यूं तो मैं सीधे-सीधे कह सकता हूं कि 22 अप्रैल-पृथ्वी दिवस, सिर्फ संयुक्त राष्ट्र संघ अथवा संयुक्त राज्य अमेरिका से जुङे संगठनों व देशों को पृथ्वी के प्रति दायित्व निर्वाह की याद दिलाने का मौका नहीं है; यह प्रत्येक जीव के याद करने का मौका है कि पृथ्वी के प्रति हमारा दायित्व क्या है और वह उसकी पूर्ति कैसे करें ? उपभोग और प्रकृति को नुकसान की दृष्टि से देखें तो यह दायित्व निश्चय ही विकसित देशों का ज्यादा है, किंतु इस लेख के माध्यम से मैं यह रेखांकित करना चाहता हूं कि मानव उत्पत्ति के मूल स्थान के लिहाज से यह दायित्व सबसे ज्यादा हिमालयी देशों का है; कारण कि सृष्टि मंे मानव की उत्पत्ति सबसे पहले हिमालय की गोद में बसे वर्तमान तिब्बत में ही हुई।

मानव उत्पत्ति का मूल: तिब्बत

श्री मनमोहन आर्य के अनुसार, आर्यसमाज के प्रणेता महर्षि दयानंद रचित 'सत्यार्थ प्रकाश' के आठवें समुल्लास में सृष्टि की रचना 'त्रिविष्टप' यानी तिब्बत पर्वत बताया गया है। 

’’परिमण्डलेर्मध्ये मेरुरुत्तम पर्वतः। ततः सर्वः समुत्पन्ना वृत्तयो द्विजसत्तमः।। हिमालयाधरनोऽम ख्यातो लोकेषु पावकः। अर्धयोजन विस्तारः पंच योजन मायतः।।’’

चरक संहिता का उक्त सूत्र, मेरु पर्वत स्थित आधा योजन यानी चार मील चौड़े और पांच योजन यानी चालीस मील लंबे क्षेत्र को आदिमानव की उत्पत्ति का क्षेत्र मानती है। महाभारत कथा भी देविका के पश्चिम मानसरोवर क्षेत्र को मानव जीवन की नर्सरी मानती है। इस क्षेत्र में देविका के अलावा ऐरावती, वितस्ता, विशाला आदि नदियों का उल्लेख किया गया है। वैज्ञानिक, जिस समशीतोष्ण जलवायु को मानव उत्पत्ति का क्षेत्र मानते हैं, मानसरोवर ऐसा ही क्षेत्र है। कुल मिलाकर सृष्टि में मानव उत्पत्ति का क्षेत्र अभी तिब्बत ही प्रमाणित होता है। 

जहां तक पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति का प्रश्न है, निस्संदेह वह सर्वप्रथम मानव के रूप में नहीं हुई। भारतीय कालगणना के मुताबिक, मानव की उत्पत्ति सृष्टि रचना के एक करोङ, 20 लाख, 95 हजार, 989 वर्षों बाद हुई। समुद्र में प्राप्त मूंगा भित्तियों को जीवन की प्रथम नर्सरी कहा गया है। बहुत संभव है कि जीवन उत्पत्ति के उस काल में तिब्बती एक समुद्री क्षेत्र ही रहा होगा। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि मूंगा भित्ती उत्पत्ति का क्षेत्र बने समुद्रों और मानव उत्पत्ति के क्षेत्र बने तिब्बत... आज इन दोनो पर ही संकट है। समुद्रों का तल बढ जाने के कारण दुनिया लाखों हैक्टेयर मूंगा भित्ती क्षेत्रफल खो चुकी है। मूंगा भित्तियों का खोया क्षेत्रफल कैसे लौटे ? यह सुनिश्चित करने के लिए तो पृथ्वी दिवस मनाना जरूरी है ही, किंतु तिब्बत के दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने के लिए भी पृथ्वी दिवस मनाना जरूरी है। चीन की दबंगई के चलते तिब्बत में लगातार मानवता की हत्या हो रही है। चीन की निगाह में तिब्बत में इंसान नहीं, कुछ अनुपयोगी सामान रहते हैं।

 

संकट में मानव उत्पत्ति के मूल स्थान का मानव

दुर्भाग्यपूर्ण है कि मानव उत्पत्ति की नर्सरी कई दशकों से डेªगन से अपनी आजादी के लिए संघर्ष कर रही है और उसे रास्ता ढूंढे नहीं मिल रहा। इस बंद रास्ते का दर्द हम नई दिल्ली स्थित चीनी दूतावास के समक्ष प्रवासी तिब्बतियों के प्रदर्शन के रूप में अक्सर देखते ही हैं। पिछले दो वर्षों में मानव उत्पत्ति के इस मूल क्षेत्र में करीब 150 तिब्बती अपने जीवन की अंत खुद करने को  मज़बूर हुए हैं। तिब्बत को इस मज़बूरी से कैसे निजात मिले? तिब्बत आज भी बाट जो रहा है कि उसका विकास और आजादी उसके हाथ कैसे लौटे ?

निगाहें भारत की ओर

यूं मानव उत्पत्ति का मूल स्थान होने का नाते तिब्बत, पूरी दुनिया का मूल है। इस नाते तिब्बत, पूरी दुनिया के लिए पूज्यनीय और पैतृक स्थान है। इस तरह तिब्बत का सौभाग्य सुनिश्चित करना पूरी दुनिया का दायित्व है। तिब्बत, सिर्फ चीन का नहीं हो सकता। तिब्बत को आजाद और अनुपम होना ही चाहिए। यह सुनिश्चित करने के लिए तिब्बत यदि आज किसी की ओर सबसे ज्यादा देखता है, तो वह है हमारा देश भारत। वजह ? तिब्बत के शरणार्थियों को सबसे ज्यादा सम्मान भारत ही देता है। इस चर्चा का एक जरूरी आयाम यह है कि चीन, तिब्बत को केन्द्र बनाकर, भारत आने वाली नदियों  में कचरा और खतरा बढा रहा है। इस नाते भी जरूरी है कि पृथ्वी दिवस के बहुआयामी संदेशों को सुने और कम से कम तिब्बत और अपने लिए अमल करे। 

भारतीय इसलिए भी मनायें पृथ्वी दिवस

हम भारतीयों के लिए यह अमल इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि मूंगा भित्तियों की चिंता, पूरी सृष्टि के जीवन विकास पर घात की चिंता है। जीवन विकास के इस मूल संकट का विस्तार यह है कि गत् 40 वर्षों के छोटे से कैलेण्डर में प्रकृति के खो गये 52 फीसदी दोस्तों के रूप में खोया भारत ने भी है। समुदों का तल 6 से 8 इंच बढने की खबर का असर भारत के सुंदरबन से लेकर पश्चिमी घाटों तक नुमाया है ही। दुनिया ने बाघ खोये हैं, एशिया ने सबसे ज्यादा; बावजूद इसके भारत सरकार के प्रतिनिधि कह रहे हैं कि वे भारत के बाघ, दूसरे देशो को देने को तैयार हैं। ऐसे सरकारी नुमाइंदों को खाद्य श्रृंखला में  बाघ का महत्व समझाना है। गौरैया को अपने आंगन और घर के रौशनदान पर वापस बसाना है। नीलगायों को उनके ठिकाने लौटाने हैं। चींटी से लेकर हाथी तक सभी को उनका जीवन जीने का हक लौटाना है। 

 

..क्योंकि भारत से भी रुठ रहे हैं प्राकृतिक उपहार

 

इस बीच भारत में सर्वाधिक जैवविविधता वाले गंगा जल का अमरत्व यानी अक्षुण्णता खोई है। हमारी नदियां, नाला बनी हैं। तालाब, सूखे कटोरे में तब्दील हुए हैं। भूजल घटा है। इंसान, अब इस घटोत्तरी का नया शिकार है। प्रकृति से दूर होती जीवन शैली के कारण भारतीयों की जिंदगी में भी अवसाद और तनाव बढे हैं। जलचक्र अपना अनुशासन और तारतम्य खो रहा है। खेती पर नये तरह के संकट आते साफ दिखाई दे रहे हैं और राजनेता हैं कि श्रेय की दिखावटी दौङ में लगे हैं। इस दौङ को कम कर, समस्त जीव हितैषी कर्म को बढाना है। 

..क्योंकि भारत ने भी खोई है सांस और सेहत

शोध बता रहे हैं कि हमारी सांसें घटी हैं और सेहत भी। हमें ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि दुनिया में 40 प्रतिशत मौत पानी, मिट्टी और हवा में बढ आये प्रदूषण की वजह से हो रही हैं। हमें  होने वाली 80 प्रतिशत बीमारियों की मूल वजह पानी का प्रदूषण, कमी या अधिकता ही बताया गया है। पानी में क्रोमियम, फ्लोराइड, लैड, आयरन, नाईटेªट, आर्सेनिक जैसे रसायन तथा बढ आये ई-कोलाई के कारण कैंसर, आंत्रशोथ, फ्लोरिसिस, पीलिया, हैजा, टाइफाइड, दिमाग, सांस व तंत्रिका तंत्र में शिथिलता जैसी कई तरह की बीमारियां सामने आ रही हैं। एक अध्ययन ने पानी के प्रदूषण व पानी की कमी को पांच वर्ष तक की उम्र के बच्चों के लिए ’नंबर वन किलर’ करार दिया है। आंकङे बताते हैं कि पांच वर्ष से कम उम्र तक के बच्चों की 3.1 प्रतिशत मौत और 3.7 प्रतिशत विकलांगता का कारण प्रदूषित पानी ही है। भारत भी इसका शिकार है। स्पष्ट है कि पानी का संकट बढेगा, तो जीवन विकास पर संकट गहरायेगा ही। किंतु इसका उपाय, आर ओ, फिल्टर या बोतलबंद पानी या बाजार नहीं हो सकता।

..क्योंकि भारत भी हुआ है असभ्य

भारत ने खुद जलदान को महादान बताने वाली भारतीय जल संरक्षण संस्कृति का क्षरण किया है। इस क्षरण को रोकना ही पृथ्वी दिवस का संदेश है। कचरा, उपभोग, अपने लिए दूसरे के संसाधनों की लूट - ये किसी के सभ्य होने के लक्ष्ण नहीं हैं। जाहिर है कि सभ्यता के मूल गुणों को खोकर असभ्य तो हम भारतीय भी हुए ही हैं। सदुपयोग को छोङ, उपभोग की दिशा में कदम बढाने और पृथ्वी का बुखार बढाने वाले राष्ट्रों में अब भारत भी शामिल है। भारत की नई सरकार को भूमि बचाने से ज्यादा, भूमि का मुआवजा बढाने की चिंता है। हम भूमि की चिंता करने के लिए भी पृथ्वी दिवस का संदेश सुनें और सुनायें; ताकि धरती भी बचे और धरती वासी भी।

 

 

 


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