जब जब किसी भी राजनीतिक दल का केन्द्रीय नेतृत्व कमजोर होता है ,तो क्षेत्रीय नेताओ की ताक़त बढ़ जाती हैं .आज वही हाल कांग्रेस का हो रहा है .कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृव परिवारवाद के मोह से उबर नहीं पा रहा है.इसलिए उस पार्टी के जमीनी व कद्दावर नेता नए विकल्प की तलाश में जुट गए हैं .ये भी कहा जा रहा है कि धृतराष्ट्र शैली में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी पुत्र मोह के तहत पार्टी के सभी कद्दावर व जमीनी नेताओ को क्रमशः किनारा कर पार्टी छोड़ने को मजबूर किया जा रहा है.सम्भवतः इसीलिए पिछले 3-4 वर्षो में कई जमीनी नेता कांग्रेस से निकल चुके हैं.कई जाने की तैयारी में हैं.तमाम परिस्थितियों के मद्देनजर ऐसा लग रहा है भाजपा के वरिष्ठ नेता नरेन्द्र भाई मोदी का कांग्रेस मुक्त भारत का दावा जल्द ही सच साबित हो सकता है.
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी शांत तो राहुल गाँधी मौन.प्रियंका सक्रिय पर उन्हें समझौते के लिए कोई निर्णायक क्षमता नहीं.बाकी नेता बयान पर बयान दिए जा रहे हैं ,लेकिन राजस्थान में कांग्रेस की स्थिति मरणासन्न जैसी हो चली है.कांग्रेस नेता भाजपा को ऐसी स्थिति के लिए दोषी बता रहे हैं,जबकि स्थितियां बिलकुल उलट है.
हाल में मध्य प्रदेश  में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का हाथ थाम लिया.उन्हें कांग्रेस के हाथ से भाजपा का साथ ज्यादा माकूल लगा.वह आज आनंद में बताये जा रहे हैं .उनके पहले  हरियाणा से अशोक तंवर पार्टी छोड़ गए.त्रिपुरा से किरीट बर्मन ,गुजरात से अल्पेश ठाकोर,झारखण्ड से अजोय कुमार पार्टी छोड़कर चले गए.आंध्रप्रदेश के जगन मोहन रेड्डी को पार्टी छोड़ने का माहौल बनाया गया.वो आज मुख्यमंत्री हैं.बिहार से पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष अशोक चौधरी आज नीतीश सरकार में मंत्री हैं .पंजाब में  नवजोत सिद्धू भी किनारे कर दिए गए हैं.नयी खबर के अनुसार ,महाराष्ट्र से मिलिंद देवड़ा,संजय निरुपम  और उत्तरप्रदेश से आर पी एन सिंह,जितिन प्रसाद  सहित कई नेता भी कई कारणों से नाराज़ बताये जा रहे हैं.ये सभी जमीनी नेता है.
 ताज़ा स्थिति के मद्देनजर, राजस्थान में भारी उथल-पुथल हैं.कांग्रेस में कोहराम मच गया है .प्रदेश की कांग्रेस सरकार पर संकट दिखने लगा है .जिसके लिए एकमात्र जिम्मेवार मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बताये जा रहे हैं .इस उथल-पुथल के पीछे सचिन पायलट का क्रांतिकारी भाव हैं .पायलट प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष है.उपमुख्यमंत्री भी हैं .लेकिन वह अशोक गहलोत के विशेष शासन शैली से त्रस्त हो गए हैं.सचिन का मसला कोई नया नहीं हैं .पिछले 20 महीनो के कांग्रेस शासन काल में सचिन पायलट के पास पद तो दिए गए पर पद के अनुसार शक्ति नहीं.उपमुख्यमंत्री तो बना दिया.लेकिन नौकरशाही को उनकी कोई भी बात मानने का विशेष निर्देश दिए गए.सचिन को हर स्तर पर जलील किया गया.नीचता कि हद है कि  सचिन को मुख्यमंत्री के गेट से सचिवालय प्रवेश के लिए  मनाही करवा दी गयी.ऐसे कई ऐसे उदाहरण हैं ,जहाँ पर सचिन के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाया गया.इस बारे में कांग्रेस एक कई नेताओं ने निजी बातचीत में टिप्पणियां भी  की हैं.
अशोक गहलोत का अपना अलग अंदाज़ रहा है .उनके बारे में मैं कुछ वाकये की चर्चा करना चाहूँगा.वर्ष 2002 में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की शासन शैली मैंने बहुत करीब से देखा,सुना और समझने की कोशिश की. शासन शैली में अशोक गहलोत अपनी  पार्टी के ही दिग्विजय सिंह से कई कदम आगे हैं.उनके राज में एक भी मंत्री उनकी इच्छा के बिना एक भी शासकीय या राजनीतिक काम नहीं कर सकता.मेरे पास ऐसे कई संस्मरणव उदहारण  हैं. उसके आधार पर मेरा मानना हैं कि सचिन पायलट को भी कई प्रकार से कई मोर्चो पर झेलना पड़ा होगाऔर पड़ा है .गहलोत के स्टाइल में सिर्फ गहलोत होते हैं और कोई नहीं.सबको अपने पक्ष में साधना गहलोत को खूब आता है.मैंने कई ऐसी रिपोर्ट्स लिखी थी.जिस पर बार बार गहलोत को मिर्ची लगी थी.एक खबर उनके विधान सभा क्षेत्र सरदारपुरा (जोधपुर) से था.उसका शीर्षक था –माली होते तो मालामाल होते..यह पढ़कर वो तिलमिलाए ,बौखलाए.उनके प्रेस सलाहकार के माध्यम से खबर के बारे में जानने समझने कि कोशिश की.खुद भी मिले.मैंने सीधी बात की.जो मैंने लिखा है.उसका सारा प्रमाण मेरे पास हैं.वे निरुत्तर थे.फिर बाद में एक खबर –बारां में भूख से 2 बच्चों कि मौत.फिर बौखलाए.खंडन किया.हम लोगों ने उसका मर्दन कर दिया.पर उनके मीडिया प्रबंधन का ज़वाब नहीं.सभी स्थानीय दैनिको में वो खंडन प्रमुख टॉप खबर थी.ऐसी कई खबरे हैं जिस पर उनकी निहित स्वार्थ से भरपूर व आम जन के विरोध वाली शासन शैली को उजागर हुआ .उस वक़्त एक राष्ट्रीय दैनिक के लिए मैं राजस्थान कवर करता था.मतलब ये कि अशोक गहलोत स्वयं को एक  एक सधे हुए व  मझे हुए जादूगर राजनेता मानते है,लेकिन एस बार वो अपने ही बुने जाल में फंस गए लगते हैं . 
तेजी से बदलते हुए समीकरणों के तहत सचिन पायलट पूरी तरह बगावती तेवर में उतर गए हैं .पिछले 2-3 दिनों में सचिन आक्रामक भाव में हैं .भाजपा में जाने की खबरे आई हैं.लेकिन अभी कुछ पुष्ट नहीं है.इस नाटक को पूरी तरह लिखा जा चूका है.जो क्रमवार तरीके से आम जन के सामने उचित समय पर आएगा.सचिन के बगावती तेवर के बाद शक्ति परीक्षण का दौर चल रहा है.सचिन का दावा है कि अशोक गहलोत के पास सिर्फ 84 विधायक हैं,बाकी विधायक सचिन के पास हैं.इस नाटक के पहले कांग्रेस के पास कुल  124 विधायको का आंकड़ा था.जबकि गहलोत 106-109 का नम्बर का दावा कर रहे हैं.गौरतलब हैं विधान सभा में बहुमत के लिए 101 विधायको की जरुरत है.वैसे अशोक गहलोत ने सोमवार को अपने आवास पर हुयी विशेष बैठक में 109 विधायको का साथ होने का दावा किया.इसका मतलब ये हैं कि प्रदेश में अब गहलोत और पायलट के बीच तलवारें खीच गयी हैं .जिसका परिणाम अवश्यम्भावी हैं.वैसे एक खबर समझौते की भी आ रही है कि पायलट को अपने 5 अन्य विधायको के लिए मंत्री पद चाहिए.उसके साथ प्रदेश अध्यक्ष वही रहेंगे.यदि ऐसा कुछ होता भी है तो वो अस्थायी ही होगा.
जहाँ तक अशोक गहलोत की बात है ,वह हर तरह से मज़बूत है.उनकी शक्ति के समक्ष केन्द्रीय नेतृत्व भी कमजोर दयनीय स्थिति में हैं.गहलोत एक ऐसे शासक है ,जो सदैव एकला चलो में भरोसा रखते हैं.
हाल में हुए मध्य प्रदेश और राजस्थान की तुलना की जाये तो दोनों कि स्थितियां व राजनीतिक परिस्थितियाँ अलग अलग हैं.राजस्थान में एक मात्र नेता अशोक गहलोत है ,जबकि मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह के साथ कमलनाथ जैसे भी हैं.दिग्विजय और कमलनाथ राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया अंधी क तर्ज़ पर अपने अपने पुत्रो के लिए पार्टी को किनारा रखकर सारे फैसले रहे हैं.
राजस्थान में तेजी से बदलते समीकरणों के तहत सबकुछ सामान्य नहीं है.अब हो भी नहीं सकता.राजस्थान  के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत  का दावा है कि उनकी सरकार को कोई खतरा नहीं है .सोमवार को कांग्रेस विधायक दल  में विधायको कि उपस्थिति को लेकर कई तरह के आंकड़ों का दावा किया गया है.जयपुर में अशोक गहलोत आवास पर आयोजित बैठक में सचिन पायलट के खिलाफ जो गुस्सा देखा गया ,उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है.एक प्रस्ताव पारित किया गया.कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी व पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी के प्रति आस्था जताई गयी.पार्टी नहीं ,व्यक्ति की बात कही गयी.उस बैठक में सचिन पायलट को लेकर कोई चर्चा नही की गयी.उसके बावजूद दावे किया जा रहे हैं कि अशोक गहलोत और सचिन पायलट साथ साथ काम करेंगे.मेरे को तो नहीं लगता.अशोक गहलोत के शासन कि अपनी स्टाइल है,जो अब तो नहीं बदलने वाली.मैंने अशोक गहलोत की राजनीति को बहुत ही करीब से जानने-समझने की कोशिश की है.इसलिए दावे के साथ कह सकता हूँ ,अब वो वाला दौर नहीं रहेगा.किसी भी तरह से अशोक और सचिन साथ काम कर सकेंगे,इसमें संदेह दिखता है. राजस्थान के परिपेक्ष्य में राजनीतिक नाटक कोई नया नहीं है इस देश में .तेजी से बदलते हुए परिदृश्य में ऐसा लग रहा हैं कि भारत कांग्रेस मुक्त होने कि राह पर चल पड़ा है.
 


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