विधानसभा चुनाव की नजदीकता के साथ मध्यप्रदेश में मुख्य विपक्षी दल आपसी मतभेद भुलाकर जाग्रत हो गया है. दूसरी ओर अब तक देश के सर्वाधिक सक्रिय रहने वाले, तीन कार्यकाल के सत्ताधारी मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान समसामयिक स्थितियों को भांपते से दिख रहे हैं. प्रदेश में इन दिनों बात-बात में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की आलोचना के अवसर ढूंढे जा रहे हैं. भावनायें भड़का कर जन मानस को उनके खिलाफ करने के यत्न हो रहे हैं. अभी आलोचना की जा रही है कि उन्होंने कार्य में कोताही बरतने वाले कलेक्टरों को अटपटे शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि ऐसे नाकाबिल कलेक्टरी करने लायक नहीं रह जायेंगे.

यह भी कहा जाता रहा है कि उनके राज-काज में नौकरशाही स्वच्छंद हो गयी है. किसी और की छोड़िये मंत्रियों की भी नहीं सुनी जाती . एक सूत्री लक्ष्य बना लिया जाय तो बारह साल से लगातार मुख्य मंत्री का पद धारण किये व्यक्ति के बारे में और भी बहुत से नकारात्मक प्रश्न खड़े किये जा सकते हैं. देखा गया है कि श्री चौहान ने रचनात्मक आलोचनाओं को कभी अन्यथा नहीं लिया. बल्कि यूं कहा जाय तो गलत नहीं होगा कि निंदक नियरे राखिये के सिद्धांत का पालन करते हुये उन्होंने अपनी शासन व्यवस्था तथा कार्य प्रणाली में  सुधार की कोशिश की है. भोपाल की स्मार्ट सिटी इसका एक उदाहरण है. आलोचनाओं और जन आकांक्षाओं को स्वीकार करते हुये उन्होंने भोपाल में प्रस्तावित स्मार्ट सिटी का क्षेत्र बदल दिया. व्यापम निश्चित ही बड़ी गड़बड़ी थी. मुख्यमंत्री का कहना है पता लगते ही उन्होंने स्वयं ही जांच की पहल की. दोषियों को पकड़वाया.

अभी हाल ही में मंदसौर का गोलीकांड हुआ. छह किसानों की जान गयी. यह बड़ी पीड़ादायक घटना थी.  किसानों को उकसाया गया. बरगलाया गया. यह सिलसिला अभी भी जारी है. अन्यथा न तो मध्यप्रदेश के किसान ऐसे थे जो आगजनी, हिंसा, तोड़फोड़ में उतारू हो जाते और न ही कभी श्री चौहान ने किसानों पर इस तरह की गोलीबारी की कल्पना की होगी. सही बात यह है कि मध्यप्रदेश में किसानों के लिये जितना किया गया है देश में अन्यत्र कहीं नहीं हुआ. श्री चौहान की मंशा के अनुरूप खेती भले ही लाभ का धंधा नहीं बन पायी पर  क्या कोई इससे इन्कार कर सकता है कि प्रदेश में सिंचाई के रकबे में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है.

नहरें सुधारी गयीं. खेतों के अंतिम छोर तक बांधों का पानी पहुंचाया गया. मध्यप्रदेश के किसानों का गेहूं समर्थन मूल्य से अधिक कीमत पर खरीदा गया. समर्थन मूल्य पर दालें खरीदी जा रही हैं. इतना ही नहीं कैसे इन्कार किया जा सकता है कि किसानों को संकट से उबारने और तकलीफों से बचाने के लिये ही आठ रूपये किलो प्याज खरीदी गयी. सरकार ने करोड़ों का घाटा सहा. इस खरीदी-बिक्री में भृष्ट तंत्र ने भले ही मजा लूटा हो पर सरकार की मंशा पर शक नहीं किया जा सकता. कर्ज माफी निश्चित ही कोई स्थायी हल नहीं है. यदि वास्तव में किसानों की मदद की जाना है तो उन्हें साधन-सुविधायें दी जाना चाहिये. मध्यप्रदेश में ऐसा ही करने की कोशिशें की गयीं. किसानों को बगैर ब्याज का ऋण, काफी हद तक निशुल्क बिजली, सिंचाई आदि सुविधायें देकर कर्ज माफी से अधिक कार्य किये गये. इसका राष्ट्रव्यापी परिणाम भी मिला आज मध्य प्रदेश गेहूं उत्पादन में पंजाब को भी पीछे छोड़ रहा है. अन्य उत्पादों में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. प्रदेश को लगातार राष्ट्रीय स्तर पर कृषि कर्मण पुरस्कार मिल रहे हैं. किसानों को सोचना चाहिए कि और किस प्रदेश में किसानों को इतना महत्व दिया गया. 

केवल कृषि ही नहीं, समग्र में देखने पर पायेंगे कि मध्यप्रदेश प्रायः हर क्षेत्र में आगे बढ़ा है. सड़कों की खस्ता हालत प्रदेशवासी अथवा प्रदेश आने वाले भूले नहीं होंगे. आज अच्छी सड़कों वाले राज्यों की श्रेणी में है मध्यप्रदेश . बिजली का क्या कहें, कभी कभी आती थी. अब कभी ही जाती है. यह अवश्य है, लगातार बिजली के आने से घरों में रखे इन्वर्टर बेकार हो गये आलोचना कितनी भी की जाय पर इसमें संदेह नहीं कि मध्य प्रदेश की कानून व्यवस्था अच्छी है. डांकुओं का सफाया हुआ.

गुंडागिर्दी सहित तमाम अपराधों पर कठोर नियंत्रण के स्पष्ट आदेश दिये गये. मध्यप्रदेश बेटियों के सम्मान वाला राज्य बना. गरीब परिवारों की बेटियों के सरकारी तौर पर विवाह कराने में शायद मध्य प्रदेश का विश्व में रिकार्ड होगा. हर तरह की आपदाओं चाहे वह सूखा, ओला, पाला, अतिवृष्टि आदि कुछ भी हो, शिवराज चौहान को जनता के बीच खड़ा देखा गया. सिंहस्थ को भूले नहीं होंगे. लगातार पचासों घंटे खुद राहत-बचाव में जुटे रहे. प्रायः प्रतिदिन उज्जैन पहुंचे. उत्तराखण्ड की आपदा में फंसे प्रदेशवासियों की व्यवस्था-सुरक्षा के लिए केबिनेट मंत्री की अगुआई में टीम भेजी. इतना ही नहीं वे खुद भी वहां फंसे तीर्थयात्रियों को लेने पहुंचे. इतना परिश्रम करने वाला जन सेवक शायद ही किसी ने पहले कभी देखा हो.

प्रदेश में निवेश के लिये उद्योग जगत का रूझान बढ़ा है. ग्लोबल इनवेस्टर समिटें कराने में खर्चा अवश्य बहुत हुआ पर उसका प्रतिफल है कि अनिल धीरूभाई अंबानी, बिरला, नरसीमुंजी, सिम्बोयायसिस, टी सी एस, इन्फोसिस जैसे उद्योग जगत के बड़े नामों का मध्य प्रदेश में आगमन हुआ. मुख्य मंत्री स्वयं सप्ताह में एक दिन उद्योग जगत के प्रतिनिधियों से प्रत्यक्ष मुलाकात करते हैं. उनकी समस्यायें सुनते, समझते, सुलझाते हैं. भारत का उद्योग मित्र माना जाने लगा है यह राज्य. मध्य प्रदेश में विश्व विद्यालयों की समय पर परीक्षायें होने लगी हैं. युवाओं को लोक सेवा आयोग की चयन परीक्षाओं का वर्षों इंतजार करना पड़ता था. उम्र ढल जाने का भय सताने लगता था. कुछ उम्रदराज हो भी जाते थे. पिछले बारह-तेरह वर्षों में चयन परीक्षा में कोई विघ्न नहीं पड़ा.

यह परीक्षायें कभी शंका के घेरे में भी नहीं आयीं. सरकारी अमले को खुश होना चाहिये कि केन्द्र की घोषणा के अनुरूप उन्हें भी समय-समय पर महंगाई-भत्ते और वेतनमान का लाभ मिल रहा है. सम्भवतः पहले कभी ही इतनी तत्परता से लाभ मिला हो. शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में जरूर बहुत प्रयास करना बाकी है. सरकारी अस्पतालों चाहे वह मेडिकल कालेजों के क्यों न हां, का ढर्रा नहीं बदला. दवा और विभिन्न जांच भले ही निशुल्क किये जाने का प्रचार किया जा रहा हो हकीकत में स्वास्थ्य सुविधायें आज जन की पहुंच से बहुत दूर हैं. यही हाल सरकारी स्कूलों का है. खासतौर से ग्रामीण इलाकों में शिक्षा बहुत ही खस्ता हाल है.

शिवराज सिंह चौहान ने अभी हाल ही के महीनों में नमामि देवि नर्मदे, नर्मदा सेवा यात्रा आयोजित की. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, उत्तरप्रदेश के मुख्य मंत्री आदित्य नाथ योगी सहित नामचीन व्यक्तियों, बड़े-बडे़ संतों को आमंत्रित किया . स्वाभाविक है खर्च भी खूब हुआ. इसकी भी आलोचना हो रही है. नर्मदा मध्य प्रदेश की जीवन रेखा है. सदानीरा है. यदि इस यात्रा के परिणाम स्वरूप जन जाग्रति आ गयी, तट वृक्षादित हो गये तो नर्मदा सदा के लिये स्वच्छ, बारहमासी नदी बनी रहेगी. जीवन दायिनी का जीवन बचा रहेगा. यात्रा में जितना व्यय हुआ है उससे करोड़ों गुना  लाभ इस प्रदेश और देश को मिलेगा. मुख्य मंत्री श्री चौहान विनम्र माने जाते हैं. प्रशासन में थोड़ा सख्त होने की अपेक्षा की जाती है. यदि उन्होंने ढीले कलेक्टरों को उल्टा लटकाने की चेतावनी दी है तो कुछ गलत नहीं किया.


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