अभिभूत, आज बाबा साहेब आंबेड़कर का वह सबक याद आ गया जब उन्होंने कहा था हमारी शिक्षा मालिक पैदा करने लिए होना चाहिए नाकि नौकर. इतर हम नौकर बनने का पाठ पढ़ रहें तभी तो देश में मालिक नहीं नौकरों की बाढ़ आ रही है. आह्लादित भविष्यतर देश  को आजादी में भी गुलामी झेलनी पड़ेगी जिसका पार्दुभाव बहुदेशीय कंपनियों के मकड़जाल से हो चुका है. प्रतिभूत भुगतमान भोगने अपने साथ आने वाली पीढ़ी को भी तैयार करने में कोई कोताही नहीं कर रहे है.
 मतलब, हम बात कर रहे हैं आज के दौर में प्रचलित शिक्षा प्रणाली और अपनाये जाने वाले रोजगार के भागमभागी भरे संसाधनों की जिसे हर कोई अपने-अपने माध्यमों से पाना ही नहीं अपितु हथियाना चाहता है. बस! इसी मुराद में की मुझे नौकरी मिल जाए चाहे वह सरकारी हो या गैर सरकारी और कुछ नहीं. इसी जद्दोजहद में बड़ी-बड़ी पढ़ाई महंगी-महंगी तालिम नौकरी की तलाश झोंक दी जाती है. भेड़चाल में स्वंय को ही नहीं अपितु अपने समाज और  देश को भी सीमित दायरे में बांधकर रख देने में गुरेज नहीं करते. इस खुशी में कि नौकरी मिल गई सब कुछ मिल गया यही तो हमारा मकसद था. अगर एक अदद नौकरी पाने के लिए ही इतनी मशक्कत करनी पड़़ी तो वो सबक, ज्ञान और माता पिता के अरमान किस वास्ते थे ये समझ से परे हो गए. सही मायनों में यह तो धरे के धरे रहने के सिवाय कुछ नहीं रहे बल्कि इनके सहारे देखे गये सुहाने सपने सब्जबाग ही रहे.
खैर! नौकरी करना कोई गुनाह नहीं ये भी गौरवशाली जनसेवा, कल्याण, उन्नति और देशभक्ति द्योतक हैं. चर्चा इसके विरोध प्रतिशोध की ना होकर परिस्थिति की है क्योंकि आज समाज और देश में नौकर के बजाए मालिक की बहुत जरूरत हैं. प्रतिपूर्ति चाकरी से एक कदम आगे बढ़कर स्वरोजगारी को अपनाना ही वक्त की नजाकत हैं. येही हमारे समाज का मूलभाव व मंत्र रहा हैं. स्तुत्य, उत्तम खेती, मध्यम व्यापार, निकृष्ट चाकरी भीख ना दान. फलतः ये फलसफां उल्टा ही दिखाई पड़ रहा है कदमताल बिन सोच -विचारे रणभेरी जोरों से जारी हैं. यदि हालात ऐसे ही बने रहें हमारी अर्थव्यवस्था, मूलभूत ढांचा खासकर ग्रामीण सभ्यता, कृषि, पशुधन,  आवरण और स्वरोजगार मूलक संसाधन रसातल में पहुंच जाएंगे जिसे बचाये भी हम नहीं बचा सकते. 
            अलबत्ता, अब देर किस बात कि मालिक बनने की भागीदारी युवाओं को हरहाल में निभानी पड़ेगी. अर्थात् हम नौकरी या कहें रोजगार के अलावे तकनीकी युक्त नवाचार खेती, व्यापार-उत्पादन, सेवा और कौशल विकास की नई ईबारत लिखकर संवहनीय आजीविका के साधन अध्ययन काल से ही विकसित करेंगे तो अपने आप मालिक बन जाएंगे. जिसे तन-मन-धन-वचन के साथ आत्मसात कर युवजनों को जागृत और प्रेरित करना हम सबका नैतिक कर्तव्य ही नहीं अपितु दायित्व भी हैं. ये नव चेतना स्वयं के साथ अपनो को अपने पैरों में खड़ा करना का निश्चित तौर पर गुढार्थ रहस्य साबित होगी. 
 अभियान में हमें जन-जंगल-जमीन-पशुधन, पांरपरिक पेशा और हुनर का संरक्षण व संवर्धन करते हुए जरूरत के मुताबिक विदोहन करना होगा. तभी हर हाथ को काम और खाली पेट को भोजन मिलेगा मीमांसा ही समाज कल्याण व देश सेवा की अभिलाषा को पूरी करेंगी. सहगमन, हमें ऐसी शिक्षा नहीं चाहिए जहां नौकर बनने का ज्ञान मिलता हो. अविरल, ऐसी काबिलियत सीखनी हैं जहां मालिक बनने का गुर मिलता हो. गौरतलब है कि नौकरी करने से एक ही व्यक्ति को रोजगार मिलता है और  सदा वो नौकर ही बनकर रह जाता है चाहे वह किसी भी दायित्व का निर्वहन करता हो. दूसरी ओर स्व-अर्जित जीविका पार्जित करने वाला अपने अलावा औरों को भी रोजी-रोटी मुहैया करवाकर मालिक का दर्जा प्राप्त करता हैं. इसका अर्थ ये नहीं दोनों में उच्च-निच का भाव हैं.
 अंतर्मन गेंद हमारे पाले में है कि हम देश को किस दिशा में मोड़कर जागृत करना चाहते हैं, नौकर या मालिक की. देश को जरूरत तो मालिक है ना कि नौकर की फिर देर किसलिए कंठहार उठ खड़े हो जाइऐ इस महायज्ञ में जहां कौशल देश, कुशल देश के अधिष्ठान हो. याद रहें इसमें मातृशक्ति की भागीदारी प्राणपन से होगी अभिइच्छा ही जागृतिसूत अनुष्ठान देश के सांगोपाग समर्पित होगा. अभिष्ठ, अभिनवकारी जयघोष….. स्वावलंबन की झलक पर न्योछावर कुबेर का कोष. कौशलम् वलम्!
 


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