आपदाएं सामान्य जीवन के साथ-साथ विकास की प्रक्रिया के लिए गंभीर खतरा पैदा करती हैं और अचानक ही हमें ऐसी हिंसा का मुंह देखना पडता हैं. जो न केवल जिंदगियां और ढांचा को तबाह कर देता हैं बल्कि परिवारों को एक-दूसरे से अलग-अलग-थलग कर देती हैं. जनसंख्या के बढते दबाव, शहरी औद्योगिक विकास, वनों के कटाव तथा सीमांत भूमि पर खेती के साथ-साथ मानव अभिप्रेरित जोखिमों में भी वृद्धि हुई हैं. आपदाओं का प्रभाव बहु-विषयक है जो कि घरेलु, सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय आदि. आपदा विभिन्न प्रकार के संकटों जैसे: भंूकप, बाढ या तूफान, आग, कृत्रिम त्रासदी, संक्रामक रोगों का परिणाम होती हैं, जिसमें ऐसी नाजुक स्थिति उत्पन्न हो जाती है जो समुदायी, शहरों या गांवों को घेर लेती हैं. 

दरअसल आपदा प्रबंधन के व्यापक मुद्दे जैसे कि निगरानी, मूल्यांकन, खोजबीन और बचाव, राहत, पुर्निर्माण और पुर्नवास आदि. इसमें बहु-क्षेत्रीय शासन व्यवस्था, वैज्ञानिक, नियोजक, स्वंय सेवी और समुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका होती हैं. इन भूमिकाओं और गतिविधियों में आपदा पूर्व आपदा के दौरान तथा आपदा उपरांत के चरण शामिल होते हैं. चूंकि इनकी गतिविधियां एक दूसरे की पूरक और अनुरूप हैं. अत: इनके बीच गतिविधियों में व्यापक समन्वय होने की आवश्यकता हैं. आपदा प्रबंधन अपने आप में कुछ नहीं हैं, बल्कि यह तो अपदाओं के नियत्रंण का कौशलपूर्ण मार्ग, तरीका तथा पद्धति हैं. जब लोगों को आपदाओं के बारे में जागरूकता और शिक्षा प्रदान की जाती हैं तो आपदा प्रबंधन एक आसान कार्य बन जाता हैं. 

लिहाजा, आपदा एक प्रतिकार के रूप में विकरालता धारण किये हुए हैं. वर्तमान परिदृष्य में संसार के चारो ओर कुछ ना कुछ अप्रिय आपदाएं घटित होन से जान-माल, सम्पदा और पर्यावरण को अपूर्णीय क्षति हो रही हैं. इस भीषण प्रतिकार स्वरूप समस्या, व्याधि का निरकाण करना होगा, क्योंकि यह समस्या तो घटते ही रहेगी. इसीलिए समस्या में ही समाधान खोजना होगा, हॉथ पर हॉथ पर रखकर बैठने की जरूरत नहीं हैं. यह भाव को बदलना होगा कि आपदा कुदरत का खेल है, हम क्या कर सकते है. हमारे हाथ में क्या हैं? जब समय आयेगा तब देखा जायेगा? परिवर्तन के लिए समय नहीं, संकल्प की आवश्यकता होती. सर्विदित है समय बता कर नहीं आता, समय पूर्व बुरे समय के निराकरण की राह खोज लेना चाहिए. यथा अब क्या पॅंछताये जब चिडिया चुग गई खेत इस मनोवृति को बदलकर हॉथ खोलकर, हॉथ बढाकर विपदाएं से लडने की आवश्यकता है. 

मसलन निराकरण संभावित आपदाओं का पता लगाने और उन्हें रोकने की नीति तैयार करने से प्रारंभ होता हैं. अग्नि-जन सहयोग से आग बुझा कर अधिक फैलने से रोकना, स्थानीय फायर बिग्रेड को सूचित करना. भूकंप-जब भूकंप आए तो घर से बाहर खुल स्थान में आना, भूकंपरोधी मकानों का निर्माण, भूकंप के बाद आग लगने की संभावना को दृष्टिगत रखते हुए बचाव हेतु आवष्यक सामग्री जुटाकर रखना, भूकंप के समय धैर्य, अफवाहों से सावधान रहना, उचित स्त्रोतों से प्राप्त जानकारी पर विष्वास रखकर सहायता करना, भूकंप की सटीक भविष्यवाणी करना संभव नहीं हैं, यह एक प्राकृतिक आपदा है, इसका धैर्य के साथ मुकाबला करना ही विकल्प हैं. बाढ रोकने नदी के किनारे व आस-पास सघन वृक्षारोपण किया जावे. बाढ आने की सूचना हेतु उचित प्रबंध बनाए जावें. बाढ ग्रस्त क्षेत्र में पेयजल की व्यवस्था, महामारियों से बचाव हेतु साफ-सफाई, भोज्य सामग्री व दवाओं की 

वस्तुत: क्या होती हैं ये घटनाएॅ? क्यों होती हैं ये घटनाएॅ? क्या हम इन्हें घटित होने से रोक सकते हैं? कुछ ऐसे ही प्रश्न हमारे मस्तिष्क में विचरण करते हैें, हम कम-कम इन आपदाओं के प्रभाव को तो कम कर सकते हैं. मनुष्य ने पर्यावरण में इतना परिवर्तन कर दिया हैं कि अनेकानेक समस्याएॅ बढती गई हैं. चाहे कृषि हो, निर्माण कार्य हों या वन विनाश, नाभिकीय ऊर्जा, उत्खन्न और जल व वायु प्रदूषण सभी घटनाएॅ पर्यावरण को अवश्य प्रभावित करती हैं. बढती जनसंख्या का प्रभाव ऊर्जा क्षेत्र, पर्यावरणीय स्वच्छता, पेयजल, स्वास्थ सेवा, शिक्षा पर प्रतिकूल असर डाल रहा हैं. ऐसे में लगता है काश! मनुष्य में भी अन्य जीवों की तरह अनुकूल क्षमता होती तो हम भी अपने आपको वातावरण के अनुरूप करते न कि वातावरण को अपने लालच, स्वार्थ व इच्छा प्राप्ति के लिए बार-बार रूपान्तरित करते. सारतत्व: प्रकृति की यथास्थिती और राहत, पुर्नवास का पूर्व व्यवस्थित नियोजन आपदा को अप्रभावी करने का उचित माध्यम और समाधान हैं.


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