पहले रोटी, कपड़ा और मकान हमारी मूलभूत जरूरतें थी. फिर इसमें पढ़ाई, दवाई और कमाई जुड़ी. बाद में आर-पार, व्यापार, समाचार, संचार और दूरसंचार  शामिल हुआ. सिलसिले में कंप्यूटर, इंटरनेट और मोबाइल के मकड़जाल से कर लो दुनिया मुट्ठी में नामक सोशल मीडिया का जन्म हुआ. जो बड़े काम की और कमाल का तुंतुरा साबित हुआ. घंटों के काम मिनटों में निपटकर सोहलते और मोहलतें बढ़ने लगी. आंखों देखा हाल सात समुंदर पार दिखाई देने लगे. आभास हुआ कि सोशल मीडिया के जीवाश्म इंटरनेट, मोबाइल, व्हाट्सएप, फेसबुक टि्वटर, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, टिक टॉक और ईमेल आदि-इत्यादि के बिना जीवन अधूरा है. वाकई में इनमें ऐसी खूबियां भी बेशुमार है. जिससे जनजीवन में अनेकों आमूलचूल परिवर्तन आए, इसे कदापि नकारा नहीं जा सकता.  
लिहाजा सब कुछ बड़े आराम से बहुत अच्छे तरीके से चल रहा था, लेकिन इसमें भी बहुत जल्दी हर मीठी चीज की तरह कीड़े पड़ गए. जिन्होंने हमारे नजरों और दिमाग को दिनोंदिन खोखला करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. बेहतरतीब सामाजिक ताने-बाने, नाते-रिश्तों को तार-तार होते-होते देर नहीं लगी. आपाधापी में सोशल मीडिया के चमत्कार, हां-हां कार में बदल गए, और हमारे हाथ लगा हासिल का जीरो. इसके कारक केवल और केवल मात्र हम हैं ना कि सोशल मीडिया का तंत्र जाल. यह तो एक शिष्टाचारी शिष्य की भांति अपने काम को बड़ी शिद्दत से निभाता आ रहा है. वह तो हम जो सोशल मीडिया को कोई ऊल-जलूल कामों के लिए मजबूर करते हैं. और दोष देते फिर रहे हैं सोशल मीडिया के उपयोग को. ऊपर से मोबाइल टावरों के रेडिएशन से निकलने वाले विकरण कई रोगों के कारक है. बावजूद अमानक टावर बेधड़क गांव-गांव और गली-मोहल्ले में लगते ही जा रहे हैं.

यहां यह ना भूले की किसी चीज की आदत तो ठीक है लेकिन लत कदापि नहीं! हमने तो इसके उपयोग को दुरुपयोग में बदल दिया जिससे जिंदगियां बर्बाद होना लाज़मी है. भेड़ चाल, गोलमाल, लूट-खसोट, भद्दा मजाक, अनाप-शनाप गपशप, अश्लीलता और अनचाही जानकारी बेधड़क सोशल मीडिया के तंत्रों में परोसी जा रही है. अलमस्त कि हमारे आने वाली पीढ़ी और महिलाएं भी इससे अछूती नहीं है. विभीषिका आज बचपन खोते जा रहा है. खिलौनों की जगह हाथ में विडियो गेम, मोबाइल, लोरी बनी कार्टूनों की धून. बावजूद प्रसन्न मांये गर्व से कहती है कि मेरा बच्चा बड़ा होशियार है वह तो पूरा का पूरा मोबाइल अपने पापा से अच्छा चला लेता है वह भी ऑनलाइन! भलाई, वह बालमन मोबोफोबिया से व्यधि-आधि का शिकार क्यों ना हो गया हो. बेसुधी में पूरा का पूरा परिवार बड़े-बड़े मोबाइलों पर तसल्ली से चुना-कथा लगाता रहता है. मजाल है कोई किसी की कराहट भी सुन ले, सबको अपने अपने स्टेटस, लाइक और कमेंट की चिंता पड़ी रहतीं हैं. चाहे स्वास्थ और निजता पर कितना भी बुरा असर क्यों ना पड़े इससे कोई मतलब नहीं है.

वीभत्स, हालिया ही देश के सर्वोच्च न्यायालय ने सोशल मीडिया के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए कहा कि यह बेहद खतरनाक है. सरकार को जल्द से जल्द इस समस्या से निपटने के लिए दिशा निर्देश बनाना चाहिए. यही नहीं उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार से सोशल मीडिया के दुरुपयोग को रोकने वैधानिक गाइडलाइन तैयार करने के लिए एक निश्चित समय सीमा बताकर हलफनामा दाखिल करने निर्देश दिया है. न्यायालय ने अपनी तल्ख टिप्पणी में कहा कि लोगों के लिए सोशल मीडिया पर एके-47 तक खरीदना आसान हैं. बकौल, इससे विषम, चिंताजनक तथा बेलगामी बात और क्या हो सकती है? आगे शीर्ष अदालत ने कहा लगता है कि स्मार्टफोन छोड़कर फिर से फीचर फोन की ओर लौटना चाहिए. हालात ऐसे हैं कि हमारी मौलिकता तक सुरक्षित नहीं है.
वस्तुतः कमशकम न्याय के सर्वोच्च मंदिर के स-सम्मान मिडिया को सोशल रहने दिया जाए तो सबके लिए बेहतर होगा. इसको अव्यवहारिक, अमर्यादित और अपने लिए स्पेशल बनाएंगे तो हर हाल में बर्बादी का ही सबक बनेगा. अलबत्ता जरूरत के मुताबिक इस खूबसूरत साधन का सद्उपयोग करना ही वक्त की नजाकत और भलीमत हैं. अन्यथा कानून के फंडे और पुलिस के डंडे कितने भी पड़ें कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है. हम तोड़ने के आदि जो हो चुके हैं क्या करें! आदत से मजबूर जो हैं. शायद! बदल जाए तो जिंदगियां सवरते देर नहीं लगेगी. 
 


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