उत्तर प्रदेश में खादी-खाकी-अपराधीतीनों का गठजोड़ हमेशा से फलता-फूलता रहा है.कोई भी दल इससे अछूता नहीं है.तीनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं.नेताओं को जब बिना मेहनत के चुनाव जीतना होता है वह चुनाव जीतने के लिए जाति-धर्म और अपराधियों (जिसे आम बोलचाल की भाषा में बाहुबलीकहा जाता है) का सहारा लेना है,तो अपराधी इसके बदले में सफेदपोश नेताओं का संरक्षण हासिल कर लेते हैं.तब पुलिस भी ऐसे अपराधियों पर हाथ डालने की हिम्मत  नहीं जुटा पाती है.इसकी के साथ इस गठजोड़ में खाकी की भी इंट्री हो जाती है.खाकी उस खादी के अधीन रहती है जो अपनी सियासत चमकाने के लिए अपराधियों को सरक्षण देता है.ऐसी दशा में कुछ रिश्वतखोर खाकी पहनने वालों के पास आसान विकल्प यही रहता है कि वह भी इस गठजोड़ का हिस्सा बन जाए.बस यहीं से कानून व्यवस्था तार-तार होना शुरू हो जाती है.मगर यह गठजोड़  ऐसे नागकी तरह होता है जो मौका पड़ने पर किसी को भी डसने से बाज नीं आता है.इस नापाक गठजोड़ में अक्सर प्यादे’, वजीरबन जाते हैं.इस गठजोड़ में कब,कौन, कहा कितना हल्का या भारी पड़ेगा कोई नहीं जानता है.ऐसा ही कुछ कानपुर में हुआ,जहां आठ पुलिस वालों को एक बाहुबली नेता ने मौत के घाट उतार दिया.उत्तर प्रदेश के इतिहास में यह कोई पहली घटना नहीं थी और आखिरी भी नहीं  है.वोट बैंक की सियासत और सिस्टम में खामियों के चलते लम्बे समय से ऐसा होता चला आ रहा है.आज योगी सरकार है तो कल मायावती और  अखिलेश की सरकार में यही सब हुआ करता था.कांगे्रस पिछले तीन दशकों से यूपी की सत्ता से बाहर है,लेकिन बागियों-दागियों और बाहुबलियों को संरक्षण देने के मामले में उसका भी दामन उतना ही दागदार है जितना अन्य दलों का है.इस लिए कोई दल किसी दूसरी पार्टी को आईना दिखाए तो यह जनता की नजरों में धूल झोंकना ही कहा जाएगा।
     कानपुर देहात में दुर्दांत अपराधी के साथ मुठभेड़ में आठ पुलिसकर्मियांे  की शहादत भी इसी त्रिकोणीय गठजोड़ का हिस्सा था.जरायम की दुनिया में अपना सिक्का चमकाने के बाद खंूखार अपराधी विकास दुबे हिस्ट्रीशटर गुंडे से नेता बन गया.समय-समय पर बसपा-सपा और कांग्रेस आदि दलों के नेताओं के बगलगीर होते हुए वह गुंडे से नेता बन बैठा,लेकिन गुंडागर्दी वाली उसकी फितरत नहीं गई.परिणाम स्वरूप आठ पुलिस वालों को जान से हाथ छोना पड़ गया. इस हदयविदारक घटना ने राजनीति एवं अपराधियों के बीच के रिश्तों के साथ-साथ पुलिस महकमें में मौजूद जयचंदों पर भी सवाल खड़े कर  दिए हैं.किसी अपराधी से मिलकर कोई पुलिस वाला अपने संगी-साथियों को ही मौत के घाट उतरवा दे तो उसका गुनाह ऐसा अपराध करने वाले से भी बड़ा माना जाना चाहिए.इस जघन्य अपराध को अंजाम देने वाले विकास दुबे गैंग से तो पुलिस निपट ही लेगी,लेकिन इससे पहले उसे अपने अंदर के भेदियों को सलाखों के पीछे पहुंचा देना चाहिए.अगर ऐसा नहीं होता है तो पुलिस में आगे भी जयचंदपैदा होते रहेंगे।
      अमूमन जैसा होता है,उसी तरह से कानपुर में आठ पुलिस वालों की हत्या पर गर्मागरम सियासत भी शुरू हो गई है.विपक्ष का हर नेता अपने अतीत को खूूंटी पर टांग कर योगी सरकार को कटघरे में खड़ा करने में लगा है.सपा प्रमुख अखिलेश यादव, जिनकी सरकार ही जंगलराज के आरोपों के चलते चली गई थी,वह कह रहे हैं कि पुलिस का मनोबल गिरेगा.खूंखार अपराधी विकास दुबे लम्बे समय तक बसपा सुप्रीमों मायावती का विश्वासपात्र बना रहा,लेकिन जब उसने इतना जघन्य अपराध किया तो मायावती को यह कानून व्यवस्था बिगड़ने का मामला लगने लगा.कांगे्रस महासचिव प्रियंका की  तो बात ही निराली है. वह कभी योगी सरकार से इस लिए नाराज हो जाती हैं क्योंकि योगी जी दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन एक्ट के विरोध के नाम पर प्रदेश को दंगे-फंसाद में झोंक देने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करते हैं.तो कभी इस लिए सड़क पर उतर आती हैं क्योंकि योगी सरकार उनकी पार्टी के  अपराधी किस्म के नेताओं को जेल भेज देते हैं।
     बहरहाल, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की संवेदनशीलता सराहनीय है कि वह शहीद पुलिसकर्मीयों को श्रद्धांजलि देने स्वयं कानपुर गए और परिवार वालों को हर संभव सहायता दिए जाने का भरोसा ही नहीं दिया इसकी घोषणा भी कर दी.प्रत्येक शहीद के परिवार को एक-एक करोड़ रूपए की आर्थिक सहायता और परिवार के एक सदस्य को नौकरी दी जाएगी.मगर कुछ सवालों का जबाब तो तलाशना ही होगा.जिस अपराधी पर थाने में घुसकर हत्या करने सहित करीब 60 संगीन आपराधिक घटनाओं के मामले दर्ज हों, वह बार-बार कैसे लचर पैरवी के चलते जेल से जमानत लेकर बाहर ही नहीं आ जाता है बल्कि राजनीति के गलियारों में भी घूमता दिख जाता है.विकस दुबे का आपराधिक जीवन थाना परिसर में एक बड़े नेता की हत्या करने के आरोप से शुरू हुआ, था,लेकिन उसका बाल भी बांका नहीं हुआ.उसे पुलिस ने  छोड’़ दिया और  जातिवादी समाज एवं राजनीति ने उसे हीरो बना दिया. 
    आठ पुलिस वालों को मौत के घाट सुलाने वाले विकास के हाथ बहुत लम्बे थे.पुलिस ने उसके घर पर दबिश देकर उसे दबोचने की योजना बनाई तो विभागीय विभिषणों ने यह जानकारी तुरंत उसके पास पहुंचा दी.आलम यह है कि विकास के गांव वाले भी उसके खिलाफ मुंह खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं.यह भी आश्चर्यजनक है कि गांव के  किसी व्यक्ति ने उसके खतरनाक मंसूबों  के बारे में पुलिस को जानकारी देना जरूरी नहीं समझा.पहले हर गांव में मुखबिर हुआ करते थे जो पुलिस को अपराधियों के बारे में सूचनाएं पहुंचाते थे.पुलिस का यह तंत्र अब पता नहीं किस दशा में हैै.इस हादसे में सबक लेकर पुलिस प्रशासन को महकमें की कार्यशैली, प्रशिक्षण, नेटवर्क और जरूरतों के बारे में गहन समीक्षा करनी चाहिए.कानून उन लोगों के खिलाफ भी बनना चाहिए जो अपराधियों के कृत्य देखने के बाद भी पुलिस के सामने मुंह बंद किए रहते हैं।
   कानपुर की घटना ने शासन से लेकर पूरे पुलिस महकमें को हिलाकर रख दिया है.यूपी पुलिस के इतिहास में कभी इतनी दुर्दांत घटना नहीं हुई, जिसकी कीमत उसे आठ पुलिस वालों की जान देकर चुकानी पड़ी हो.पुलिस अधिकारी हो या कर्मीं, सब सकते में हैं.इससे पूर्व बांदा में जुलाई 2007 मेे ऐसी ही एक घटना घटी थी.तब पुलिस कुख्यात दस्यु ठोकिया के गिरोह की जंगल में तलाश कर रही थी.ठोकिया ने अपने साथियों के साथ मिलकर पुलिस टीम को घेर लिया था.उस वारदात में एसटीएफ के छह जवान शहीद हुए थे.पुलिस ने इस घटना के करीब एक साल बाद मुठभेड़ में ठोकिया को मार गिराया था।
02 मार्च 2013 को प्रतापगढ़ के कंुडा में पुलिस पर किए गए हमले में सीओं जियाउल हक की मौत के घाट उतार दिया था.इससे पूर्व 16 जून 2009 को कुख्यात दस्तु घनश्याम केवट से हुई मेठभेड़ में पीएसी के प्लाटून कमांडर समेत दो पुलिसकर्मी शहीद हो गये थे.वर्ष 1997 में कुख्यात श्रीप्रकाश शुक्ला ने लखनऊ के हजरतगंज में उसे पकड़ने गई पुलिस टीम में शामिल उप-निरीक्षक आरके सिंह की उन्हीं की रिवाल्वर से गोली मारकर हत्या कर दी थी.बाद में एसटीएफ ने श्री प्रकाश को मार गिराया था.इससे पूर्व 2004 में एक नक्सली हमले में नक्सलियों द्वारा चंदौली में लैंडमाइन से पीएसी के ट्रक को उड़ा दिया था,जिसमें 17 जवान शहीद हुए थे।
    अखिलेश सरकार के समय 02 जून 2016 को मथुरा के जवाहर बाग कांड को कौन भूल सकता है? करीब 286 एकड़ भूमि पर कब्जा जमाए भू-माफिया रामवृक्ष यादव से जमीन खाली कराने पहुंची पुलिस पर उसके समर्थकों ने हमला बोल दिया था.हमले में एएसपी मुकुल द्विवेदी व एसओं संतोष कुमार शहीद हो गए थे.बाद में उग्र पुलिस ने भू-माफिया रामवृक्ष यादव के समर्थकों पर धावा बोल दिया,इसमें 27 लोग मारे गए थे. 2005 वर्ष में भाजपा विधायक कृष्णानंद राय हत्या कांड में उनके दो सरकारी गनर शहीद हुए थे.2017 वर्ष में डकैत बबली कोल के साथ हुई मुठभेड़ में इंस्पेक्टर जेपी सिंह शहीद हुए थे।
   इसी तरह से अस्सी के दशक में एटा, मैनपुरी, कानपुर देहात आदि जिलों में सक्रिय रहे दस्यु छविराम ने एटा में अलीगंज थाना प्रभारी राजपाल सिंह समेत नौ पुलिस कर्मियों की हत्या कर दी थी.वहीं कुशीनगर में अगस्त 1994 में दस्यु से मुठभेड़ की एक घटना में छहः पुलिस वाले शहीद हो गए थे.पुलिस टीम  दो नावों में सवार होगर जंगल पार्टी के दस्यु बेचू मास्टर व राम प्यारे कुशवाहा उर्फ सिपाही की गिरफ्तारी के लिए गई थी.जगंल में दस्यु नहीं मिले तो पुलिस  टीम नाव से लौट गई.पहली नाव तो निकल गई,लेकिन जब दूसरी नावे लौट रही थी और नदी के बीच थी, तभी जंगल दस्युओं ने बम फेंका और अंधाधुंध फायरिंग कर दी.घटना में एसओं तरयासुजान अनिल पांडेय, कुबरेस्थान एसओ दरोगा राजेंद्र यादव, सिपाही खेदन सिंह, विश्वनाथ यादव, परशुराम गुप्त व नागेंद्र पांडेय तथा नाविक भुखल शहीद हो गए थे.बाद में पुलिस ने चरणबद्ध योजना तैयार की जगंल दस्युओं का चुन-चुन कर सफाया किया. बुलंदशहर में तीन दिसंबर 2018 को स्याना थाना क्षेत्र में गोकशी की सूचना के बाद भारी हिंसा हुई थी.इस दौरान गोली लगने से इंस्पेक्टर सुबोध कुमार की मौत हो गई थी.सुबोध बेकाबू भीड़ को समझाने की कोशिश कर रहे थे.इस हिंसा में कुल दो लोगों की मौत हुई थी.मामले में 27 लोग नामजद किए गए थे, जबकि 60 अज्ञात पर मुकदमा दर्ज किया गया था।
    खैर, उम्मीद यह की जानी चाहिए कि पुलिस जल्द से जल्द विकास दुबे को जिंदा या मुर्दा पकड़ लेगी,उस पुलिस वाले को भी सजा मिल जाएगी जिसने पुलिस कार्रवाई की जानकारी विकास दुबे को दी थी,जिसके चलते इतना बड़ा जघन्य कांड हुआ, लेकिन इसके साथ कोशिश इस बात की भी होनी चाहिए कि आगे से खादी-खाकी और अपराधी गठजोड़ न बन सके.वर्ना ऐसी वारदातों को रोकना आसान नहीं होगा.नेता अपराधियों को प्यादोंकी तरह पालते रहेंगे और यह प्यादेसियासी मौका मिलते ही वजीरबनकर सब कुछ बर्बाद करने में देर नहीं लगाएंगे.क्योंकि यही इनकी फितरत होती है.


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