कर्ज और बेकारी से परेशान एक व्यापारी द्वारा खुद ही सुपारी देकर अपनी हत्या इस उम्मीद में करवाना कि बाद मरने के उसके परिवार को बीमा राशि मिल जाएगी, को आप क्या कहेंगे? लाक डाउन में काम धंधा खोने के बाद उपजी लाचारी की प‍राकाष्ठा, निराशाजनित सोच में छिपी परिवार की चिंता या फिर अवसाद की इंतिहा? इस वक्त जब पूरा देश और खासकर मीडिया अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की खुदकुशी को लेकर विह्वल हुआ जा रहा है, लगभग उसी समय देश की राजधानी दिल्ली के एक कर्ज में डूबे एक युवा व्यापारी ने बीमा राशि से अपनी गरीबी दूर करने की पवित्र मंशा से खुद की ही हत्या करवा ली ताकि उसके मरने के बाद बीमा राशि  के रूप में मिलने वाली 1 करोड़ की रकम से बाकी बचे परिजनों की तो गरीबी दूर हो सके. यह घटना अपने आप में भीतर तक झकझोर देने वाली है, चूंकि मृतक व्यापारी के साथ कोई ग्लैमर नहीं जुड़ा था, इसलिए उसकी इस विवशताजनित आत्म हत्या पर किसी ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया, सिवाय एक क्राइम केस मानने के.

दरअसल यह पूरा मामला हैरान करने वाला है. इसलिए भी, क्योंकि  कोरोना लाॅक डाउन के दौरान इस देश ने भुखमरी और लाचारी के कई मार्मिक दृश्य देखे और जिंदगी की जद्दोजहद में लोगों को खटते  देखा और देख रहे हैं. लेकिन दिल्ली का यह मामला नाटकीयता की हद तक कचोटने वाला है. अब तक मिली जानकारी के मुताबिक पिछले दिनों दिल्ली पुलिस को एक कारोबारी की हत्या की खबर मिली थी. जांच के बाद चौंकाने वाली जानकारी सामने आई कि मृत व्यापारी ने खुद ही अपनी मौत की साजिश रची थी. मामला दिल्ली के कड़कड़डूमा इलाके का है. बीती 10 जून को पुलिस को‍ ‍िदल्ली के रणहौला इलाके में एक शख्स की लाश पेड़ से लटकी मिली थी. इसके  पहले एक महिला शानू बंसल  ने आनंद विहार पुलिस थाने में ‍शिकायत की थी कि किराने का थोक व्यवसाय करने वाले उसके 37 वर्षीय पति गौरव बंसल दुकान से लौटकर नहीं आए. गौरव कारोबार में घाटे के कारण डिप्रेशन में था. पूछताछ में पुलिस को पता चला कि गायब होने से पहले गौरव ने एक लड़के से फोन पर बात कर अपनी हत्या की सुपारी उसे दी थी. सौदा 90 हजार में तय हुआ था. पहचान बताने के लिए गौरव ने खुद ही हत्यारों को व्हाट्सएप पर अपनी फोटो भी भेजी थी. ताकि गड़बड़ न हो.  जैसे ही गौरव रणहौला इलाके में पहुंचा एक नाबालिग सहित चार आरोपियों ने गौरव के हाथ बांधे और गर्दन में फांसी का फंदा डाल कर उसे पेड़ से लटका दिया. गौरव ने यह इच्छा मरण इसलिए स्वीकार किया क्योंकि वह नहीं चाहता था कि उसका परिवार भी कर्ज में डूबा रहे. उल्टे इस तरह मर जाने  के बाद उसकी पत्नी व परिजनों को जीवन बीमे की एक करोड़ की राशि मिल सकती थी.

जीवन बीमा इसलिए किया जाता है कि अगर आप की असमय मृत्यु हो जाए तो परिवार के सामने अचानक आन पड़े आर्थिक संकट से निपटने के लिए बीमा की रकम हाथ में आ जाए. लेकिन लोगो ने इसका भी बड़े पैमाने पर दुरूपयोग करना शुरू कर दिया है. दिल्ली के व्यापारी का मामला भी कुछ ऐसा ही था. हालांकि यह कोई पहला प्रकरण नहीं है. मध्यप्रदेश में पिछले साल जनवरी में हिम्मत पाटीदार नाम के व्यक्ति ने इससे भी एक कदम आगे जाकर साजिश रची थी. इस पर काफी राजनीतिक बवाल भी मचा था. मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ( तब वो पूर्व थे) ने ट्वीट कर हिम्मत को आरएसएस का समर्पित कार्यकर्ता बताकर उसे श्रद्‍धांजलि भी दी थी. लेकिन पुलिस जांच में ये हत्या पूरी तरह सुनियोजित फर्जीवाड़ा निकला. खुलासा हुआ कि हिम्मत पाटीदार ने 20 लाख रू. की बीमा‍ राशि के ‍िलए अपने ही खेत मजदूर की हत्या कर उसकी लाश का चेहरा बिगाड़ दिया और बाद में उसे अपने कपड़े पहना दिए. तब विपक्ष में बैठी भाजपा ने इसे राज्य में कानून-व्यवस्था बदतर होना बताया था. पुलिस जांच में पता चला कि रतलाम‍ ‍िजले के कमेड़ गांव के हिम्मत पाटीदार के पिता ने पुलिस में रिपोर्ट लिखाई कि उसके बेटे की चेहरा जलाकर  हत्या कर दी गई है. क्योंकि लाश के आसपास हिम्मत के ही कपड़े पड़े मिले हैं. तफ्तीश में पता चला कि ‍हत्या के समय से ही हिम्मत के खेत का एक मजदूर भी लापता है. शुरू में पुलिस ने उसी को हत्या का आरोपी  माना था. लेकिन जब हिम्मत की डायरी से बीमा नंबर, एफडी, पिन नंबर आदि की जानकारी मिली और उसके फोन का सारा डाटा गायब मिला तो पुलिस को शक हुआ. डीएनए टेस्ट से साबित हुआ कि मृतक हिम्मत न होकर उसका नौकर मदनलाल है. हिम्मत ने गलती यह की थी कि मृतक मदनलाल को बाकी अपने कपड़े तो पहना दिए, लेकिन अंडरवियर उसी की रहने दी, जिसके आधार पर मदनलाल की पत्नी ने उसे पहचान लिया. हिम्मत ने भी बैंक से भारी कर्ज ले रखा था, जिसे वह फर्जीवाड़ा कर बीमे की राशि से चुकाना चाहता था. इसी तरह राजस्थान के भीलवाड़ा में भी पिछले साल एक फाइनेंसर ने 80 हजार रू. की सुपारी देकर खुद की हत्या करवाई ताकि परिवार को 50 लाख की बीमा राशि‍ मिल सके. पुलिस ने इस मामले में दो लोगों को गिरफ्‍तार किया था. यह फाइनेंसर भी आर्थिक तंगी में था. डिप्रेशन के चलते उसने खुद हत्यारों को पूरा सहयोग किया. बाद में नाले में उसकी लाश मिली. कुछ ऐसा ही मामला हरियाणा के सोनीपत में हुआ था, जहां एक कर्ज में डूबे दुकानदार सतबीर सिंह  ने ढाई हजार रू. में सुपारी देकर खुद अपने को ही गोली मरवा ली थी. सतबीर की मौत के बाद उसकी 10 लाख रू. की बीमा राशि परिजनों को ‍िमलने  वाली थी. इसके बदले में अपनी हत्या के लिए उसने 60 हजार रू. में सुपारी दी थी.

कोई व्यक्ति परिवार का पेट पालने के लिए खुद अपनी मौत की साजिश न सिर्फ रचता है, बल्कि उस पर अमल भी करता है, इसे आप क्या कहेंगे? परिवार के प्रति सहानुभूति अथवा बेईमानी का एक कलंक उनके माथे पर हमेशा के लिए छोड़ जाना ? वैसे भी हर साल बीमा कंपनियों को लाखों करो़ड़ रू. का नुकसान ऐसे फर्जी क्लेम के कारण होता है. बिजनेस टुडे में पिछले साल छपी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2019 में फर्जी बीमा क्लेम के कारण बीमा कंपनियों को 45 हजार करोड़ रू. का फटका लगा था. इसकी एक वजह इस तरह के फर्जी दावो को रोकने के लिए देश में कठोर बीमा कानून की कमी भी है.

फर्जी दस्तावेजों के दम पर बीमा क्लेम करने से भी ज्यादा विचलित कर देने वाला मामला बीमा राशि प्राप्त करने के लिए खुद की जिंदगी को ही दांव पर लगा देना हद दर्जे की मूर्खता और लाचारी है. सवाल सिर्फ इतना ही है कि हम और हमारा समाज अब किस ‍िदशा  में जा रहा है ? ऐसी मौतें कोरोना से होने वाली मौतों से भी ज्यादा डरावनी और इंसानी पतन की कहानी कहने वाली है. कहते हैं कि मनुष्य अति अवसाद की स्थिति में ही अपना जीवन समाप्त करने का बहुत बड़ा फैसला करता है. लेकिन ऐसी आत्म-हत्या तो पूरे समाज के लिए ही एक कलंक है. यह व्यवस्था की निष्ठुरता से उपजी विवशता तो है ही अनमोल जीवन के प्रति भी गद्दारी है. क्या ऐसी मौत से जीवित बचे बाकी परिजनो को सच्ची खुशी मिल सकती है? और बीमे की वह वांछित रकम भी आश्रितों को फल सकती है? जरा सोचें.  

 

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