भोपाल की दर्दनाक घटना में एक बेटी और उसके परिजनों को दरिंदगी सहने के बाद पुलिस प्रक्रिया और पीड़ित पर ही शंका प्रकट करने वाली शर्मनाक मेडिकल रिर्पोट की जिस पीड़ा से गुजरना पड़ा वह घोर निराशा जनक है. शासन प्रशासन की व्यवस्था पर बड़ा प्रश्न चिन्ह है. आवश्यक होने पर प्रचलित नियमों में साधारण संशोधन और सुधार लाकर व्यवस्थागत कमियां दूर की जा सकती हैं.

भोपाल की घटना में पीड़ित बेटी को अपने माता-पिता, जो खुद भी पुलिसकर्मी हैं, के साथ इस थाने से उस थाने के चक्कर लगाने को मजबूर होना पड़ा. घटना की रिपोर्ट लिखी जाने के बाद भी जांच, बयान, मौका मुआइना, आदि के नाम पर उन्हें थाने के बार-बार चक्कर लगाना पडे़. मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में हबीबगंज आर.पी.एफ. थाने के समीप चार दरिंदे सामूहिक ज्यादती कर भाग गये. बाद में पीड़िता के पिता द्वारा एक आरोपी को पकड़ा गया जिससे तीन अन्य भी पकड़े गये. संभव है पुलिस थाने तक असहाय लड़की की चीख पुकार नहीं पहुॅची पर किसी राहगीर अथवा अन्य किसी ने भी उसकी दर्द भरी आवाज नही सुनी. यह भी हो सकता है सुनकर भी अनसुना कर दिया हो. कौन झंझट मोल ले यह भाव आता जा रहा है समाज में. वह तो भाग्य से बच गयी. बेहोश होने पर दरिंदो ने उसे मृत समझ लिया था. पूरा म.प्र. इस शर्मनाक घटना से बदनाम हो गया. दरिंदगी की यह पराकष्ठा थी. बाद में इससे भी अधिक दरिंदगी का सामना उसे पुलिसिया कार्रवाई के दौरान और मेडिकल रिपोर्ट आने के बाद करना पड़ा. अन्तर्मन को झकझोरने वाली इस घटना का जिक्र करते हुए वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, जो खुद भी महिला है, खिलखिला कर हंसते दिखी. पीड़ित परीवार को एफ.आई.आर. के लिये घंटो मशक्कत करना पड़ी. उन्हें इस थाने से उस थाने भटकाया गया. निष्ठुर व्यवस्था को यह भी नहीं लगा की इतने भयानक हादसे से गुजरी बेटी को सहारा दिया जाय. सांत्वना दी जाय. उसकी मदद की जाय. हैवानियत को पार कर देने वाली घटना और उस पर पुलिस का ऐसा बर्ताव. वह भी उसके साथ जिसकी मां और पिता दोनों पुलिस में है. आम आदमी के साथ पुलिस का व्यवहार समझने का यह जीता जागता उदाहरण है. पुलिस का यह रवैया राजधानी का है. दूर दराज के थानों के बारे में क्या कहा जाय. ऐसे वाकिये ही मध्य प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था को स्वछंद कहने का अवसर प्रदान करते हैं. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, जिनकी ख्याति मामा के रूप में है, जो बेटी बचाओ अभियान के प्रणेता हैं और जिन्होंने बेटियों के कल्याण की बहुत सी योजनाएं चला रखी हैं, इस घटना से विचलित हुये. पुलिस बर्ताव पर नाराज भी हुए. उन्होंने आला अफसरों को तलब कर प्रथम दृष्टया दोषी पुलिस अधिकारियां को निलंबित किया. तबादले भी किये. ऐसी घटनायें नहीं हां उनकी तरफ से लगातार प्रयास हो रहे हैं. प्रश्न यह है कि क्या निलंबित करने अथवा यहां से हटा कर वहां पदस्थ करने से व्यवस्था सुधर जायेगी ? सदियों से चला आ रहा पुलिसिया ढर्रा बदल जायेगा ? सब जानते हैं निलंबन और स्थानांतरण कोई दण्ड़ नही है. कुछ दिनां बाद अधिकांश निलंबित पुनः बहाल हो जाते हैं. दोनों तरह के अधिकारी अच्छी पदस्थापना भी पा जाते हैं. निलंबन, स्थानांतरण जन आक्रोश को तात्कालिक रूप से संभालने का जरिया बन गया है. सरकार ने कड़ा रूख अपनाया है, दिखने लगता हैं. मीडिया की सुर्खियो से हटने के बाद जनजीवन भी भूल जाता है. कुछ दिन बाद फिर वही ढर्रा, वही व्यवस्था. वैसे कहा जाए, ऐसे दुष्कृत्य पूरी तरह रोके नहीं जा सकते. पूरी दुनिया में होते हैं. कहीं कम कही ज्यादा. म.प्र. का स्थान देश के ज्यादा वाले राज्यां मे आता है. ऐसे मे जरूरत व्यवस्था में सुधार की है. इससे घटनाएं कम की जा सकती हैं. ऐसे सुधारों में भोपाल जैसी घटनाओं पर पुलिसिया कार्रवाई से बचा जा सकता है किसी अन्य थाना क्षेत्र की घटना होने से दूसरे थाने में पहुॅचे पीडितों कि एफ.आई.आर. नहीं लिखी जाना व्यवस्था अथवा प्रचलित नियमों की बड़ी कमी है. सूचना क्रांति के इस युग में इंटरनेट, कम्प्यूटरीकृत संसाधनों के जरिये जहां रेल, विमान के टिकट लेने से लेकर खरीददारी पैसों का लेन-देन आदि सब कुछ घर बैठे हो जाता है वहां तुंरत एफ.आई.आर. लिखकर संबधित थाना क्षेत्र को अवगत कराने, पीड़ित को हाथों मदद पहुॅचान,े अपराधी भाग खड़े हां उससे पहले पकड़-धकड़ करने की कार्रवाई का विस्तार किया जा सकता है. रात्रि आठ बजे के बाद कोंचिक कक्षाएं बंद करने का मंत्री द्वारा लिया गया निर्णय ठीक नहीं कहा जा सकता. मुख्यमंत्री ने इसे खारिज कर अच्छा किया. घटनायें दिन दहाड़े भी होती हैं. भोपाल की घटना के बाद जबलपुर सहित प्रदेश के अन्य स्थानों पर दृष्कृत की घटनाये हुइंर्. पाशविक कृत्य केवल कोंचिग जल्द बंद कर देने से रोके नही जा सकते. यह आवश्य है कि बड़े शहरों, विशेष रूप से भोपाल में रातो रात बनने वाली झुग्गी झोपड़ियों को नियंत्रित किया जा सकता है. ऐसी अवैध बसाहटों को राज्य प्रश्रय देने से सस्ती लोकप्रियता ओर वोट भले ही मिल जायं, शहरों की सुंदरता , शांति, कानून व्यवस्था प्रभावित होती है. अपराधी तत्व ऐसी गुमनाम बस्तियों में पनाह लेकर अपनी कारगुजारियों को अंजाम देते हैं. रेल पटरियों के दोनों ओर सेकड़ां झिग्गयां तन जाती हैं नालों के किनारे, खाली पड़े बेशकीमती सरकारी भूखण्ड़ झुग्गी माफियों द्वारा कब्जा कर लिये जाते हैं. इनमें झुग्गियां बना कर किराये पर उठा दी जाती हैं. सब जानते हैं. भोपाल जैसे दृष्कृत्यों मे ंकमी लाने के लिये इन सब पर ध्यान देना ही होगा.
 


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