरअसल मीडिया और अभिव्यक्ति की आजादी लोकतंत्र के धड़कते रहने की जमानत है. इसे कायम रखने के लिए आॅस्ट्रेलियाई अखबारों के प्रथम पन्ने की काली इबारत में निहित बेदाग सत्य को गहराई से समझना चाहिए. अपनी स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए वहां की प्रेस ने जो एकजुटता और साहस दिखाया है, उसकी जितनी सराहना की जाए, कम है. क्योंकि ऐसी ताकत उन बुनियादी मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता से आती है, जो लोकतंत्र के आधार स्तम्भ हैं. बोलने और लिखने की आजादी उन में से एक है. हालांकि इस आजादी का उपयोग दुर्भावना से करना गलत है, लेकिन दुर्भावना  की भी अलग-अलग परिभाषाएं हैं. मूल बात जनता को अपनी बात निडरता से रखने की आजादी तथा ऐसी बात को सुनने सकने की सत्ताधीशों में हिम्मत और उदारभाव की दरकार है. आॅस्ट्रेलियाई मीडिया ने जता दिया है ‍‍‍कि उसका मुंह बंद करना और आंखों पर पट्टी बांध देना नामुमकिन है. सवाल यह है कि क्या भारतीय मीडिया भी इससे कुछ सबक लेगा या फिर इस अघोषित सरेंडर में  उसने अपनी खुद्दारी से भी समझौता कर लिया है?

   





 


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