प्रिय शिवराज जी,

मैंने अब तक किसी भी नेता या अभिनेता को यूं चिट्ठी नहीं लिखी है . आज पहली बार आपको लिख रहा हूं . दिल से लिख रहा हूं . ये मुख्यमंत्री शिवराज के नाम एक बेटी के बाप की चिट्ठी है . ऐसे बाप की चिट्ठी , जो हर रोज अखबारों में दो साल , तीन साल , चार साल या पांच साल की गुड़िया जैसी बेटियों के साथ दरिंदगी की खबर पढ़कर बेचैन हो जाता है . ऐसी खबरें पढ़कर जिसकी नसें तनने लगती है . गुस्से से . चिंता से . आशंका से . डर से . बौखलाहट से . आज एक बेटी का वो बाप बलात्कारियों को फांसी की सजा का कानून बनाने के लिए आपको सलाम भेजता है , इस उम्मीद में कि आपने ये फैसला दरिंदगी का शिकार होती मासूम बेटियों के बारे चिंतित होकर लिया होगा , सिर्फ चुनावी फायदे के लिए नहीं.

बीते एक महीने के दौरान डेढ साल से लेकर पांच साल तक बेटियों के साथ बलात्कार की घटनाओं की खबरें पढ़कर मैं कई बार हिला हूं . पढ़ते-पढ़ते रोया हूं . दस दिन पहले ही दिल्ली में डेड़ साल की एक बच्ची के साथ उसके पिता के जानने वाले ने दरिंदगी की . बच्ची को कई दिनों तक आईसीयू में रखना पड़ा . चाचा जैसे शख्स ने डेढ़ साल की ऐसी गुड़िया को अपनी विकृत हरकतों का शिकार बनाया , जो बोलना और चलना भी नहीं सीख पाई थी . मैं उसके नन्हें पांवों में समाने वाले तीन इंच के जूते और खिलौने की तस्वीर देखकर बहुत देर से डिस्टर्ब रहा . विचलित सा सोचता रहा . उस दरिंदे के बारे में . उस लाडली बिटिया के बारे में . उसके पहले और उसके बाद भी कई घटनाएं होती रही . एक घटना से मैं निकलता हूं कि दूसरी घटना सामने अखबार में दिख जाती है . मैं हर ऐसी खबर पर पढ़कर भीतर ही भीतर खौलता हूं . बेचैन होता हूं . लिखता हूं कि ऐसे दरिदों के लिए सरकार फांसी की सजा का प्रावधान क्यों नहीं करती ? आज सुकून मिला कि कोई और था , जो ऐसा ही सोच रहा था . मुझे ये भी पता चला कि कुछ महीने पहले भी आपने ऐसे कानून बनाने के संकेत दिए थे . देर आए , दुरुस्त आए . आज आप बधाई के पात्र हैं . अब आप उन मानवाधिकारवादियों की कतई चिंता मत करिएगा , जो फांसी के खिलाफ झंडा बुलंद करने आ जाते हैं

अखबारों से पता चला कि आपकी सरकार 12 साल तक की बेटियों के साथ बलात्कार करने वाले दरिंदों को फांसी के फंदे तक पहुंचाने का इंतजाम कर रही है . आप ऐसा कानून बनाने जा रहे हैं कि बच्चियों के बलात्कारियों को फांसी की सजा मिले . शीतकालीन सत्र में विधेयक पेश करने के फैसले की जानकारी मिलने के बाद से ही मैं सोच रहा था कि आपको कम से कम इतने बड़े फैसले के लिए बधाई तो दूं . आपने एक बड़ी शुरुआत की है . देश में हर साल हजारों बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाएं होती हैं . फिर भी किसी राज्य सरकार ने अब तक अपने सूबे में ऐसे दरिदों को फांसी के फंदे तक पहुंचाने का कानून नहीं बनाया . आपके इस फैसले के बाद मध्यप्रदेश पहला ऐसा राज्य होगा , जहां 12 साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार करने वालों को फांसी होगी . बलात्कारियों के फांसी की मांग भी नई नहीं है . फांसी का विरोध भी नया नहीं है . दिल्ली में निर्भया कांड के बाद भी लोकसभा में विपक्ष की नेता के तौर पर सुषमा स्वराज में बलात्कारियों को फांसी की सजा देने वाले कानून की मांग की थी . कई और महिला सांसदों ने भी फांसी की वकालत की थी . फांसी की सजा के विरोध में भी काफी बहसें हुई . प्रशांत भूषण जैसे मानवाधिकारवादी बलात्कारियों के मानवाधिकार की वकालत करने भी आ गए . फांसी के विरोध में तमाम तर्क दिए गए . बात खत्म हो गई . अब जब आपकी कैबिनेट ने इतना बड़ा फैसला किया तो अपनी बेटियों के लिए एक चिंतित पिता होने के नाते इतना ही कहूंगा कि शुक्रगुजार हैं हम . बलात्कारियों को फंदे तक लटकाने की मुहिम की शुरुआत का श्रेय आपके खाते में ही दर्ज होना था . ये कानून सिर्फ एक ढ़कोसला न बन जाए , ये भी देखिएगा . ये कानून खामियों और नाकामियों की मिसाल न बन जाए . ये भी सुनिश्चित करना आपका ही काम है क्योंकि कानून तो देश में पहले भी कम नहीं .

मध्यप्रदेश वैसे भी महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में अक्सर टॉप थ्री में रहता है . बीते सालों के दौरान हमने कई बार आपके सूबे में महिलाओं के साथ बलात्कार और छेड़छाड़ की घटनाओं के सरकारी आंकड़े लेकर टीवी चैनलों पर बहसें की है . आपके नाम पर लानत -मलामत हुई है . दूसरे राज्यों के गैरभाजपाई नेता भी आपके सूबे में होने वाली बलात्कार की घटनाओं का हवाला देकर अपना बचाव करते रहे हैं .अब आपका ये फैसला देश के लिए नजीर बने . दूसरे राज्यों में भी ऐसे कानून बने , यही उम्मीद करता हूं . मासूम बच्चियों के बलात्कारियों के लिए फांसी की सजा का प्रावधान कर देने से दरिंदगी पर लगाम लग जाए , जरुरी नहीं , लेकिन फंदे का डर कुछ असर जरुर करेगा . मुझे पता है कि हर मोहल्ले में या हर गली में पुलिस तैनात नहीं हो सकती . हो भी जाए तो घरों की चहारदीवारी के भीतर अपने परिचितों , रिश्तेदारों और जानकारों का शिकार हो जाने वाली बच्ची को बचाना आसान नहीं . हां , बलात्कारियों के भीतर फंदे का डर शायद कुछ काम कर जाए .

चलिए शिवराज जी , सालों से रेप और छेड़छाड़ की घटनाओं के लिए बदनाम सूबे के मुख्यमंत्री के तौर पर अब आपने फांसी के लिए तो कानून बनाने का फैसला कर लिया लेकिन जब तक पुलिसिया सिस्टम को दुरुस्त करने में आप कामयाब नहीं होंगे , तब तक ऐसे कानूनों से भी फायदा नहीं होगा . रेप की घटनाएं होती रहेंगी . गुनहगार और पुलिस की मिलीभगत से कानून फंदे पर दम तोड़ता रहेगा . कभी गवाह नहीं मिलेगा . कभी रिश्वत का जोर चलेगा . कभी सबूतों को दबा दिया जाएगा . ये सब इसलिए कह रहा हूं क्योंकि आमतौर कमजोर तबके के लोगों की बच्चियां ही ऐसी घटनाओं की शिकार होती है . पुलिस के सामने उनका जोर कहां चल पाता है . मैं अभी एनसीआरबी के आंकड़े देख रहा था . चाइल्ड ट्रैफिकिंग के मामले में भी आपका प्रदेश अव्वल है . चौंकाने वाले आंकड़े आपके सूबे में कानून व्यवस्था की पोल खोलते हैं . बाकी अपराधों की तरह महिलाओं और बेटियों के खिलाफ अपराध के मामले में भी आपकी पुलिस का रवैया उतना ही लचर और गैरजिम्मेदाराना होता है . तो अगर पुलिसिया सिस्टम का नट -बोल्ट आपने टाइट नहीं किया तो ऐसे सख्त कानूनों से भी बेटियों की हिफाजत हो जाए जरुरी नहीं . रेप की घटना के बाद सिर्फ कानूनी खानापूर्ति की बजाय पुलिस को भी इतना मुस्तैद बनाइए कि ऐसी घटनाओं में कमी आए . नहीं तो लोग यही कहेंगे कि चुनावी की आहट देखकर आपने रेपिस्टों के खिलाफ फांसी के फंदे को भुनाने भर के लिए आपने ये फैसला किया है . मैं एक आशावादी पिता के तौर पर अभी तो सिर्फ आपके फैसले का स्वागत करता हूं . 


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