राजनीति की पवित्रता व महानता को नकारा राजधर्म का घोर अपमान है. पर कब, जब राजनीति, नीति और जनता का राज होती है तब. नाकि जनता पे राज  की नीति. किन्तु हालातों के मद्देनजर अब, ये कहने में कोई गुरेज नहीं बचा कि तिकड़म बाजी में फसी राजनीति सत्ता पाने के अलावा और कुछ नहीं हैं. हां! बीते दौर की बात करे तो जरूर यह बात नामुराद लगती है क्योंकि जमाने में कभी राजनीति सेवा, संस्कार, अधिकार और विचार की प्रतिकार थी, आज वह मेवा, अनाचार, एकाधिकार के साथ पारिवारिक कारोबार का मजबूत आधार है. सीधे शब्दों में लूट कसोट का सरकारी जरिया या पद, मद दम और दाम वाला  नेतागिरी का ल़ाइसेंस.

    बदस्तुर, अड्डे के चौकीदार व अनकहे राजदार रूपिया-माफिया-मीडिया के आगे सिर झुकाये खडे है लाचार. इसी का फायदा उठाकर मौकापरस्तों ने राजनीति को लाभ का धंधा बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. जग जाहिर है जब सौदा मुनाफा का है तो इसमें दाव लगाने में देरी किस बात की. फिर निवेश करने में क्यों कोताही बरती जाए. वह भी एक का दो नहीं पूरे के पूरे एक के दस कभी-कभी  100 बने तब ऐसा आँँफर कौन छोडेगा. वे दीवाने ही होंगे जो इस खजाने से अंजान रहेंगे. फिलवक्त, लोकतांत्रिक शिष्ट्राचारी देशभक्त मस्तानों की कमी नहीं है जो राजनैतिक शुचिता के वास्ते सांगोंपांग भाव से समर्पित ना हो. जिनका जितना बखान किया जाए उतना ही कम है. लिहाजा उन्हीं के सोदेश्यता व दमखम पर देश के विशाल प्रजातंत्र का विश्व गान अजर अमर है.

    इतर, मदहोशी जागीरदार और कथित वोटों के ठेकेदार दोनों हाथों से देश को लुटकर शान से अपना घर भरने में मशगूल है. जोड-तोड की महारत में अच्छा-बुूरा के घृतराष्ट तु-तु, मैं-मैं की महाभारत से अपना उल्लू सीधा करते आ रहे. गोया राजनीति राष्ट्रनीति ना होकर कुटनीति बन गई हो. जिसे हर कोई अपनी हुकुमत समझकर बिकने और बेचने तैयार है. मतलब राजनीति की मंडी में सब मनमाफिक हरा-भरा है तो देर किसलिए बस नेतागिरी की बोली लगाते जाओ और मजे उडाते जाओ रोका किसने है! अलबत्ता इस धमा चौकडी मे कदर बची है तो सिर्फ और सिर्फ फेहरीदारों, मालदारों तथा रंगदारों की बाकी मेहनतकार, जय-जयकार और  दर्शन-हार के खातिर कतार में खडे रहेंगे बारम्बार. यही दशा और दिशा राजनीति को राष्ट्र की उन्नति का माध्यम नहीं वरन् मंदोमति का साधन बनाती है.

    भेडचाल में लगी है भीड राजनीति की मंडी में, नेतागिरी की बोली लगा रहे है सत्ता के दलाल खुलेय्याम बाजार में. बिक रहे है वोटर शराब, कबाब शबाब और रूवाब के रूतबे में कौडियों के दाम पर. बच गये तो ऊच-नीच, जाति-पात, धर्म-सम्प्रदाय, क्षेत्रवाद-पार्टीवाद और भाषा-बोली के नाम भट्टे भाव मिल जाते है हजार. यानि रस्ते का माल सस्ते मे है फिर क्यों जाए कमाने इसी उधेडबून में राजनीतिक व्यापार की पौ बारह हो रही है. मुनाफाखोरी के खेल में कुर्सी चिपक नेताओं ने वर्गवार बंटादार करने में बढ-चढकर भाग लिया. फुटफेर से लोकतंत्र के यंत्र-तंत्र लुटेरों को राजपाठ देकर परातंत्र की स्वदेशी बेडी पहनने मजबूर है जन-तंत्र.

    हडप्पी रवैया स्वच्छ लोकतंत्र को नेतागिरी की चौखट में दासी बना के छोडेगा. कवायद में, मैं और मेरा परिवार के इर्द-गिर्द पनपता राजनीति का वंशवृक्ष जमीनी कार्यकर्ता को अपने आगोश में समेटता जा रहा है. दबिश में नाम, दाम, इनाम के सामने राजनैतिक काम का नेपथ्यी हो जाना सजग व सच्चे दलीय कामगार का गला घोटने के सिवाय कुछ नहीं है. बेलगाम, राजनीति की मंडी में नेतागिरी की बोली यूहीं लगती रही तो नेता,ताने और सत्ता, सत्यानाश की कब्रग्राह बन जाएगी. बेहतर है राजनीति की मान-मर्यादा, कर्तव्यनिष्ठता, प्रगतिशीलता और विचारधारा लोकोन्मुख बनी रहना चाहिए. अभिष्ठ,  राजनीति का अर्थनीति-पदनीति-मदनीती के बजाए राज-काजी विकासनिती और लोकनीती के राज-पथ पर आरूढ होना राष्ट्रहितैषी होगा. 


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